बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

किस मिट्टी से बना है मेरा भारत ?




किस मिट्टी से बना है मेरा भारत ?
जो असंख्य आक्रमणों का संहार,  
विदेशी सभ्यता का प्रचंड प्रचार,
प्राकृतिक आपदाओं का प्रहार,  
पचा कर भी भारत ही बना रहा ।

सिरमौर हिमालय ध्यानमग्न, चरणों में अथाह सागर ।
सरसों, गेंहू, धान के खेतों, खनिजों का नौलखा हार ।
गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, कृष्णा का निर्मल परिधान,
ब्रह्मपुत्र, महानदी के उत्तरीय का अविरल, प्रचंड प्रवाह ।
दक्षिण,कच्छ,पूर्वांचल,रंगीलो राजस्थान भारत का मान।

पर क्या वसीयत में मिला गौरव मात्र है देश की पहचान ?
क्या केवल कला, स्थापत्य, काव्य से ही होगा देश का सम्मान ?
क्या आर्थिक बल से मिली प्रतिष्ठा ही प्रयोजन एकमात्र ?
या नुक्ताचीनी, विरोध, हङताल, धरना ही है समाधान ?
क्या अवसरवादिता से ही बना रहेगा मेरा भारत महान ?

बोलते नहीं बस करते जाते हैं जो लगन से अपना काम, 
जिनके ह्रदय में एकमेव बस देश की सेवा का अरमान,
जिस मिट्टी में गुंथा है समर्पित शहीदों का स्वाभिमान,  
जिसे सींचता है अपने पसीने से श्रमिक और किसान,
उसी पावन मिट्टी से गढ़ा गया है मेरा प्यारा हिंदुस्तान । 
  
 
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कलात्मक फूल रंगोली साभार : सुश्री रेखा शांडिल्य 

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

गुस्ताख़ी सूरज की



देखो तो ज़रा ढलते सूरज की गुस्ताख़ी !
आंसू बहते देखे तो ऐसी की बेअदबी !
धरती से आकाश तक करवा दी मुनादी !

ह्रदय में जिसके मायूसी, चेहरे पर उदासी, 
कुम्हलाये मुख पर जो बरबस लायेगा हंसी,
उसे मिलेगी खुशियों की करामाती पिटारी !

कहते ही सांझ ने तान दी चुनरी रंग-बिरंगी,
लाल, गुलाबी, हरी, पीली, बैंजनी, नारंगी !
मद्धम हुई फिर रोशनी नीलम से नभ की ।

एक-एक कर तारे चमके साथ चंद्रमा भी,
टिमटिमाते दियों से जैसे जगमगा उठी ज़मीं,
झिलमिल उजली मुस्कान नयनों में झलकी !

घर-घर हुई रोशनी मिटाती तम की पहरेदारी !
किसी को हंसाने से भी मिलती है तसल्ली बङी,
खोई हंसी मिलती है अपने आसपास ही कहीं ।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2022

गुलाब बन के खिलो


गुलाब की तरह खिलो
भीनी-भीनी खुश्बू बनो
भावुक दिलों में बसो
किसने रोका है ?

खुशकिस्मती पर अपनी
खूब इतराओ !
अपना हुनर आज़माओ !
बेफ़िक्र मुस्कुराओ !
किसने टोका है ?

पर भूलना नहीं,
रंगों और खुश्बू का
है कांटों से,
साथ हमेशा से, 
चोली दामन का ।

गुलाब का इत्र बनो ।
गुलकंद बनो ! गुलफ़ाम बनो।
कद्रदानों के बीच रहो ।
कोमल हो।
काँटों के मध्य उगो ।
महफ़ूज़ रहो ।

पर शिकायत ना करो ।
काँटों से परहेज न करो । 
काँटों के बीचों-बीच 
सर उठा के जियो ।
काँटों को अपना कर जियो ।
खट कर, डट कर, टूट कर !
अड़ कर जियो !

जो होगा सो देखा जायेगा !
जब बीतेगा तब झेला जायेगा !
मुरझाने से पहले तक.. 
गुलाब हो, गुलाब की तरह जियो !
ठाठ से खिलो !
किसने रोका है ? 



बुधवार, 19 जनवरी 2022

जिद्दी है ज़िंदगी



राह बहुत लंबी 
बाकी है अभी.
कोई बात नहीं.

कट जायेगा ये भी.
वक़्त बुरा ही सही.
एक दिन बदलेगा ही.

कभी धूप होगी.
कभी छाँव भी.
कभी घटा बरसेगी.
पवन चुभेगी तीर सी.

कभी बात निकलेगी 
बीते दिनों की.
कभी फ़िक्र होगी 
आने वाले कल की.

कभी होगी दोस्ती 
कुछ देकर जाएगी.
कभी यारी टूटेगी भी 
कुछ सिखा कर जाएगी.

ठोकर भी लगेगी 
पर संभल जाएगी.
जिद्दी है ज़िंदगी 
रास्ते ख़ुद बनाएगी.

रविवार, 16 जनवरी 2022

जीवन का स्पंदन



आज एक बङा-सा लाल गुलाब खिला
सजीले गुलाब की रंगत का क्या कहना 
प्रभात का सूरज पहने नारंगी झबला 
एक-एक पंखुरी का हौले से खिलना

उदय होते बाल सूर्य की स्वर्णिम आभा 
खिलते फूल पर ओस की बूँद का ठहरना 
कच्ची धूप के स्पर्श से इन्द्रधनुष बन जाना 
जीवन के स्पंदन का मधुर राग बन जाना 


शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

समय का अल्पविराम


हो रहा है इस बरस का
अंतिम सूर्यास्त ।
कह रहा है अलविदा 
ढलते हुए आज । 

वक्त रहते कह डालो
जी में अटकी बात ।
समय बीतने से पहले 
सुलझा लो उलझे याम ।

सांझ का पट ढल रहा
सजा रंगों के साज़ ।
क्षितिज सुर साधता
जपता सहस्रनाम ।

यायावर है फिर चल देगा
समय का अल्पविराम ।
कभी तुम्हारे कभी हमारे 
राम संवारें सबके काम ।





मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

पन्ना पलटने से पहले


पन्ना पलटने से पहले
एक बार बस
पीछे पलट कर देखना ।
कुछ पल
एकांत में पढ़ना,
लिखा प्रारब्ध का ।

क्या पीछे छूट गया,
क्या छोङ देना चाहिए ।
छोङ देना चाहिए
अफ़सोस और ग्लानि ।
ये आंसुओं से गीली
लकङियां हैं,
इनसे पछतावे का
धुआँ निकलता है बस,
चूल्हा नहीं जलता ।

पर करते-करते अभ्यास
जब-जब जले हाथ,
करना नहीं प्रलाप ।
अनुभव से सीख लेना
और निरंतर करना प्रयास ।
पन्ना पलट देना तत्पश्चात ।

खोल कर एक नया पन्ना
फिर से करना शुरूआत ।



गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

चलते-चलते मिलेंगी राहें


जब चल ही पङे हैं,
तो पहुँच ही जाएंगे ।
जहाँ पहुँचना चाहते थे वहाँ ,
या रास्ता जहाँ ले चले वहाँ ।

रास्ता भूल भी गए तो क्या ?
एक नया रास्ता बनता जाएगा,
अगर चलने वाला चलता जाएगा ।

चलते-चलते ही तो बन जाते हैं रास्ते, 
भले ही ना बने हों हमारे वास्ते ।
रास्तों से निकलते हैं और नए रास्ते, 
हथेली की रेखाओं से मिलते-जुलते ।

चलते-चलते आसान होती जाती हैं राहें,
सुलझाते-सुलझाते खुलने लगती हैं गिरहें ।




चित्र साभार : श्री अनमोल माथुर 

बुधवार, 3 नवंबर 2021

सूरज के सिपाही



कुम्हार के चाक पर 
मिट्टी और नमी से 
गढ़े गए हैं हम ।
मिट्टी के दिये हैं हम।

बच्चों की हठ पर 
हाट-बाज़ार से 
खरीदे गए हैं हम ।
मिट्टी के दिये हैं हम ।

कल्पना के मुखर
कच्चे-पक्के रंगों से 
जी भर रंगे गए हैं हम ।
मिट्टी के दिये हैं हम ।

अपनी ज़मीन पर
काजल की कोठरी में 
तन कर डटे हैं हम ।
मिट्टी के दिये हैं हम ।

छोटा है क़द पर
सूरज की रोशनी से 
लौ लगाते हैं हम ।
मिट्टी के दिये हैं हम ।

दिन के छुपने पर
दिनकर की किरणों के 
पैदल सिपाही हैं हम ।
मिट्टी के दिये हैं हम ।

छोटे ही सही पर
बङे-बङे तूफ़ानों से
टकरा जाते हैं हम ।
मिट्टी के दिये हैं हम ।

नभ के छत्र पर पैबंद
धरा पर जगमग सितारे 
छोटी-सी उम्मीद हैं हम ।
मिट्टी के दिये हैं हम ।

अलाव की आंच पर
धीमे-धीमे सुलगते 
टिमटिमाते हौसले हैं हम ।
मिट्टी के दिये हैं हम ।

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

आओ माँ !


आओ माँ !

आओ माँ करने दुष्टता का संहार !
आओ माँ हो कर सिंह पर सवार !
अपनी दुर्बलताओं से हम गए हार !
तुम पग धरो धरणी पर करो प्रहार !
हमारे प्राणों में हो शक्ति का संचार !
अपने त्रिशूल से भय पर करो वार !
खड्ग से दूर करो दारिद्र्य विकार !
क्षितिज सम भवों पर सूर्य साकार !
जगद्धात्री माँ लेकर करूणा अपार !
माँ हरो मेरे अंतर में व्याप्त अंधकार !
माँ साहस ही देना वरदान इस बार !
आओ माँ आओ मंगल हो त्यौहार !
शंखनाद जयघोष सहित हो भव पार !

रविवार, 11 जुलाई 2021

कहानी


कहानी कहानी होती है ।
कितनी भी सच्ची लगे !
जितनी भी दिल को छुए ।
कहानी कहानी होती है ।
कहानियों से क्या होता है ?

कहानियों से क्या होता है ?
हाँ , कुछ याद रह जाती हैं ।
दिल में जगह बना लेती हैं ।
नेक इरादे तराश देती हैं ।
पर सच कहाँ हो पाती हैं ?
कहानी कहानी होती है ।

ईश्वर करे ! खांटी कहानी ये
सच्ची दास्ताँ ही बन जाए ।
हर सरल स्त्री के जीवन में, 
हर उस आदमी के हिस्से में 
जो कमज़ोर माना जाता है,
थोड़ा-सा हौसला आ जाए,
तो कहानी ही बदल जाए ।


चित्र साभार : श्री रौनक़ चौहान 


मंगलवार, 15 जून 2021

प्रतिबिंब



फूल की पंखुरी
या पत्ते पर ठिठकी
पानी की इक बूँद, 
क्षणभंगुर जीवन के
अप्रतिम सौंदर्य की 
प्रामाणिक छवि है ।

ये भी हो सकता है 
यह पारदर्शी बूँद 
चुपके से ढुलका
नमकीन आंसू है,
जप माला का 
टूटा मनका है या
आस का मोती है ।

संभवतः कोई कहे
श्वास भर यह बूँद 
संवेदनशील ह्रदय का
निश्छल भाव है,
प्रकृति का हास है,
जिसे सूर्य रश्मि 
स्पर्श कर ले यदि
सतरंगीं इंद्रधनुष की 
रूपहली कोर है ।

जिसकी जैसी 
है मनःस्थिति, 
यह बूँद उसी
अनुभूति का
प्रतिबिंब है ।
 

मंगलवार, 25 मई 2021

करावलंबन

कच्ची उम्र के बच्चे
अनुभव के कच्चे
छोटे-छोटे हादसे
क्यों सह नहीं पाते ?

क्यों उनके भीतर
जवान होता बच्चा
इतना सहम गया
कि आत्मघात करना पड़ा ??

उम्मीद बर ना आये
तो जान पर बन आये ?
ऐसा क्या खो बैठे ?
जिसकी भरपाई ना हो पाए ?

उनके भीतर कहीं
गहरी खाई थी क्या ?
जो पाँव फिसले
तो संभल भी ना पाए ?

क्या अपने चूक गए
इनके भीतर उठे
भूचाल के झटके
वक़्त रहते समझने में ?

माँ-बाप ने ला-ला के
खिलौने जैसे सपने दिए
पर क्या वो देना भूल गए
सुरक्षा कवच संस्कारों के ?

फिर किसी बच्चे ने अपने
प्राण तिरोहित कर दिए
यार-दोस्त देखते रह गए
माँ-बाप स्तब्ध रह गए

दुनिया ने सिखाया कैसे
सब कुछ हासिल करना
पर किसी ने ना सिखाया
ना मिले तो आगे बढ़ें कैसे ?

खाई में गिर के वो बचेगा कैसे ?
गोविंद आपने थामा था जैसे
भक्त प्रह्लाद को अपने हाथों में
अपना लेना उसे भी अंक में भर के ।

मंगलवार, 18 मई 2021

गिरिधर


जब तब मैंने 
उलाहना दे दे 
खूब सताया है 
गोविंद को अपने,
रो-रो के व्यर्थ में 
पाथर कह डाला है,
अपने कष्ट के झोंटे में 
कान्हा को ठेल दिया है..
पर गोविन्द ने कब मुँह फेरा है ?
दिवारात्रि अनर्गल प्रलाप को मेरे
शीश पर धर कर कमल शांत किया है ।
केशव तुम्हें ज्ञात है जग में कौन अपना है ।
आसरा एकमेव एकमेव एकमेव बस तुम्हारा है ।
दुख-द्वंद मेरा था गिरिधर पर भार तुमने उठाया है ।


सोमवार, 10 मई 2021

करम की गति न्यारी


" चाय देना एक भाई ! " कमज़ोर सी आवाज़ में अतीत बोला । चाय वाले ने अतीत की ओर देखा । डेढ़ पसली का आदमी दो-तीन दिनों में ही झटक गया था । उसका सारा परिवार कोरोना ग्रस्त अस्पताल में पङा था । ये जाने कैसे बच गया था । ख़ैर ..यहाँ तो एक से एक केस थे । बचे लोग देखभाल करने वाले, तो वे सारे अस्पताल के सामने वाले बरगद के नीचे पनाह ले चुके थे और दिन गिन रहे थे । 

चाय वाले ने अतीत के सामने चाय की गिलसिया रख दी और बोला," महाराज ! आज क्या बात है ? कोई किस्सा, कहानी, चुटकुला ..कुछ नहीं । बलब फ्यूज है क्या? सब ठीक तो है ना ? "

अतीत जैसे नींद से जागा । खीसें निपोरते हुए बोला, " क्या बताऊँ यार ! कुछ समझ में ही नहीं आता, कब सलटेगा यह मौत का कुंआ जैसा खेल !"

" क्या बोले भाईसाहब? मौत का कुंआ का खेल ?"
यह आवाज़ पास बैठे जीव से निकली थी ।

अतीत," हाँ । भैया पहले नहीं देखा । तुम्हारा भी कोई भीतर फंसा है  क्या? क्या नाम है भाई  ?"

जीव ने घोषणा की," मैं? कोरोना ।"

यह सुन कर चाय वाले के हाथ से गिलसिया छूट गई ! अतीत सन्न ! झटके से उठ खङा हुआ !  बोला,"ये कैसा नाम है ? "

जीव ठठा कर हँसा । " क्यों ? तुम तो खुद ही अतीत हो ! फिर भी अभी बीते नहीं !"

अचानक अतीत को करेंट-सा लगा और वो हाथ जोड़ कर जीव के कदमों में बैठ गया," अरे प्रभु ! आप ही हैं, जिनका डंका सारी दुनिया में बज रहा है ? भई कमाल कर दिए आप तो ! ऐसा हंटर घुमाए हो कि घर का घर बरबाद कर दिया ! कौन जनम का बदला लिए हो गुरु ? जरा दया-माया नहीं?" बोलते-बोलते अतीत की आवाज़ भर्रा उठी ।

जीव बोला," काहे इतना रो-धो रहे हो ? इतना ही दिल में इमोसन रहा तो ससुर हमें पैदा काहे किए ?"

अतीत," हम ? हम पैदा किए ?? तुमको ? हम पागल हैं क्या ? "

जीव,"छोङो यार ! तुम आदम जात की पुरानी आदत है ! कांड कर के मुकर जाना !"

अतीत हतप्रभ देख रहा था जीव की ओर , " कांड ? कौनसा कांड ? क्या बक रहे हो ?"

जीव," क्यों? मैं तो तुम्हारी ही नाजायज़ औलाद हूँ ना ? "

अतीत,"ऐ भाई ! कुछ भी बोलेगा ? तेरा कोई धरम-ईमान नहीं क्या ?"

जीव,"मैं क्या धरम-ईमान की पैदाइश हूँ?? तो फिर ये उम्मीद क्यों ?"

अतीत ऑंखें फाङ कर देखता रहा ।

जीव," क्यों? तुम ही लोग बता रहे हो कि ये तो मानव निर्मित जैविक हथियार है । अंधाधुंध प्रकृति का दोहन । आदमी भी तो इसी प्रकृति का एक हिस्सा है । समय रहते तुमने क्या किया ? शतुरमुर्ग की तरह आधुनिक सुविधाओं में मुँह छिपा लिया ? धृतराष्ट्र बने बैठे रहे । फिर दुर्योधन - दुशासन पर बस न चला ! अब महाभारत होने से कौन रोक सकता है ? इस तबाही के लिए क्या तुम ही ज़िम्मेदार नहीं हो? किसे दोष देते हो ?"

अतीत, चाय वाला और बाकी लोग भौंचक्के से खङे थे । मूर्तिवत ।

जीव बोला,"मरना तुम्हारे हाथ में नहीं । पर तुम जिओगे कैसे ? ये तो तुम तय करो ।"


मंगलवार, 4 मई 2021

ईशान कोण जीवन का


मेरे कमरे की
खिङकी का यह कोना
जिसमें फूला है मोगरा, 
धूप में जितना तपता
उतना ही बढ़िया खिलता
और सुगंध बिखेरता !

मेरे कमरे की
खिङकी का यह कोना
जिसमें फूला है मोगरा, 
खुशियों का है टोटका !
खाद,पानी,धूप का होना, 
और प्यार से यदि सींचा
मेहनत का फूल खिलेगा!

मेरे कमरे की
खिङकी का यह कोना
जिसमें फूला है मोगरा, 
समीकरण सुख-दुख का,
विसंगतियों  का टोना,
क्षणभंगुर उल्लास का 
फूल सा डिठौना !

मेरे कमरे की
खिङकी का यह कोना
जिसमें फूला है मोगरा, 
आलाप है आस्था का,
साक्षी है अंतर कथा का,
अव्यक्त भावों का ।

मेरे कमरे की
खिङकी का यह कोना
जिसमें फूला है मोगरा, 
हृदय के स्पंदन सा
आनंद की हिलोरें लेता,
ईशान कोण मेरे जीवन का ।


मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

आनंद संवत्


अलविदा २०७७ 
आ ही गया तुम्हारे
अस्त होने का समय ।
बहुत कष्ट पाया तुमने ।
अलग-थलग सबसे विलग
मौन हो गए और हो गए विलय
नवागन्तुक प्रहर की लहर में विलीन ।
अब मिलना होगा नव संवत्सर की चौखट पर ।
सुना है,अब जो आओगे पोटली में होंगे सुदामा के चावल।
मित्रवत स्वागत तुम्हारा हृदय तल से करेंगे सकल जन सहर्ष ।
करतल ध्वनि कर समवेत स्वर में करेंगें शिव तत्व का आह्वान ।
धैर्य और धर्म धारण कर परिवर्तन  लाए नव विकम संवत्सर २०७८ ।
आरोग्य उपहार मिले,उर में आनंद का हो आगमन,नूतन वर्षाभिनंदन ।


रविवार, 11 अप्रैल 2021

किसकी बदौलत है ये सब ?

ये शहरों की रौनक ।
दिन-रात की चहल-पहल ।
ये लहलहाते खेत ।
नदी किनारे मंगल गान ।

मैदानों में दौङ लगाते,
खेलते-कूदते,पढ़ते-लिखते 
अपना मुकद्दर गढते बच्चे ।
हँसती-खिलखिलाती,
सायकिल की घंटी बजाती
स्कूल जाती बच्चियाँ ।

मिट्टीु के कुल्हड़ में धुआँती
चाय की आरामदेह चुस्कियां ।
थाली में परोसी चैन देती
भाप छोङती पेट भर खिचङी ।

चमचमाते बाज़ार की गहमा-गहमी ।
आनन फानन काम पर जाते लोग ।
भावतोल करते दुकानदार, व्यापारी ।
ट्रैफिक की तेज़ बेफ़िक्र रफ़्तार !

आलोचना करने का अधिकार 
अपनी बात कहने का हक़ ..
हद पार करने का भी !

घर लौट कर अपना परिवार 
सकुशल देखने का सुकून,
किसकी बदौलत है ये सब ?

ये सब उन मौन वीरों की बदौलत 
जो चुपचाप हमारी पहरेदारी
करते रहे बिना किसी शिकायत के
ड्यूटी पर तैनात रहे गर्वीले ।
शहीद हो गए ..घर नहीं लौटे ..
ये सारे सुख, निरापद जीवन
उनकी शहादत की बदौलत ।

खबरदार ! भूलना नहीं !
हरगिज़ यह बलिदान !!
सदैव करना शहीदों का सम्मान!
पग-पग पर करना स्मरण
वीरों का वंदनीय बलिदान !
बनी रहे तिरंगे की आन,बान और शान
सोच-समझ कर सदा करना ऐसे काम ।
जतन से संभालना जवानों के 
स्वाभिमानी साहसी परिवारों को जो 
खो बैठे अपने एकमात्र अवलंबन को ।

जिन्होंने प्राण तक कर दिए न्यौछावर
उनके हम जन्म-जन्मान्तर को हुए कृतज्ञ ।
अब ज़िम्मेदारी निभाने को हो जाएं सजग ।

याद रहे हमारे सारे सुख-साधन,जीवन,
स्वतंत्रता इनके बल बूते पर जिन्होंने 
सौंप दिया हमको अपना भारत ।

श्वास-श्वास करती शहीदों का अभिनंदन ।
इनके पराक्रम की बदौलत हमारा जीवन ।




चित्र इंटरनेट समाचार से साभार 

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

वजह जीने की


कभी-कभी 
कोई वजह नहीं होती
पास हमारे, 
आज का पुल 
पार कर के, 
कल का अभिनंदन 
करने की ।
ज़िन्दगी बन जाती
मशक्कत 
बेवजह की ।

ऐन वक्त पर लेकिन 
आपत्ति जता देती,
एक नटखट कली
जो खिलने को थी ।
यह बोली कली
जाने की वेला नहीं,
निविङ निशि ।
टोक लग जाती ।

फूल रही जूही
सुगंध भीनी-भीनी,
बिछी हुई चाँदनी,
धीर समीर बह रही ।
मौन रजनी,
ध्यानावस्थित
सकल धरिणी ।
कोई तो वजह होगी,
सुबह तक रूकने की ।

हाँ, है तो सही
एक इच्छा छोटी सी ..
देखने की कैसे बनी
फूल छोटी सी कली ।

भोर हो गई ।
मंद-मंद पवन चली ।
जाग उठी समस्त सृष्टि 
गली-गली चहक उठी ।
नरम-नरम धूप खिली ।
और खिली कली ।

एक फूल का
खिलना भी,
हो सकती है वजह
जीने की ।


गुरुवार, 18 मार्च 2021

चाहे जो हो चहचहाना

सुन री गौरैया
तेरी लूँ मैं बलैया !

जब से तूने मेरे घर में
अपना घर बसाया
दिन फिर गए हैं ।

दिन उगता है,
दिन ढ़लता है,
चहकते हुए ।

एक अनकहा
अपरिभाषित रिश्ता
जुड़ गया है तुझसे ।
फ़िक्र रहती है तेरी
और तेरी गृहस्थी की ।
किसी अपने की ही
चिंता होती है ना ।

उस दिन सवेरे
उठते ही देखा ।
तेरा एक बच्चा
घोंसले से नीचे
गिर गया था ।
मरा पड़ा था ।
जाने ये कब हुआ !
कैसे हुआ !
पता ही नहीं चला ।
कलेजा टूक हो गया ।

हम सब रोज़ाना
देखते रहते हैं,
तेरी गृहस्थी
बड़ी होते हुए ।

कैसे बच्चे चोंच खोले
घोंसले से बाहर झांकते
बाट जोहते थे तेरी ।
और तू अपनी चोंच से
उनकी नन्ही चोंच में
डालती थी दाने ।

कैसे वो बच्चे
सीखते थे उड़ना
जब पंख निकल आते थे ।
फुदकते - फुदकते
पंख खोलते और टकराते
गिरते उड़ते गिरते उड़ते
एक दिन सीख गए उड़ना ।

कैसे मैना और कबूतर आते
हर वक्त तुम्हें डराते
घोंसला हथियाने के लिए ।
और तुम आसमान
सर पर उठा कर 
सचेत कर देते थे हमें ।
हम दौड़ते आते बचाने
कबूतर और मैना उड़ाने !

कहां से तुम आईं हमें
जीवन का पाठ पढ़ाने ।
कभी अपनी मदद करना
कभी किसी की मदद लेना ।
पर पंख फड़फड़ाते - फड़फड़ाते
फिर पंख फैला कर धीरे-धीरे
निर्द्वंद उड़ना सीखना ।
नीङ बनाना, बसाना, फिर उड़ जाना ।
दाना चुगना, पानी पीना और उड़ना ।
तिनका - तिनका जोड़ना सुख
और चाहे जो हो चहचहाना ।


सोमवार, 8 मार्च 2021

नदी चाहती है केवल बहना


चाँद का झूमर सितारों की बाली, 
किरणों का हार चुनरिया धानी ।
भाता है मुझको सजना संवरना,
हर दिन खुद को खुशियों से रंगना ।

लेकिन ठहरो ज़रा मेरी बात सुनना,
बस इतना ही तुम मुझको न समझना ।

कभी मेरे भीतर बहती नदी को,
तट पर बैठे-बैठे महसूस करना ।
कल-कल अविरल शांत बहता जल, 
लहर-लहर उमङता भावों का स्पंदन ।

कभी सुनना ..समझ सको तो समझना,
हर नदी की विडंबना, यही रही हमेशा 
समय के दो पाटों के बीच बहना ।
घाटों की मर्यादा का पालन करना ।

देखो तुम इसे उलाहना मत समझना ।
मुझे तुमसे बस इतना ही था कहना ।
नदी चाहती है केवल बहना ।

स्वीकार है, अंतर में समेटना 
विसर्जित हो जो भी आया बहता ।
गहराई में सदा हो रहा मंथन ।
तल में निरंतर हो रहा चिंतन ।

यही तो है इस जग की विषमता ,
नदी के सहज प्रवाह को रोकना 
बन जाता है बाढ़ की विभीषिका ।

मेरे बहाव में निश्चिंत नाव खेना  ।
पर मेरे भीतर बहती है जो यमुना,
उस नदी का सदा सम्मान करना ।
जब तक जल है पावन, बहने देना ।


गुरुवार, 4 मार्च 2021

अकस्मात


भले आदमी थे
जल्दी चले गए ।

जल्दी चले गए ?
अच्छे चले गए  !
जो लंबे रह गए ।
वो पछता रहे !

जल्दी जाने वाले,
अचानक जाने वाले,
कम से कम सोचिए..
खुशफ़हमी में तो गए
कि उनके जाने से 
सबके दिल बहुत दुखे ।

जी जाते अगर लंबे 
तो सारे भ्रम दूर हो जाते ।
चकनाचूर हो जाते
इरादे अपने अनुभव से 
सबको राह दिखाने के ।
अपने स्नेह की फुहार से 
घर की फुलवारी सींचने के ।

ज़्यादा टिक जाते अगर ये
आउटडेटेड हो जाते,
पुराने एनटीक रेडियो से, 
जो एकदम फ़िट नहीं होते  
ज़माने के बदलते दौर में ।
स्टीरियो साउंड के रहते
इनकी खङखङ कौन सुने !

न रखने के न कबाङ में 
डालने के पुराने सामान ये ।
पुश्तैनी आरामकुर्सी जैसे 
एडजस्ट हो ही नहीं पाते ।
जब देखो तब टकरा जाते ।
दिन भर असहाय बङबङाते 
घर में अपना कोना तलाशते
उपेक्षित बङे - बूढे कुटुंब के ।

कुछ ग़लत कहा क्या हमने ?
आंख की किरकिरी बनने से 
बच गए जो जल्दी चल दिए,
अकस्मात यूँ ही चलते-चलते ।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

Street Lights


Remember the glowing street lamps ?
Down the old lane in the nights ..
When we studied in our homes
Surrounded by reassuring comforts..

In breaks we looked out of our windows
To feel the cool breeze in the trees,
Admiring the flower like street lights
Beaming like blessings on the boys,
Sitting under them studying religiously
Holding the books close to their eyes.

For the mellow yellow light of the lamps
Was all they had cradling their hopes.
They blinked and scribbled their notes
In their stained one - sided used sheets.

So many of them sitting on torn chataais
Determined to overcome life's adversities.
Stubbornly challenging their difficult destinies.
Once they would pause to eat chapatis.
Looking up at the quiet twinkling stars.
All these students preparing for boards.
Some at home and so many on the roads.

Look at these flowers resembling street lamps. 
Don't they remind you of those diligent days ?
And those boys studying under the street lights ?
Wherever they are irrespective of results.
Hope now there is enough light in their  homes.