Thursday, 2 December 2021

चलते-चलते मिलेंगी राहें


जब चल ही पङे हैं,
तो पहुँच ही जाएंगे ।
जहाँ पहुँचना चाहते थे वहाँ ,
या रास्ता जहाँ ले चले वहाँ ।

रास्ता भूल भी गए तो क्या ?
एक नया रास्ता बनता जाएगा,
अगर चलने वाला चलता जाएगा ।

चलते-चलते ही तो बन जाते हैं रास्ते, 
भले ही ना बने हों हमारे वास्ते ।
रास्तों से निकलते हैं और नए रास्ते, 
हथेली की रेखाओं से मिलते-जुलते ।

चलते-चलते आसान होती जाती हैं राहें,
सुलझाते-सुलझाते खुलने लगती हैं गिरहें ।




चित्र साभार : श्री अनमोल माथुर 

16 comments:

  1. मेरे दिल की बात लिख दी ।

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    1. शायद तुम्हारी ही कलम थी !

      धन्यवाद नम्रता.

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(०४-१२ -२०२१) को
    'हताश मन की व्यथा'(चर्चा अंक-४२६८)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, अनीता जी । व्यथा की कथा में सम्मिलित होना सौभाग्य है अपना ।

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  3. रास्ता भूल भी गए तो क्या ?
    एक नया रास्ता बनता जाएगा,
    अगर चलने वाला चलता जाएगा ।
    वाह!!
    क्या बात कही है...
    बहुत ही लाजवाब सृजन..

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    1. मनीषा जी, सादर आभार ।
      नमस्ते ।

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    1. धन्यवाद, ज्योति जी । नमस्ते ।

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  5. बहुत ही सुन्दर सृजन

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    1. सविनय आभारी हूँ,भारती जी । नमस्ते पर सस्नेह स्वागत है आपका ।

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  6. बहुत ही सुन्दर

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    1. बहुत धन्यवाद,ओंकार जी ।

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  7. बहुत ही उम्दा सृजन

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    1. शुक्रिया, कायल जी. नमस्ते पर आपका सहर्ष स्वागत है.

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