अपने कर्म हीभाग्य सँवारते हैं ।अपने कर्म हीआङे आते हैं ।अपने कर्म हीदाँव लगाते हैं ।अपने कर्म हीखूब पछाङते हैं ।अपने कर्म हीपहचान बनाते हैं ।अपने कर्म हीधूल चटाते हैं ।बाकी सारी बातेंसब बेकार हैं ।अपने कर्म हीबनाते-बिगाङते हैं ।बात-बात परभगवान को क्यों कोसें ?बाधाएँ आने परदूजों को क्यों दोष दें ?आदमी क्यों जीवन भरजोङ-तोङ बैठाता है ?जब अपना किया हीअपने खाते में जाता है ।
बुधवार, 8 अप्रैल 2026
अपने कर्म ही
बुधवार, 25 मार्च 2026
सजल यमुना जल
यमुना के इसी पाट पर
कालिन्दी के इसी घाट पर
कन्हैया ने की थी लीला,
यहीं शीश नवाते हैं हम
लीला स्मरण कर अब तक ।
यमुना की लहरों पर लिखा
अब भी साकार लीला सार ।
कालिया नाग को नाथा था
और विष मुक्त किया था
यमुना जल नटवर नागर ने ।
मुग्ध होकर हमने सुना वर्णन
पर स्वयं क्यों न देख सके दर्पण ?
जिस यमुना की स्तुति की हमने
बङे चाव से की चढाई चुनरिया,
उसी यमुना मैया को किया मैला !
नदी को बना दिया एक नाला ?
आरती की 'उज्ज्वल तट रेणु की' ?
पथरा गया मार्ग परिक्रमा का ।
चिन गया तट श्री यमुना का ।
मिट गया प्राचीन वृक्षों का पता ।
'बज रही मुरली मधुर वेणु' कहाँ ?
हर तरफ़ भीङ, धक्का-मुक्का,
खोमचे,दुकानें,लाउडस्पीकर घनघोर !
किसने मोर मुकुट वाले को पुकारा ?
क्या हमने यमुना मैया से ही पूछा ?
'कालिन्दी कूल' क्या अब भी आता
रास रचाने, गाय चराने नंदलाला ?
जिस दिन हम चेतेंगे समझेंगे पीङा,
सर्वप्रथम साफ़ करेंगे यमुना मैया ।
नौका लीला करने फिर से आएगा,
मुरली बजैया,रास रचैया कन्हैया ।
चरण पखारेगी जिनके यमुना मैया ।
सोमवार, 23 मार्च 2026
चैत्र प्रतिपदा अभिनंदन
नव संवत्सर चैत्र प्रतिपदा
पूरब में सूरज उदय हुआ
आज अयोध्या में आगमन
सियाराम लखन का पुन:
आरंभ हुआ नवीन अध्याय
संघर्ष और विजय का पर्व
समय की समता का उत्सव
नव चेतना का शुभ पदार्पण
लहराई गुङी जय की ध्वजा
वंदनवार आम्र पत्र की सजा
नीम के फूल-पत्र से अर्चना
कोयल कर रही मधुर वंदना
प्रसाद औषधि समान मिला
नीम से कटु अनुभव पश्चात
गुङ सा मीठा सुख भी मिला
जीवन का स्वाद मिलाजुला
कच्ची अमिया की खटास
दाँत खट्टे करती चुनौतियाँ
उत्साह की नमकीनियत
मिर्च सरीखी तीखी ऊर्जा
इमली सी खट्टी-मीठी याद
जीवन के सारे विरोधाभास
ऋतु परिवर्तन का आभास
प्रासंगिक सदा सभी स्वाद ।
फिर से आरंभ अनुसंधान
जीवन का नूतन अनुष्ठान
विभिन्न रसों का आस्वादन
शुभ सिद्ध हो नव संवत्सर!
रविवार, 22 मार्च 2026
अँजुरी भर जल
नदिया का जल बहता कल-कल
नयनों से अश्रु प्रवाहित अविरल
सूर्य को अर्पित अर्घ्य अंजुरी भर
वर्षा ऋतु में जल बरसे लगातार ।
जल ही है तरल भाव जीवन का
मिट्टी और ह्रदय को सींचता जल
गीली मिट्टी में अंकुरित होता बीज
ज़ख्मों पर मरहम जैसी नज़रें नम ।
सागर,नदी,तालाब, झील,सरोवर,
बरसात के पोखर, कुँए का जल,
ऋतुचक्र सदा संचित करता जल
हर बूँद में झिलमिलाता इंद्रधनुष !
अपार है सभी जलाशयों का बल,
पहाङ काट के राह बना लेता जल,
बाधित नहीं, दूषित नहीं करें जल
दो पाटों के मध्य समाधान सकल ।
शनिवार, 21 मार्च 2026
शायद कविता
कविता लिखी नहीं
पढी ज़रुर,सुनी भी ,
अक्सर समझी भी नहीं,
लेकिन महसूस की ..
जब अच्छी लगी
घोट कर पी ली,
नज़रअंदाज़ की
तो पेङ पर पतंग सी
उलझ गई ,
नज़र सी अटक गई।
कोई बात अकस्मात
दिल को छू गई,
किसी के बोल
नश्तर सा चीर गए,
किसी का कहा
झिंझोङ गया,
व्यथा की नदी
सहसा उमङ पङी,
ह्रदय की थाप
शब्दों की गहरी छाप..
भीतर कुछ बदल गई..
खाली काग़ज़ देखते ही
कलम चलने लगी,
जो बात मन में थी..
कहनी ही थी..
लिख दी...
पता नहीं तुक बनी या नहीं,
शायद कविता ही थी ।
खुशी मिली
छत पर सूखते कपङे
आङे-तिरछे कोण धूप के
रसोई में पकती दाल
पेट भर तरकारी अनाज ,
नयन भर खुला आकाश
खिङकी तक आती डाल
डाल पर खिला पीला फूल
झूला झूलती गौरैया मगन,
स्कूल के बस्ते में किताब
खेलते-कूदते बढते बच्चे
नलों में पानी सुबह-शाम
बस-ट्रेन,रिक्शे की सवारी,
रात भर की गहरी नींद
रेडियो पर समाचार,गीत
हँसते-बोलते गाते रिश्ते
आते-जाते सलाम-नमस्ते ,
ज़िन्दगी इतना सब जीते हुए
जाने कब सर्राटे से बीत गई ।
ढूँढने की फ़ुरसत ही नहीं मिली
जिसे कहते हैं लोग सारे खुशी !
गुरुवार, 19 मार्च 2026
मिलनसार किरायेदार गौरैया
ठुमक-ठुमक परकोटे पर
फुदक फुदक छज्जे पर
बेनागा रोज़ाना आती ।
चहचहा हर सुबह जगाती ।
छप-छप-छप जल से खेलती,
दाना चुग चुग खुशी मनाती ।
चोंच में तिनके सुतली,टहनी
काग़ज़, पत्ते बटोर ले जाती,
घोंसला बना कर घर बसाती ।
सीधी-सादी सी मनभाती गौरैया
मिलनसार किरायेदार बन जाती ।
कीट-कीटाणु सफ़ाचट करती,
आबोहवा स्वच्छ कर देती ।
यानी पेशगी किराया दे देती !
दिनचर्या से ऐसी जुङ जाती,
सुबह-साँझ उसके कहे आती ।
शुभ वेला का स्मरण कराती ।
आस की पाती मनमौजी गौरैया
घर में घर कितना सा बनाती ?
चहल-पहल से अपनी चिमणी
दिल में गहरे घर कर जाती ।
एक तथ्य है सर्व विदित सर्वत्र
आदमी की धङकन सम पर
स्वत: ले आती जब-जब कोई
गौरैया सी चिरैया चहचहाती ।
एक अकेले फूल की शुभकामना
विध्वंस का कर्णभेदी कोलाहल
चारों दिशाओं में मचा हाहाकार
अहंकार परस्पर रहा ललकार
ये सृष्टि को कदापि नहीं स्वीकार
कष्ट ही देगा संवेदनहीन व्यापार
सद्भाव का स्वर ही वह पतवार
जो जीवन की नैया लगाएगा पार
जीवट मनुष्य का स्थायी आधार
शुभ संकल्प ही दिखाता रास्ता
साहस का दीप ह्रदय में बालता
मलबे में दब मरा नहीं जो पौधा
एकमात्र श्वेत फूल उस पर खिला
यदि उस शुभ्र पुष्प पर मन अटका
तो बदल जाएगी सोच की धारा
हर नाव ढूँढती है सुरक्षित किनारा
चुनौतियों से डिगता नहीं ध्रुव तारा
शनिवार, 7 मार्च 2026
मनपसंद रंग
कोई पूछे अगर
कौनसा है रंग
मेरा मनपसंद ?
कोई न कोई बात
हर रंग की मनभाती !
पचरंग चोला पहन
जगत में रमता जोगी,
घाट-घाट का पानी पी
रंगों से पहचान हुई !
रंग देखे अनगिनत ..
सुबह-शाम के
भोर और गोधूलि के ।
हरे-भरे पात वर्षा में धुले,
ओस की बूँद में धनक,
फूलों में खिले रंग शर्मीले,
आकाशी आभास पारदर्शी
सूर्य रश्मि की उजियारी नदी
और ढलता नारंगी सूरज
बिखेरे रंग हज़ार.. बार-बार !
धूप-छाँव के इंद्रजाल में उलझे
पतंग के मांझे,बचपन के नाते,
कटाक्ष उम्र के ,रंग फीके पङते
या घुलमिल कर नित नये रचते ।
मनपसंद रंग की पहेली बूझिये
हम नहीं चुनते, रंग हमें बुनते हैं ।
बुधवार, 4 मार्च 2026
सदाचार का रंग
वो देखो प्रह्लाद भक्ति में लीन
चारों तरफ़ लगी आग के बीच
निष्ठा का संबल अभय कवच
बाल-बाँका न कर सका ताप
ऐसे हुआ संपन्न होलिका दहन
कुटिलता के अभेद्य अस्त्र-शस्त्र
सरलता के तेज से जाते पिघल
अंततः वरदान भी होता विफल
धूँ-धूँ जलता उद्विग्न जगत सकल
रणभूमि हो अथवा होलिका दहन
अग्नि में निरर्थक हो जाता भस्म
शेष रहता भक्त प्रह्लाद कथा सार
रविवार, 22 फ़रवरी 2026
मातृभाषा
जिस भाषा में पहला शब्द कहा
जिस भाषा को सर्वप्रथम सुना
जिस भाषा में सोचना शुरु किया
जिस भाषा में लिखना सीखा
जिस भाषा ने समझ पैदा की
जिस भाषा ने मुझे ज़बान दी
जिस भाषा में अपनी बात कही
जिस भाषा में मनमानी की
जिस भाषा में बोलने से पहले
कभी भी सोचना नहीं पङा
जिस भाषा में खूब लङे-झगङे
फिर संधि-प्रस्ताव भी रखा
जिस भाषा में तुकबंदी की
जीने-मरने की कसमें लीं
जिस भाषा में जीवन पढ़ा
जिस भाषा में सुख-दुख जिया
उस भाषा को मैंने भुला दिया
पर भाषा ने मुझे नहीं छोङा
शब्दकोश साहबी तो चुक गया
संवाद सदा करती रही मातृभाषा
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026
सत्यम शिवम सुंदरम
नीलकंठ महादेव बाघंबर धारी
हरो मन के विकार हे त्रिशूलधारी ।
तुमने विषपान कर हे त्रिपुरारी
जन की पीङा धारण की स्वयं ।
जीव मात्र को दिया पूर्ण संरक्षण
और सम्मान दिया हे पशुपतिनाथ ।
नंदी को माना कुटुंब का सदस्य
अहर्निश सेवा में किया संलग्न ।
शीष की जटाओं में गंगा की धारण
धारा का वेग बाँध,धरा का कल्याण।
वासुकि कंठ हार बन सदा ही रहें संग
जोगी की जटाओं में विराजें अर्ध चंद्र ।
रूपा सी ज्योत्सना से जगत समस्त
प्रेरित हो रचता कला, भाव अनुरूप ।
भोलेनाथ मन में हमारे हो शुभ संकल्प
ध्यान में रहे सदा सत्यम् शिवम् सुंदरम् ।
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
श्रीमान गुलाब
ये गुलाब आपके लिए !
लीजिए भई लीजिए!
कोट पर लगाइए!
या जूङे में सजाइए !
ख़िदमत में हैं आपके !
इनका एहतिराम कीजिए!
ये समझ लीजिए..कि ये
फूलों के सरताज गुलाब हैं !
जीते जी हर गुलदान,
हर बगीचे की शोभा हैं,
दिलफरेब तोहफ़ा हैं ,
खूबसूरती की मिसाल हैं !
उसके बाद भी कमाल हैं !
इत्र बन कर महकते हैं !
तरी पहुँचाते हैं बन गुलकंद !
इनकी तारीफ़ में शेर पढ़े जाते हैं !
इनके बहाने अफ़साने बुने जाते हैं !
जनाब.. ये गुलाब हैं गुलाब !
तरानों, तस्वीरों, कहानियों-किस्सों में
हर दौर में मुस्कुराते नज़र आते हैं !
पुरानी किताबों के पन्नों के बीच भी
किसी की याद में मिल जाते हैं !
सबके चहेते ये गुलाब हैं गुलाब !
बुधवार, 11 फ़रवरी 2026
धरा की आत्मजा सिया
माँ जानकी सीता का स्मरण बारंबार
मुझ में बो दे धैर्य और पावन संस्कार
माँ को नित यही प्रार्थना करते देखा
जब बालक ने तो उत्सुकतावश पूछा
बोने की बात करे यह कैसी है वंदना ?
माँ ने हाथ जोङे फिर सोच कर कहा
जानते हो ना धरा से जन्मी हैं माँ सीता
धरती से ही हर बीज प्रस्फुटित होता
जङें हम सबकी धरती के मर्म में हैं ना
सृष्टि का भार समस्त धरती ने समेटा
माटी से उगता है,माटी में मिल जाता
जीवन क्रम सारा साक्षी भाव से देखा
धैर्य न डिगा माँ का जब आई विपदा
सुख-दुख की वृष्टि के जल को सोखा
आर्द्रता से संकट में साहस को सींचा
आत्मबल से सीता जी ने संग्राम जीता
संस्कार के अलंकार धारण करती माँ।
बाल मन के भोलेपन ने क्या समझा ?
माँ के स्वरुप की छवि को कैसे आंका..
भूमिजा सीता का मन उदार धरती जैसा
प्रफुल्ल प्रकृति ने भाव अभिव्यक्त किया
कोमल कुसुम कली श्रृंगार धानी ओढ़ना
पुष्पों की वेणी गूंथ कर की केश सज्जा
नयनों में उमङती सरस्वती और यमुना
वाणी में मधुर कल-कल जल प्रपात बहता
वरद हस्त संकट, विषाद , क्लेश हर लेता
जङमति होवे सुमति, चरणों में शीश नवा
रघुनंदन राम की शक्ति परम पुनीता सिया
राघव की भक्ति में लीन सदा समर्पित सीता
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माँ जानकी छवि अंतरजाल से आभार सहित
रविवार, 1 फ़रवरी 2026
लौट आना गौरैया का
आ रही थी बहुत याद गौरैया की,
दिन भर आसपास चहचहाने की ।
चुगती थी दाना, तुलसी की मंजरी,
मिट्टी के बरतन से पीती थी पानी ।
छपाक-छपाक खेलती, नहाती थी,
पास जाओ तो फुर्र उङ जाती थी ,
फिर भी वो मेरी पक्की सहेली थी !
मेरी दिनचर्या के नेपथ्य में रहती थी,
उस पर हमेशा मेरी निगाह रहती थी ।
व्यस्त जीवन में राहत की घङी थी,
सूनेपन में चहकती सुनहरी स्मृति..
फिर घर आना गौरैया का थम गया ..
इसलिए जब सुना आज चहचहाना,
लगा लौट आया दोबारा कोई अपना ।
वो अपना जिसका होना ही बहुत था ।
गर्दन घुमा चतुर्दिक देखना संवाद था ।
क्यारी में, गमले पर, तारों पर झूलना,
छज्जे से उङ कर खिङकी पर आना,
बाहर से झाँक कर मुआयना करना ,
फिर चहकने लगना ..आश्वस्त करता ।
मुझसे तुम्हारा रिश्ता दखल नहीं देता,
लेकिन लगता है जैसे तुमने ही समझा ।
मेरे मन का मंगल गीत हो तुम गौरैया,
जहाँ भी जाओ लौट कर आना गौरैया ।
शनिवार, 24 जनवरी 2026
सरस्वती पूजा
बचपन में कहती थी नानी
सरस्वती पूजा की कहानी
पीले वस्त्र पीले फूलों की,
पीले नैवेद्य की पीली थाली
पर देवी जिनकी पूजा होती
पहनें श्वेत रंग की ही साङी
सफ़ेद हँस की उनकी सवारी
पय समान और शुभ्र हिम सी
माँ शारदे की छवि उजियारी ..
खेतों में पीली सरसों जो फूली
हरी-भरी डाली पर फूल बेशुमार !
हो गई वसंत आगमन की मुनादी
बही बसंती पवन बाँध पग में नूपुर !
गेंदे की लङियों से सजावट सारी
धूप और पुष्पों की सुगंध सुवासित !
समस्त कला-कौशल की अधिष्ठात्री
माँ शारदा की वंदना करते पंक्तिबद्ध..
संगीत वाद्य वृंद ने झंकृत किए तार
मृदुल सुरों ने अर्पित की मधुर रागिनी
सुर स्तुति सुन मुसकाई वीणापाणि
माँ के नयन ज्यों गहरी नदिया में नैया
माँ की दृष्टि, सृष्टि तरणी की खेवैया ।
माँ की नासिका पर कौंधे हीरे की कनी
मुख से फूल झरे हरसिंगार से शब्दिता ।
कंठ में पहने देवनागरी की वर्णमाला
सुगंधित सतरंगी कुसुम कली मुक्ता मणि
कर में धारण कर कमल और जपमाला,
करकमल में कलम से लिखी स्नेह पाती
चित्रकला, नृत्य, नाट्य की वरद हस्तमुद्रा ।
अभिव्यक्ति सरल, सहज , सत्यनिष्ठ हो ।
विद्या से ज्ञान , विनय, विवेक जाग्रत हो ।
प्रकृति के विविध रुपहले चित्र अंकित हों ।
ह्रदय के स्पंदन में इंद्रधनुषी तरंग हो ।
मौन मुखर, वाणी ओजस्वी, मधुर बैन हों ।
कल्पना की अल्पना रचना मनमोहक हो ।
शब्द अलंकार ,भाव की शुभ प्रतिध्वनि हों ।
जीवन में रस उपजे ऐसा तुम सृजन करो ।
जङता का तम हरो, सुमति और संवेदना दो ।