बरस दर बरस गाँठ बाँध ली हर वो बातजो थी सहज, सरस, ह्वदय के निकट,या इसके विपरीत छीन ले गई सब सुख-चैन,और कर गई हठात, मर्म पर कुठाराघात ।करने बैठे एक दिन जो हिसाब-किताब ,एक-एक कर खोली गाँठ तो समझे विज्ञान ।बाँसुरी के छिद्रों में समाई श्वास से उपजे संगीत,चाखो जब गन्ने की गाँठों के बीच भरा रस,तब जानो गाँठ-गाँठ में हो रहा रस का सृजन ।कुछ गाँठें होंगी नीरस, लेखा-जोखा सपाट ।पर गाँठ बाँधी बात आङे वक्त में आती काम ।पल्ले में जैसे गाँठ बाँध अम्मा रखती थीं याद,बाहर जाने पर दो-चार रुपैया रखती थीं साथ,या गुपचुप माँगती रहती थीं मन्नत, मन ही मन ।गठरी में मार के गाँठ सुख-दुख समेटते रहना।यात्रा में साथ रखते हैं ज़रुर.. जैसे चना-चबैनावैसे ही लाज़िमी है,सीख की गिरह बाँधते रहना ।
नमस्ते namaste
शब्दों में बुने भाव भले लगते हैं । स्याही में घुले संकल्प बल देते हैं ।
गुरुवार, 18 जून 2026
गाँठ बाँध ली बात
बुधवार, 17 जून 2026
वो एक जोङी नयन
वो एक जोङी नयनविशाल वर्तुलाकारउनका पावन सम्मोहनपारदर्शी नदी का जलशीतल हुआ ह्रदयतलस्निग्ध चंदन का लेपनवो एक जोङी नयन..वो एक जोङी नयनपट की ओट से गोपनअपलक अवलोकन ।दीपज्योति मध्यम,धूमिल होता अंतर ।सर्वस्व हर लेते तत्क्षणवो एक जोङी नयन ।वो एक जोङी नयनसमाया जिनमें संसारअथाह करुणा अपार ।अश्रु जल बिंदु साकारघुल गया मानो काजलसुदर्शन विस्तार सजलवो एक जोङी नयन ।श्याम भ्रमर विद्यमानगुंजायमान नाद ओंकार ।रथ चक्र की धुरी समानपुतली तुम्हारी घनश्याम ।डिठौना जगत आनन परदैदीप्यमान हे जगन्नाथ !वो एक जोङी नयन ।
गुरुवार, 11 जून 2026
गुलमोहर खिल रहे हैं
बाहर मौसम तप रहा है ।
भीतर आलस्य पक रहा है ।
अवसाद पनप रहा है ।
शिकायतों से पन्ने भर रहा है ।
हताशा का बादल घुमङ रहा है ।
पर पसीना बरस रहा है ।
घर उबल रहा है ।
सौ-सौ उलाहने दे रहा है ।
हिलना-डुलना डस रहा है !
बस करो भैया ! बिल बढ़ रहा है !
खिङकी की संध से तनिक बाहर देखो ।
देखो बाहर क्या उत्पात हो रहा है ..
मजदूर फेंटा बाँधे मरम्मत कर रहा है ।
चिलचिलाती धूप में चीले सा सिक गया है ।
काम पर जाने वाले जूझ रहे हैं..
पर किसी तरह मोर्चा सँभाले हुए हैं ।
स्कूल से छूटे बच्चे भुन कर लाल हो गए हैं ।
लोहे के चने चबाना सीख रहे हैं ।
पर सूर्य देवता हरगिज़ न पसीज रहे हैं ।
फिर भी सारे काम बदस्तूर हो रहे हैं ।
मौसम के मिज़ाज जितने बिगङ रहे हैं ।
गुलमोहर उतने ही दहक रहे हैं ।
टूट कर खिल रहे हैं..गीत बन गए हैं ।
क्यों न हम भी चलें रंग बटोरने के लिए !
देखो तपते हुए गुलमोहर खिल रहे हैं !