कोई पूछे अगर
कौनसा है रंग
मेरा मनपसंद ?
कोई न कोई बात
हर रंग की मनभाती !
पचरंग चोला पहन
जगत में रमता जोगी,
घाट-घाट का पानी पी
रंगों से पहचान हुई !
रंग देखे अनगिनत ..
सुबह-शाम के
भोर और गोधूलि के ।
हरे-भरे पात वर्षा में धुले,
ओस की बूँद में धनक,
फूलों में खिले रंग शर्मीले,
आकाशी आभास पारदर्शी
सूर्य रश्मि की उजियारी नदी
और ढलता नारंगी सूरज
बिखेरे रंग हज़ार.. बार-बार !
धूप-छाँव के इंद्रजाल में उलझे
पतंग के मांझे,बचपन के नाते,
कटाक्ष उम्र के ,रंग फीके पङते
या घुलमिल कर नित नये रचते ।
मनपसंद रंग की पहेली बूझिये
हम नहीं चुनते, रंग हमें बुनते हैं ।
नमस्ते namaste
शब्दों में बुने भाव भले लगते हैं । स्याही में घुले संकल्प बल देते हैं ।
शनिवार, 7 मार्च 2026
मनपसंद रंग
बुधवार, 4 मार्च 2026
सदाचार का रंग
वो देखो प्रह्लाद भक्ति में लीन
चारों तरफ़ लगी आग के बीच
निष्ठा का संबल अभय कवच
बाल-बाँका न कर सका ताप
ऐसे हुआ संपन्न होलिका दहन
कुटिलता के अभेद्य अस्त्र-शस्त्र
सरलता के तेज से जाते पिघल
अंततः वरदान भी होता विफल
धूँ-धूँ जलता उद्विग्न जगत सकल
रणभूमि हो अथवा होलिका दहन
अग्नि में निरर्थक हो जाता भस्म
शेष रहता भक्त प्रह्लाद कथा सार
रविवार, 22 फ़रवरी 2026
मातृभाषा
जिस भाषा में पहला शब्द कहा
जिस भाषा को सर्वप्रथम सुना
जिस भाषा में सोचना शुरु किया
जिस भाषा में लिखना सीखा
जिस भाषा ने समझ पैदा की
जिस भाषा ने मुझे ज़बान दी
जिस भाषा में अपनी बात कही
जिस भाषा में मनमानी की
जिस भाषा में बोलने से पहले
कभी भी सोचना नहीं पङा
जिस भाषा में खूब लङे-झगङे
फिर संधि-प्रस्ताव भी रखा
जिस भाषा में तुकबंदी की
जीने-मरने की कसमें लीं
जिस भाषा में जीवन पढ़ा
जिस भाषा में सुख-दुख जिया
उस भाषा को मैंने भुला दिया
पर भाषा ने मुझे नहीं छोङा
शब्दकोश साहबी तो चुक गया
संवाद सदा करती रही मातृभाषा
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)