कविता लिखी नहीं
पढी ज़रुर,सुनी भी ,
अक्सर समझी भी नहीं,
लेकिन महसूस की ..
जब अच्छी लगी
घोट कर पी ली,
नज़रअंदाज़ की
तो पेङ पर पतंग सी
उलझ गई ,
नज़र सी अटक गई।
कोई बात अकस्मात
दिल को छू गई,
किसी के बोल
नश्तर सा चीर गए,
किसी का कहा
झिंझोङ गया,
व्यथा की नदी
सहसा उमङ पङी,
ह्रदय की थाप
शब्दों की गहरी छाप..
भीतर कुछ बदल गई..
खाली काग़ज़ देखते ही
कलम चलने लगी,
जो बात मन में थी..
कहनी ही थी..
लिख दी...
पता नहीं तुक बनी या नहीं,
शायद कविता ही थी ।
नमस्ते namaste
शब्दों में बुने भाव भले लगते हैं । स्याही में घुले संकल्प बल देते हैं ।
शनिवार, 21 मार्च 2026
शायद कविता
खुशी मिली
छत पर सूखते कपङे
आङे-तिरछे कोण धूप के
रसोई में पकती दाल
पेट भर तरकारी अनाज ,
नयन भर खुला आकाश
खिङकी तक आती डाल
डाल पर खिला पीला फूल
झूला झूलती गौरैया मगन,
स्कूल के बस्ते में किताब
खेलते-कूदते बढते बच्चे
नलों में पानी सुबह-शाम
बस-ट्रेन,रिक्शे की सवारी,
रात भर की गहरी नींद
रेडियो पर समाचार,गीत
हँसते-बोलते गाते रिश्ते
आते-जाते सलाम-नमस्ते ,
ज़िन्दगी इतना सब जीते हुए
जाने कब सर्राटे से बीत गई ।
ढूँढने की फ़ुरसत ही नहीं मिली
जिसे कहते हैं लोग सारे खुशी !
गुरुवार, 19 मार्च 2026
मिलनसार किरायेदार गौरैया
ठुमक-ठुमक परकोटे पर
फुदक फुदक छज्जे पर
बेनागा रोज़ाना आती ।
चहचहा हर सुबह जगाती ।
छप-छप-छप जल से खेलती,
दाना चुग चुग खुशी मनाती ।
चोंच में तिनके सुतली,टहनी
काग़ज़, पत्ते बटोर ले जाती,
घोंसला बना कर घर बसाती ।
सीधी-सादी सी मनभाती गौरैया
मिलनसार किरायेदार बन जाती ।
कीट-कीटाणु सफ़ाचट करती,
आबोहवा स्वच्छ कर देती ।
यानी पेशगी किराया दे देती !
दिनचर्या से ऐसी जुङ जाती,
सुबह-साँझ उसके कहे आती ।
शुभ वेला का स्मरण कराती ।
आस की पाती मनमौजी गौरैया
घर में घर कितना सा बनाती ?
चहल-पहल से अपनी चिमणी
दिल में गहरे घर कर जाती ।
एक तथ्य है सर्व विदित सर्वत्र
आदमी की धङकन सम पर
स्वत: ले आती जब-जब कोई
गौरैया सी चिरैया चहचहाती ।