गुरुवार, 12 मई 2022

तासीर

मेरी प्यारी बेटियों 
जुग जुग जियो !
जैसे-जैसे बड़ी हो..
बहुत कुछ बनना 

जब-जब छाये अँधेरा,
बिजली की तरह कौंधना 
गहरे ताल में पड़े उतरना 
तो कमल की तरह खिलना 
बहुत कुछ बनना ।
भुलावे में मत रहना ।
चौकस रहना ।

जो जो सीखो,
सहेजती जाना ।
जैसे अपनी किताब-काॅपी
बस्ते में लगाती हो ।
जैसे गर्म रोटियाँ मोङ कर 
कटोरदान में रखती हो ।
जैसे अपने दुपट्टे,कुर्ते, सलवार
साङी तहा कर रखती हो ।
जैसे घर का सारा सामान 
जगह-जगह जमा कर रखती हो ।

अपनी भावनाएं, अपने स्वाद,
अपने संकल्प, अपने व्यक्तित्व को 
सहेजे रखना । बचा कर रखना ।
समय बीतने के साथ नज़र की तरह
अपनी व्यक्तिगत रूपरेखा को
धुंधला मत पङने देना ।

अच्छी बेटी बनना ।
अच्छी बहन बनना ।
अच्छी पत्नी बनना ।
अच्छी माँ बनना ।
इस सबके बीच तुम जो हो,
वह बनी रहना ।

बहुत कुछ बनना ।
बहुत कुछ बदलेगा 
तुम भी बदलते हुए जीना 
बस तासीर मत बदलने देना ।


*************************************

आभार सहित 
चित्र इंटरनेट से 
इंडिया पोस्ट डाक टिकट 


रविवार, 8 मई 2022

स्वयंसिद्धा


महाकवि निराला ने 
देखा था उसे
इलाहाबाद के पथ पर 
वह तोङती थी पत्थर ।

आज मैंने जिसे देखा
क्या यही थी वह जिसे 
देखा था महाकवि ने ?

आप रहे भाव दृष्टा
आपने पढ़ लिया 
उलाहना आंखों का..
अथवा ..
मौन कटाक्ष था क्या? 
था भी तो आपसे ज़्यादा 
कौन समझ सकता था ?
ठंड में ठिठुरते फुटपाथ पर 
सोते विपन्न को अपना
ऊनी वस्त्र दे दिया था,
आपने उदार मना ।

उसका जता देना,
पुनः काम में जुट जाना ।
अपने हाथों और हथौङे से 
गढ़ना अपना भवितव्य ।
स्वीकार कर पत्थर सा कठोर 
जीवन अपना और जीवट इतना 
हथौङे से लगातार करती वार
वह तोङती पत्थर ..
विषमताओं पर करती प्रहार ..
आप जान गए थे महामना ।

तो क्या कुछ भी नहीं बदला ? 
पीठ पर बांध कर बच्चा 
कङी धूप में तप कर
हाथ में हथौङा लेकर 
अब तक वह स्वयंसिद्धा
तोङती है पत्थर ..

महाकवि निराला की संवेदना 
लिख गई कविता पिरो कर
अनुभूति में भाव सरिता ।
आज मैंने भी देखा,
वह तोङती थी पत्थर ।

÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

छायाचित्र इंटरनेट से साभार 

शनिवार, 7 मई 2022

तुरपन














माँ कहती थी 
सीख लो बिटिया 
काम आएँगी 
छोटी-छोटी बातें. 

इसलिए नहीं कि 
हर लड़की को 
आनी चाहिए 
अच्छी लगने वाली बातें
यानी घर सँभालने वाली बातें.

इसलिए कि 
हर लड़की को 
आनी चाहिए 
आत्मनिर्भर 
बनाने वाली बातें.

ख़ुद कर सको 
सारा काम अपना 
इससे अच्छा क्या होगा ?
काम कोई भी सीखो 
कभी न कभी काम आएगा.

सीखना ही जीना है.
यह जीते-जीते समझ आएगा.

नहीं सीखना नाचना-गाना 
जो लड़के वालों को हो दिखाना.
सहज सीख लोगी तो जब चाहो  
जब मन हो तब गुनगुनाना.  

बेस्वाद ज़िन्दगी में क्या रखा !
स्वाद घोलने को जीवन में 
क्यों न सीखो स्वादिष्ट पकाना !
यदि गोल-गोल सेंकोगी फुलका 
काम बहुत जल्दी निबटेगा !

फिर सीखो फ्यूज उड़े तो 
ख़ुद कैसे ठीक करना.
छोटी-मोटी मरम्मत करना  
करते-करते आ जाएगा 
जीवन की उलझनें सुलझाना.

सीख कर तैयार रहना.
जब कभी पड़े आज़माना 
किसी से भी पीछे मत रहना.  
 
फटी सिलाई को फिर सिलना 
माँ को अक्सर करते देखा.
फिर धीरे से मुसका कर कहना 
ऐसा ही होता है जीवन. 
रोज़ उधडती रहती सीवन 
रोज़ उसे पड़ता है सीना.
सीख ही लेना तुम भी तुरपन.


~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

कलाकृति चित्र इन्टरनेट से साभार