आ रही थी बहुत याद गौरैया की,
दिन भर आसपास चहचहाने की ।
चुगती थी दाना, तुलसी की मंजरी,
मिट्टी के बरतन से पीती थी पानी ।
छपाक-छपाक खेलती, नहाती थी,
पास जाओ तो फुर्र उङ जाती थी ,
फिर भी वो मेरी पक्की सहेली थी !
मेरी दिनचर्या के नेपथ्य में रहती थी,
उस पर हमेशा मेरी निगाह रहती थी ।
व्यस्त जीवन में राहत की घङी थी,
सूनेपन में चहकती सुनहरी स्मृति..
फिर घर आना गौरैया का थम गया ..
इसलिए जब सुना आज चहचहाना,
लगा लौट आया दोबारा कोई अपना ।
वो अपना जिसका होना ही बहुत था ।
गर्दन घुमा चतुर्दिक देखना संवाद था ।
क्यारी में, गमले पर, तारों पर झूलना,
छज्जे से उङ कर खिङकी पर आना,
बाहर से झाँक कर मुआयना करना ,
फिर चहकने लगना ..आश्वस्त करता ।
मुझसे तुम्हारा रिश्ता दखल नहीं देता,
लेकिन लगता है जैसे तुमने ही समझा ।
मेरे मन का मंगल गीत हो तुम गौरैया,
जहाँ भी जाओ लौट कर आना गौरैया ।
नमस्ते namaste
शब्दों में बुने भाव भले लगते हैं । स्याही में घुले संकल्प बल देते हैं ।
रविवार, 1 फ़रवरी 2026
लौट आना गौरैया का
शनिवार, 24 जनवरी 2026
सरस्वती पूजा
बचपन में कहती थी नानी
सरस्वती पूजा की कहानी
पीले वस्त्र पीले फूलों की,
पीले नैवेद्य की पीली थाली
पर देवी जिनकी पूजा होती
पहनें श्वेत रंग की ही साङी
सफ़ेद हँस की उनकी सवारी
पय समान और शुभ्र हिम सी
माँ शारदे की छवि उजियारी ..
खेतों में पीली सरसों जो फूली
हरी-भरी डाली पर फूल बेशुमार !
हो गई वसंत आगमन की मुनादी
बही बसंती पवन बाँध पग में नूपुर !
गेंदे की लङियों से सजावट सारी
धूप और पुष्पों की सुगंध सुवासित !
समस्त कला-कौशल की अधिष्ठात्री
माँ शारदा की वंदना करते पंक्तिबद्ध..
संगीत वाद्य वृंद ने झंकृत किए तार
मृदुल सुरों ने अर्पित की मधुर रागिनी
सुर स्तुति सुन मुसकाई वीणापाणि
माँ के नयन ज्यों गहरी नदिया में नैया
माँ की दृष्टि, सृष्टि तरणी की खेवैया ।
माँ की नासिका पर कौंधे हीरे की कनी
मुख से फूल झरे हरसिंगार से शब्दिता ।
कंठ में पहने देवनागरी की वर्णमाला
सुगंधित सतरंगी कुसुम कली मुक्ता मणि
कर में धारण कर कमल और जपमाला,
करकमल में कलम से लिखी स्नेह पाती
चित्रकला, नृत्य, नाट्य की वरद हस्तमुद्रा ।
अभिव्यक्ति सरल, सहज , सत्यनिष्ठ हो ।
विद्या से ज्ञान , विनय, विवेक जाग्रत हो ।
प्रकृति के विविध रुपहले चित्र अंकित हों ।
ह्रदय के स्पंदन में इंद्रधनुषी तरंग हो ।
मौन मुखर, वाणी ओजस्वी, मधुर बैन हों ।
कल्पना की अल्पना रचना मनमोहक हो ।
शब्द अलंकार ,भाव की शुभ प्रतिध्वनि हों ।
जीवन में रस उपजे ऐसा तुम सृजन करो ।
जङता का तम हरो, सुमति और संवेदना दो ।
रविवार, 18 जनवरी 2026
मौन की भाषा
मौन एक भाषा है
समस्त सृष्टि के मध्य
सहज संवाद की ।
सूर्योदय मौन ,
चंद्रोदय मौन ..
दिवस रात्रि मौन..
फूलों का खिलना मौन ।
शब्द मौन..संवेदना मौन ।
मन जुङने की पुलक मौन ।
मौन भीगे नयनों की भाषा ।
मौन ह्वदय की अभिलाषा ।
मौन रह कर सुना जाता है,
जो रह गया था अनसुना ।
मौन बुनता है शब्दलोक
मौन रचता है बूँद-बूँद संगीत ।
मौन करता है सृजन।
विवेचना जीवन की ।
मौन गढ़ता है स्मृति ।
मौन सुनाता है इतिहास ।
मौन लिखता है किताब ।
सोख लेता अश्रु का सैलाब ।
मौन बदलता है दृष्टिकोण।
देखने देता है दूसरा पक्ष ।
यज्ञ की समिधा है मौन ।
मौन गहरे पैठ पा जाता है मर्म।
मौन है गहरे कूप का जल ।
मन प्रांत कर देता शीतल ।
मौन का आकाश है स्वतंत्र।
मौन की व्याख्या है मौन ।
मौन आत्म विश्लेषण
दिखाता है दर्पण ..
मौन जगाता शक्ति,
दृढ़ करता मनोबल,
सुलझाता उलझे तार ।
बहुधा मौन बन कर खेवैया
किनारे लगा देता है नैया ।