यात्रा में हैं सभी
संग में प्रभु भी,
साथ-साथ चलते
उंगली पकङ के ।
बात सुनते ध्यान से
मंद-मंद मुस्कुराते।
पूछ लो किसी से !
सदा साथ ही थे !
भक्त लेकर चले
कांवङ श्रद्धा से ।
शिव शंकर भोले
कब साथ नहीं थे ?
उधर जगन्नाथ चले
संग बलभद्र सुभद्रा के,
रथ पर सवार हो के
मंदिर से बाहर निकले,
जो प्रवेश पा न सके
उन भक्तों से मिलने ।
व्यापक वर्तुल दृष्टि से
चहुँ ओर सबको देखते,
अपनी कृपा दृष्टि से
सबकी व्यथा हरते ।
नयनों से करुणा बरसाते
हाथ पकङ खूब नचाते
झूमते लय में, वलय में ।
घंटों की गर्जना ताल में
जन समुद्र में लहरें उठाते
कालिया चितचोर हमारे !
व्योम से विशाल नयनों में
जगत के दुख समा जाते ।
स्वच्छ मन स्फटिक जैसे
बरबस आनंद मग्न हो जाते ।
उधर वारकरी प्रस्थान करते
नाम जपते, भाव अभंग गाते,
मृदंग पर थाप देते आगे बढते
मंजीरा बजाते ब्रह्मनाद करते,
सुन काले मेघ भी जुङ आते
भावावेग में घुलते ही जाते।
स्वर लहरी में अविरल बहते
वारकरी ठौर पाते चंद्रभागा तीरे।
शीश पर तुलसी के पौधे
हर्षित मंजरी-पत्र लहलहाते।
कीर्तन की पालकी उठाए
वृष्टि में रस सृष्टि करते
नाम सुधा पान कराते ।
ईंट पर कब से खङे
बाट जोहते विठु से मिलने
आनंदाची वारी आगे बढाते ।
साथ कब नहीं थे ?
गरजते-बरसते-नाचते
ह्रदय में सदा ही बसे थे ।
श्री हरि विट्ठल पुकारते
नामदेव,तुकाराम, ज्ञानेश्वर,
भक्ति, प्रेम, बंधुत्व बांचते
पंढरपुरी वारी उत्सव मनाते ।
यात्रा में उपस्थित हैं सभी
भक्त संग भगवान भी ।
नमस्ते namaste
शब्दों में बुने भाव भले लगते हैं । स्याही में घुले संकल्प बल देते हैं ।
शनिवार, 8 अगस्त 2026
यात्रा में हैं सभी
शनिवार, 18 जुलाई 2026
जगन्नाथ से संवाद
सुनो सुनो माँ एक दिन की बात
जब मन था मेरा बहुत उदास ।
झमाझम हो रही थी बरसात
माँ तुम क्या,कोई नहीं था पास ।
कहो किससे करता मैं संवाद ?
मन में उमङ-घुमङ रहे थे बादल
अश्रु धारा में घुल गया काजल,
घनघोर घटा-सी घिर आई रात,
नींद में सुना मंद मधुर शंखनाद
स्वप्न में मेरे आए स्वयं जगन्नाथ ।
पूर्णिमा के चंद्र से दुटी नयन
समाया जिनमें सकल भुवन,
देख रहे थे वे मुझको अपलक ।
मानो दो क्षीर सागर हों विशाल
मध्य में विराजते हों शालिग्राम ।
जिनकी दृष्टि में थी करुणा अपार
उनका अनुग्रह सृष्टि का आधार ।
"जगत के भूल सकल व्यवहार
बाहर आया हूँ स्वयं तुम्हारे पास ।
मुझसे कह दो क्या है मन में बात
कहो .. जबकि मुझे सब है ज्ञात ।"
माधव मुस्काये दोनों भुजा पसार ।
"आओ मैं ही तुम्हारा पालनहार
अंक में भर लूँ मैं तुम्हें एक बार।
दुख का नहीं करना व्यर्थ विचार
सहज सरल सेवा भक्ति का सार।"
पुलकित हो मैं उठा तत्क्षण जाग
ह्रदय में उठने लगी आनंद हिलोर,
खींचने रथ की अटूट पावन डोर
चल दिया माँ मैं भी मंदिर की ओर ।
बलभद्र, सुभद्रा सहित चक्रधर
भक्तों के संग, भक्त भाव विभोर ।
वर्षा में धुल गए कलुष समस्त
अब वही वृष्टि पावन जलधार ।
शीष पर मोरमुकुट तुलसी दल ,
हिल-डुल प्रसन्नवदन आनंदकंद
नीलमाधव महाप्रभु जय जगन्नाथ ।
रविवार, 5 जुलाई 2026
धूप ने छाँह कमाई
सूरज की रोशनी औरपरछाइयों के बीच कहींज़िंदगी ने जगह बनाई ।धूप-छाँव की जुगलबंदीवक्त की तर्ज पर रची गईज़हन में पहरों गूँजती रही,जोङती गई यादें पाई पाई ।अलगनी पर दिन भर टँगीधूप सेंकती रही कमीज़जेब में रखी छाँह कमाईरात भर चैन की नींद आई ।भोर उजियारी चुनौती लाईआँचल में तारे भर ले आईतारों को बो कर धूप उगाईछाँव बिन धूप रास न आई ।सूरज की रोशनी औरपरछाइयों के बीच कहींज़िंदगी ने जगह बनाई ।