बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

धरा की आत्मजा सिया


माँ जानकी सीता का स्मरण बारंबार 

मुझ में बो दे धैर्य और पावन संस्कार


माँ को नित यही प्रार्थना करते देखा

जब बालक ने तो उत्सुकतावश पूछा

बोने की बात करे यह कैसी है वंदना ?

माँ ने हाथ जोङे फिर सोच कर कहा

जानते हो ना धरा से जन्मी हैं माँ सीता


धरती से ही हर बीज प्रस्फुटित होता

जङें हम सबकी धरती के मर्म में हैं ना

सृष्टि का भार समस्त धरती ने समेटा

माटी से उगता है,माटी में मिल जाता

जीवन क्रम सारा साक्षी भाव से देखा


धैर्य न डिगा माँ का जब आई विपदा

सुख-दुख की वृष्टि के जल को सोखा

आर्द्रता से संकट में साहस को सींचा

आत्मबल से सीता जी ने संग्राम जीता

संस्कार के अलंकार धारण करती माँ।


बाल मन के भोलेपन ने क्या समझा ?

माँ के स्वरुप की छवि को कैसे आंका..


भूमिजा सीता का मन उदार धरती जैसा

प्रफुल्ल प्रकृति ने भाव अभिव्यक्त किया

कोमल कुसुम कली श्रृंगार धानी ओढ़ना 

पुष्पों की वेणी गूंथ कर की केश सज्जा

नयनों में उमङती  सरस्वती और यमुना 


वाणी में मधुर कल-कल जल प्रपात बहता

वरद हस्त संकट, विषाद , क्लेश हर लेता

जङमति होवे सुमति, चरणों में शीश नवा 

रघुनंदन राम की शक्ति परम पुनीता सिया

राघव की भक्ति में लीन सदा समर्पित सीता 


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माँ जानकी छवि अंतरजाल से आभार सहित

 



रविवार, 1 फ़रवरी 2026

लौट आना गौरैया का


आ रही थी बहुत याद गौरैया की,

दिन भर आसपास चहचहाने की ।

चुगती थी दाना, तुलसी की मंजरी,

मिट्टी के बरतन से पीती थी पानी ।

छपाक-छपाक खेलती, नहाती थी,

पास जाओ तो फुर्र उङ जाती थी ,

फिर भी वो मेरी पक्की सहेली थी !

मेरी दिनचर्या के नेपथ्य में रहती थी,

उस पर हमेशा मेरी निगाह रहती थी ।

व्यस्त जीवन में राहत की घङी थी,

सूनेपन में चहकती सुनहरी स्मृति..

फिर घर आना गौरैया का थम गया  ..


इसलिए जब सुना आज चहचहाना,

लगा लौट आया दोबारा कोई अपना ।

वो अपना जिसका होना ही बहुत था ।

गर्दन घुमा चतुर्दिक देखना संवाद था ।

क्यारी में, गमले पर, तारों पर झूलना,

छज्जे से उङ कर खिङकी पर आना,

बाहर से झाँक कर मुआयना करना ,

फिर चहकने लगना ..आश्वस्त करता ।

मुझसे तुम्हारा रिश्ता दखल नहीं देता,

लेकिन लगता है जैसे तुमने ही समझा ।

मेरे मन का मंगल गीत हो तुम गौरैया,

जहाँ भी जाओ लौट कर आना गौरैया ।

 

शनिवार, 24 जनवरी 2026

सरस्वती पूजा


बचपन में कहती थी नानी

सरस्वती पूजा की कहानी

पीले वस्त्र पीले फूलों की,

पीले नैवेद्य की पीली थाली

पर देवी जिनकी पूजा होती

पहनें श्वेत रंग की ही साङी

सफ़ेद हँस की उनकी सवारी

पय समान और शुभ्र हिम सी 

माँ शारदे की छवि उजियारी ..



खेतों में पीली सरसों जो फूली

हरी-भरी डाली पर फूल बेशुमार !

हो गई वसंत आगमन की मुनादी

बही बसंती पवन बाँध पग में नूपुर !

गेंदे की लङियों से सजावट सारी

धूप और पुष्पों की सुगंध सुवासित !

समस्त कला-कौशल की अधिष्ठात्री

माँ शारदा की वंदना करते पंक्तिबद्ध..

संगीत वाद्य वृंद ने झंकृत किए तार

मृदुल सुरों ने अर्पित की मधुर रागिनी

सुर स्तुति सुन मुसकाई वीणापाणि


माँ के नयन ज्यों गहरी नदिया में नैया

माँ की दृष्टि, सृष्टि तरणी की खेवैया ।

माँ की नासिका पर कौंधे हीरे की कनी

मुख से फूल झरे हरसिंगार से शब्दिता ।

कंठ में पहने देवनागरी की वर्णमाला

सुगंधित सतरंगी कुसुम कली मुक्ता मणि

कर में धारण कर कमल और जपमाला,

करकमल में कलम से लिखी स्नेह पाती

चित्रकला, नृत्य, नाट्य की वरद हस्तमुद्रा ।


अभिव्यक्ति सरल, सहज , सत्यनिष्ठ हो ।

विद्या से ज्ञान , विनय, विवेक जाग्रत हो ।

प्रकृति के विविध रुपहले चित्र अंकित हों ।

ह्रदय के स्पंदन में इंद्रधनुषी तरंग  हो ।

मौन मुखर, वाणी ओजस्वी, मधुर बैन हों ।

कल्पना की अल्पना  रचना मनमोहक हो ।

शब्द अलंकार ,भाव की शुभ प्रतिध्वनि हों ।

जीवन में रस उपजे ऐसा तुम सृजन करो ।

जङता का तम हरो, सुमति और संवेदना दो ।