सोमवार, 23 मार्च 2026

चैत्र प्रतिपदा अभिनंदन


नव संवत्सर चैत्र प्रतिपदा

पूरब में सूरज उदय हुआ 

आज अयोध्या में आगमन

सियाराम लखन का पुन: 


आरंभ हुआ नवीन अध्याय

संघर्ष और विजय का पर्व

समय की समता का उत्सव

नव चेतना का शुभ पदार्पण 


लहराई गुङी जय की ध्वजा

वंदनवार आम्र पत्र की सजा

नीम के फूल-पत्र से अर्चना

कोयल कर रही मधुर वंदना


प्रसाद औषधि समान मिला

नीम से कटु अनुभव पश्चात

गुङ सा मीठा सुख भी मिला

जीवन का स्वाद मिलाजुला


कच्ची अमिया की खटास

दाँत खट्टे करती चुनौतियाँ

उत्साह की नमकीनियत

मिर्च सरीखी तीखी ऊर्जा


इमली सी खट्टी-मीठी याद

जीवन के सारे विरोधाभास 

ऋतु परिवर्तन का आभास

प्रासंगिक सदा सभी स्वाद ।


फिर से आरंभ अनुसंधान 

जीवन का नूतन अनुष्ठान

विभिन्न रसों का आस्वादन 

शुभ सिद्ध हो नव संवत्सर!


रविवार, 22 मार्च 2026

अँजुरी भर जल


नदिया का जल बहता कल-कल

नयनों से अश्रु प्रवाहित अविरल 

सूर्य को अर्पित अर्घ्य अंजुरी भर

वर्षा ऋतु में जल बरसे लगातार ।


जल ही है तरल भाव जीवन का

मिट्टी और ह्रदय को सींचता जल

गीली मिट्टी में अंकुरित होता बीज

ज़ख्मों पर मरहम जैसी नज़रें नम ।


सागर,नदी,तालाब, झील,सरोवर,

बरसात के पोखर, कुँए का जल,

ऋतुचक्र सदा संचित करता जल

हर बूँद में झिलमिलाता इंद्रधनुष !


अपार है सभी जलाशयों का बल,

पहाङ काट के राह बना लेता जल,

बाधित नहीं, दूषित नहीं करें जल

दो पाटों के मध्य समाधान सकल ।



शनिवार, 21 मार्च 2026

शायद कविता


कविता लिखी नहीं

पढी ज़रुर,सुनी भी ,

अक्सर समझी भी नहीं,

लेकिन महसूस की ..


जब अच्छी लगी

घोट कर पी ली,

नज़रअंदाज़ की

तो पेङ पर पतंग सी

उलझ गई , 

नज़र सी अटक गई।


कोई बात अकस्मात

दिल को छू गई, 

किसी के बोल 

नश्तर सा चीर गए,

किसी का कहा

झिंझोङ गया,

व्यथा की नदी

सहसा उमङ पङी,

ह्रदय की थाप

शब्दों की गहरी छाप..

भीतर कुछ बदल गई..


खाली काग़ज़ देखते ही

कलम चलने लगी,

जो बात मन में थी..

कहनी ही थी..

लिख दी...

पता नहीं तुक बनी या नहीं,

शायद कविता ही थी ।