Monday, 31 August 2020

ना छोड़ेंगे अकेला

होने चाहिए
हर आदमी की
ज़िंदगी में
मुट्ठी भर ऐसे लोग
जो आपकी चुप्पी का
बहुत बुरा मानें ।
अपनी नाराज़गी से
आपको खंगालें,
मजबूर कर दें,
अपनी चुप्पी
उंडेल देने को ।
ये जताने को कि 
फ़र्क पड़ता है उन्हें
हमारे होने या
ना होने से ।
आश्वस्त करने के लिए
कि वो हमेशा रहेंगे
मौजूद कहीं आसपास
आपको तंग करने के लिए ।
जीना हराम कर देंगे ।
पर अकेला नहीं छोड़ेंगे ।

Saturday, 29 August 2020

The Colour Palette


I like the way
The green leaves
Of bougainvillea
Slowly put on
A shade of pink
A mellow yellow 
And sage green,
Before a full bloom..
Opening your heart
To the much awaited
burst of colour...
A fashionable pink
Silent sombre white
Or a go between
Peach and orange !

Same with the rose.
A touch of vermilion
On some leaves
All set to roll out
A red carpet
To welcome 
The blooming bud first,
And then
Sashaying in 
The ever graceful 
Most beautiful rose
Striking a poignant pose
Wearing an endearing fragrance.

This is how nature blooms.
The seasons change.

Witnessing the flowering,
The bees buzzing busily
Greeting the butterflies
Basking in sunshine,
Harnessing the nectar
Making honey..
Gradually carves out
A vast warm embracing 
Space within,
To absorb
The inevitable and
The inexplicable changes,
And learning to discover 
A purpose 
In the different shades
Of the colour palette
Named life.

Sunday, 23 August 2020

ये भी नहीं


फूल नहीं,
फूल की खुशबू नहीं ।
आकाश का छलकता
गहरा नीला रंग नहीं ।
बादलों के पंख नहीं ।
चंद्र और सूर्य नहीं ।
बारिश में भीगी
मिट्टी की सुगंध नहीं ।
नदी का भंवर नहीं ।
कल कल बहता 
जल भी नहीं ।
नैया नहीं, खेवैया नहीं ।
आँगन के कुँए का 
मीठा पानी भी नहीं ।
रूप की लुनाई नहीं ।
शिशु की किलकारी नहीं ।
बगीचे की फुलवारी नहीं ।
धनुष पर चढ़ी प्रत्यंचा नहीं ।
यौवन का मुक्त हास नहीं ।
वय का विलाप नहीं ।
पश्चाताप नहीं ।
प्रकृति का श्रृंगार नहीं ।
पक्षी का गान नहीं ।
ज्ञान की गरिमा नहीं ।
प्रारब्ध का अट्टहास नहीं ।
बचपन की मधुर स्मृति नहीं ।
शब्दों का द्वंद नहीं ।
नवरस अलंकार नहीं ।

ये सब नहीं ।
इन सबके होने की
गहन अनुभूति ही 
कविता है ।


Wednesday, 19 August 2020

कभी जाना नहीं कैसे


रात्रि के सूने निविड़ अंधकार में
निकल पड़ो अकेले अनमने से
रास्ता नापने निस्तब्ध निर्जन में
तो जान पड़ता है चलते-चलते
बहुत कुछ है अपनी परिधि में जिसे
जान कर भी कभी जाना नहीं कैसे 

न पत्तों की सरसराहट न कोई पदचाप
ऐसे में दूर कहीं से आने लगी मंद-मंद
मंदिर के घंटों की ध्वनि लयलीन और स्पष्ट
हृदय का कोलाहल करती शांत और आश्वस्त
गगन पर टंके चंद्रमा को भी हो रहा कौतूहल
बोझिल परिवेश में हुआ भला-सा परिवर्तन

अनायास ही खुल गए स्मृति के बंद किवाड़
मंदिर जाने के मार्ग में पड़ता था एक घर
टूटी-फूटी ईंटों से झांकता कुटिया का कोना
ढिबरी की रोशनी में मंजीरों का स्वर मधुर
एक साधु अपने में मगन गाता रहता भजन

आते-जाते बना रहा बरसों तक यह क्रम
कीर्तन में डूबा भक्त प्रसन्न भाव अविचल
रस यमुना प्रवाहित होती रहती प्रतिपल
लहर-लहर लयबद्ध प्रवाहित यमुना जल
तट पर हो रहा गान झिलमिलाता दीपदान

Tuesday, 7 July 2020

बौराई सुबह


सुबह हो गई है ।
देखो ठंडी हवा बह रही है ।
पहाड़ी चमेली खिली है ।
अमलतास झूम रहा है ।
तमाल ध्यानावस्थित
और भी घना लग रहा है ।

तुलसी के पौधे मानो
संकीर्तन में मग्न
ठाकुर द्वारे पर समवेत
प्रफुल्लित प्रतीक्षारत
हरि को समर्पित 
होने को तत्पर ।

वो दूर खड़ी कर्णिका
सोच में डूबी हुई सी
हिलडुल कर जता रही
सेवा व्रत लेने की सहमति ।

हरी घास लग रही
और भी हरी ..
नरम दूब मखमली ।

और अभी-अभी कोई
स्थल कमल के पत्ते पर
रख कर मुट्ठी भर मौलश्री 
थमा गया है ।

सहसा सब कुछ बदल गया है ।
आकाश में फड़फड़ाती नवरंगी पतंग
अब सुरों की तरह सध गई है ।

मौसम रहमदिल हो गया है ।
हथेली में खुशबू बस गई है ।
जैसे मेंहदी रचती है ।
क्या हो यदि यही बौराई सुगन्ध
गुपचुप समा जाए 
हाथ की रेखाओं में !
बदलें नहीं हाथ की रेखाएं
बस बौरा जाएं !

देखो रंग-रंग के अनगिनत 
फूल खिले हैं ।
तुम भी खिलो ।
खाली खानों में रंग भरो ।

आज के दिन का स्वागत करो । 
चहचहाती चिड़ियों का गान सुनो । 

स्वर सरस्वती सुब्बलक्ष्मी का सुप्रभात
झकझोर कर जगा रहा है ।
जीवन में रस घोल रहा है ।
बिजली की तरह कौंध रहा है 
तुम भी कौंधो !

भ्रमर बन फूलों का मधु रस चखो ।
पराग हृदयंगम करो 
मौलश्री की बौराई सुगंध बनो ।

सुबह हो गई है, उठो ।

Monday, 6 July 2020

अपने में क्या रहना ?



कभी देखा है 

किसी वृक्ष को 
अपने में 
सिमट कर रहते ?

वृक्ष की जड़ें
मिट्टी में जगह
बनाती जाती हैं ।
वृक्ष की शाखाएं
बाहें पसारे
झूला झूलती हैं,
पल्लवित होती हैं ।

फूल खिलते हैं
जब पंखुरियाँ
घूँघट खोल
श्याम भ्रमर को
भोलेपन से तकती हैं ..
हौले से खिलती हैं ।
खिलती हैं नृत्य मुद्रा में,
सुगंध घोलती हुई
धीर समीर में,
लयबद्ध लहर लहर ।

फिर फल आते हैं,
पक कर गिर जाते हैं,
धरती की झोली में ।
पत्तियों की ओट में
पंछी टहनी टहनी
जोड़ घोंसला बनाते हैं ।

ये सब इसलिए
कि खुली बाँहों में ही
आकाश समा पाता है ।
क्योंकि निरंतर बहना
नदी को निर्मल बनाता है ।

इसलिए नदी की तरह बहना ।
खुशबू की तरह हवाओं में
घुलमिल कर जीना ।
सिर्फ़ अपने में क्या रहना ?



Friday, 26 June 2020

रिश्तों का मर्म

रिश्ते 
रेत के महल होते हैं ।
भव्य सुंदर मनोरम
पर एक लहर आए
तो ढह जाते हैं ।
उंगलियों के बीच से
रेत की तरह 
फिसल जाते हैं,
देखते-देखते ।
जतन ना करने से
और कई बार
बिना किसी वजह
रीत जाते हैं ।

संबंध
छीज जाते हैं ।
जैसे छलनी में से
जल ।
अश्रु जल से
बह जाते हैं,
जब बांध
टूट जाता है ।

भवितव्य
पता किसे ?
पर रिश्ते
बनते ही हैं
भले टूट जाएं
कालांतर में ।
बदल जाएं
अनायास ।

स्वभावगत 
क्रम टूटता नहीं पर
प्रकृति का ।
कण-कण जुड़ा है,
एक दूसरे से ।
रिश्ते ना जुड़ें
ये हो सकता नहीं ।
रिश्तों के बिना
आदमी जी सकता नहीं ।

तो क्या हुआ ?
रिश्ते बनाना-निभाना
कष्टप्रद हो या सुखद
व्यर्थ नहीं जाता 
रिश्ते जीना ।

हर रिश्ता
कोई बीज बो जाता है ।
फले ना फले बीज
वृक्ष बन ही जाता है ।
वृक्ष की सघन छाँव में
संभव है एक दिन
कोई थक कर बैठे
और समझ पाए
लेन-देन से परे
रिश्ते-नातों का मर्म ।