गुरुवार, 18 जून 2026

गाँठ बाँध ली बात



बरस दर बरस गाँठ बाँध ली हर वो बात
जो थी सहज, सरस, ह्वदय के निकट,
या इसके विपरीत छीन ले गई सब सुख-चैन,
और कर गई हठात, मर्म पर कुठाराघात ।
करने बैठे एक दिन जो हिसाब-किताब ,
एक-एक कर खोली गाँठ तो समझे विज्ञान ।
बाँसुरी के छिद्रों में समाई श्वास से उपजे संगीत,
चाखो जब गन्ने की गाँठों के बीच भरा रस,
तब जानो गाँठ-गाँठ में हो रहा रस का सृजन ।
कुछ गाँठें होंगी नीरस, लेखा-जोखा सपाट ।
पर गाँठ बाँधी बात आङे वक्त में आती काम ।
पल्ले में जैसे गाँठ बाँध अम्मा रखती थीं याद,
बाहर जाने पर दो-चार रुपैया रखती थीं साथ,
या गुपचुप माँगती रहती थीं मन्नत, मन ही मन ।
गठरी में मार के गाँठ सुख-दुख समेटते रहना।
यात्रा में साथ रखते हैं ज़रुर.. जैसे चना-चबैना 
वैसे ही लाज़िमी है,सीख की गिरह बाँधते रहना ।


बुधवार, 17 जून 2026

वो एक जोङी नयन


वो एक जोङी नयन
विशाल वर्तुलाकार 
उनका पावन सम्मोहन
पारदर्शी नदी का जल
शीतल हुआ ह्रदयतल
स्निग्ध चंदन का लेपन
वो एक जोङी नयन..

वो एक जोङी नयन
पट की ओट से गोपन
अपलक अवलोकन ।
दीपज्योति मध्यम, 
धूमिल होता अंतर ।
सर्वस्व हर लेते तत्क्षण
वो एक जोङी नयन ।

वो एक जोङी नयन
समाया जिनमें संसार
अथाह करुणा अपार ।
अश्रु जल बिंदु साकार
घुल गया मानो काजल
सुदर्शन विस्तार सजल
वो एक जोङी नयन ।

श्याम भ्रमर विद्यमान 
गुंजायमान नाद ओंकार ।
रथ चक्र की धुरी समान
पुतली तुम्हारी घनश्याम ।
डिठौना जगत आनन पर
दैदीप्यमान हे जगन्नाथ !
वो एक जोङी नयन ।



गुरुवार, 11 जून 2026

गुलमोहर खिल रहे हैं


बाहर मौसम तप रहा है ।

भीतर आलस्य पक रहा है ।

अवसाद पनप रहा है ।

शिकायतों से पन्ने भर रहा है ।

हताशा का बादल घुमङ रहा है ।

पर पसीना बरस रहा है ।

घर उबल रहा है ।

सौ-सौ उलाहने दे रहा है ।

हिलना-डुलना डस रहा है !


बस करो भैया ! बिल बढ़ रहा है !

खिङकी की संध से तनिक बाहर देखो ।

देखो बाहर क्या उत्पात हो रहा है ..

मजदूर फेंटा बाँधे मरम्मत कर रहा है ।

चिलचिलाती धूप में चीले सा सिक गया है ।

काम पर जाने वाले जूझ रहे हैं..

पर किसी तरह मोर्चा सँभाले हुए हैं ।

स्कूल से छूटे बच्चे भुन कर लाल हो गए हैं ।

लोहे के चने चबाना सीख रहे हैं । 

पर सूर्य देवता हरगिज़ न पसीज रहे हैं ।

फिर भी सारे काम बदस्तूर हो रहे हैं ।


मौसम के मिज़ाज जितने बिगङ रहे हैं ।

गुलमोहर उतने ही दहक रहे हैं ।

टूट कर खिल  रहे हैं..गीत बन गए हैं ।

क्यों न हम भी चलें रंग बटोरने के लिए !

देखो तपते हुए गुलमोहर खिल रहे हैं !