सोमवार, 20 अप्रैल 2026

अक्षय अन्न का हर दाना


पराक्रमी पांडव पाँच और पांचाली

तपस्वी जीवन जी रहे थे  वनवासी

न्यूनतम से थे संतुष्ट महलों के वासी

संचित करते नित अक्षय ऊर्जा सभी


परंपरा अनुसार रूखा-सूखा जो भी

होता था प्राप्त आपस में लेते थे बाँट

जिमा कर सबको बैठी जीमने द्रौपदी

पाया अल्प आहार समझ कर प्रसाद


इतने में कूक कोयल की दी सुनाई

पवन सुगंधित चली बूँदा-बाँदी हुई 

नृत्य करते मयूर मानो आई शुभ घङी

जलज मंगल घट लिए घिरी मेघावली


द्वार पर ठाङे केशव कर में लिए वंशी

सहर्ष उठ धाए पांडव सभी देख हरि

सब भूल पांचाली भी स्वागत को उठी

किंतु क्या लगाऊंगी भोग सोच में पङी


मोहन ने आसन किया ग्रहण और बोले

सखी, भोजन परस दो भूख बहुत लगी

द्रौपदी संकोच से सिकुङी खङी रह गई 

पात्र सब टटोले कुछ न था प्रभु के लिए 


श्री कृष्ण भांप गए असमंजस, मुस्काए

द्रुपद सुता हतप्रभ खङी हाथ में पात्र थामे

गोविंद ने झट से पात्र ले लिया हाथों से

द्रौपदी की दृष्टि झुकी नयनों के कोर भीगे


अपनी उंगली से उठा एक चावल का दाना

माधव ने बङे प्रेम से अपने मुख में डाला

आज मैं भोग लगाकर अत्यंत तृप्त हुआ 

कृष्णा सखी की आँखों से बही अश्रु धारा


गिरिधर ने द्रौपदी को भोजन पात्र लौटाया

और उसे अक्षय पात्र होने का वरदान दिया

कृष्णा भाव से अर्पित अन्न का प्रत्येक दाना 

तृप्ति देता मुझे अत: अन्न का हर कण बचाना



संदेश - अन्न का एक-एक दाना

चित्र अंतरजाल से आभार सहित 



शनिवार, 18 अप्रैल 2026

अक्षय धरोहर


जो कला, संस्कृति, परंपरा,सृजन

स्मृति में चिन्हित हो चुका है,

हमारा परिचय बन चुका है,

सदियों से समय के झंझावत

झेल कर भी टिका हुआ है,

वह हमारी अमूल्य धरोहर है ।

हमारे अस्तित्व का शिलालेख है ।

इतिहास से परे यह वो नाता है,

जो बिना कोई नाम दिए भी

हमसे जुङा है..हमारे साथ ही

चल रहा है अपनी छाप छोङता

समृद्ध हो रहा है ,आकार ले रहा है ।

सभ्यता की इस कथा का अंत नहीं होता ।

सहेज कर रखी जाती है धरोहर अवचेतन में

जब तक सौंप न दिया जाए भावी पीढ़ियों को,

तब तक पोषित करनी है, जीवन की हर विधा।

साहित्य, नृत्य, संगीत, स्थापत्य कला, संवाद

जो नदी और पर्वत श्रृंखला की तरह है स्थायी 

राग जीवन का, वो सब कुछ जिसे हम कह सकें,

नि:संकोच, गौरव से सदा, अपनी धरोहर अक्षया ।


बुधवार, 15 अप्रैल 2026

कलावती


गोबर से लीप कर 

तैयार की गई भित्ती पर

खङिया और लाल मिट्टी से 

जीवन के प्रतीक चित्र 

उकेरती स्त्री सबसे अनूठी

कलाकार है ।


उसने जो देखा वही 

अपना लिया ।

जो जिया उसे ही

गोल, चौकोर,सीधी

और कभी घुमावदार 

रेखाओं में उतार दिया ।


रंग तो दो ही थे, उनसे ही

अद्भुत रचना कर दी ..

मिट्टी पर बनी आकृतियाँ

सजीव हो उठीं , गीत गाती

गुनगुनाती छवि से उसकी

मैत्री है चिरंजीवी ।

 

घर के काम-धाम निबटा कर, 

दोपहरी जब पसर जाती,

वो खूब बतियाती 

अपने रचे मोर, गौरैया, हंस,

खेत, दालान, कुँए की जगत,

नदी, तालाब, जामुन का पेङ,

कुटिया, बकरी, गाय, कुकुर,

जीवन के सारें संदर्भों को

उंगलियों के पोरों से महसूस करती

अपनी भित्ती पर चित्रित कर,

अनुभव के आङे-तिरछे खानों को

अपनी समझ के सौंधे रंगों से भर देती ..

उसकी कला है कालजयी ।


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                     छवि : अंतरजाल से साभार