शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

घंटी बजाती आई चिट्ठी


सायकिल की घंटी 

बजती थी जब

सुबह-सुबह, दूध वाले, 

अखबार वाले के आने की

इत्तिला देती थी ।

दोपहर के आसपास

सायकिल की घंटी बजाते

आते थे डाक बाबू..

खाकी यूनिफ़ाॅर्म पहने

खाकी टोपी लगाए,

खाकी बस्ते में लिए 

चिट्ठियों के पुलिंदे ।

अंतर्देशीय, पोस्टकार्ड, लिफ़ाफ़े,

मनी ऑर्डर और तार..

संदेसों की राह तकती

आस भरी निगाहें ।

दूर बसे अपनों से मन ही मन

निरंतर बातें करते-करते

कितने पत्र लिख दिए गए होंगे..

कितने भाव मोती बन कर

ढुलके होंगे,

काग़ज़ ने सोख लिए होंगे ..

कितने शब्द उतरे होंगे

काग़ज़ पर अपनी बात कहने..

कौन जाने ? 

पर पुरानी दराज़ों में अब भी

मिल जाते हैं हाथ से लिखे ख़त 

जिन्हें छू कर और पढ़ कर 

याद आ जाती है डाक बाबू की

खाकी वर्दी और दूर से आती

सायकिल की जलतरंगी घंटी ।



चित्र : अंतरजाल से साभार  




शनिवार, 15 अगस्त 2026

राखी भेजना भूल न जाना


बहना तीज का सिंधारा तुम्हारा

आज किसी के हाथ है भिजवाया ।

घेवर,मेंहदी,टिकुली,पायल,चूङी,

बोरला और लहरिया साङी धानी,

झुमके छल्लों वाले जो तुम्हें भाते ।

कुछ पौधों के बीज हैं तेरी पसंद के।

बारिश में भीगी अभी नरम है मिट्टी,

अपना लेगी बीज,अभी जो बो दोगी।

वर्षा की बूँदों से सजी हुई है धरती,

काजल से काले बादल घिरें कभी,

घुल-घुल बरखा की लग जाए झङी।

स्मृतियों के मयूर तब पंख फैलाएंगे,

छम-छम करते मेघ मल्हार गाएंगे।

पानी के बुलबुले, बचपन की यादें,

काग़ज़ की नाव जल में तैराएंगे !

झोके दे देकर झूला तुम्हें झुलाऐंगे

गीत पुराने आँखें नम कर जाएंगे ।


काम-काज में लेकिन भूल न जाना

राखी भैया-भाभी को भिजवाना ।

बहन ही नहीं भाई को भी रहती आस

आते-जाते डाकिये पर रहता ध्यान ..

एक लिफ़ाफ़े में राखी, रोली‐अक्षत

साथ रखी चित्रकारी वाली चिट्ठी !

अधिक नहीं दो-चार बातों वाली,

बस हाल-चाल गपशप बेमतलब की ।

लिखावट तुम्हारी बाकी सब कह देती ।

सूत भर का ही तो है भाई-बहन का नाता

राखी के धागों में पिरोया सूत्र रक्षा का ।



शनिवार, 8 अगस्त 2026

यात्रा में हैं सभी


यात्रा में हैं सभी

संग में प्रभु भी,

साथ-साथ चलते

उंगली पकङ के ।

बात सुनते ध्यान से

मंद-मंद मुस्कुराते।

पूछ लो किसी से !

सदा साथ ही थे !


भक्त लेकर चले

कांवङ श्रद्धा से ।

शिव शंकर भोले

कब साथ नहीं थे ?


उधर जगन्नाथ चले

संग बलभद्र सुभद्रा के,

रथ पर सवार हो के

मंदिर से बाहर निकले,

जो प्रवेश पा न सके

उन भक्तों से मिलने ।


व्यापक वर्तुल दृष्टि से

चहुँ ओर सबको देखते,

अपनी कृपा दृष्टि से

सबकी व्यथा हरते ।

नयनों से करुणा बरसाते

हाथ पकङ खूब नचाते 

झूमते लय में, वलय में ।


घंटों की गर्जना ताल में

जन समुद्र में लहरें उठाते

कालिया चितचोर हमारे !


व्योम से विशाल नयनों में

जगत के दुख समा जाते ।

स्वच्छ मन स्फटिक जैसे

बरबस आनंद मग्न हो जाते ।


उधर वारकरी प्रस्थान करते

नाम जपते, भाव अभंग गाते,

मृदंग पर थाप देते आगे बढते

मंजीरा बजाते ब्रह्मनाद करते,

सुन काले मेघ भी जुङ आते

भावावेग में घुलते ही जाते। 

स्वर लहरी में अविरल बहते

वारकरी ठौर पाते चंद्रभागा तीरे।


शीश पर तुलसी के पौधे

हर्षित मंजरी-पत्र लहलहाते।

कीर्तन की पालकी उठाए

वृष्टि में रस सृष्टि करते

नाम सुधा पान कराते ।


ईंट पर कब से खङे 

बाट जोहते विठु से मिलने

आनंदाची वारी आगे बढाते ।

साथ कब नहीं थे ?

गरजते-बरसते-नाचते 

ह्रदय में सदा ही बसे थे ।


श्री हरि विट्ठल पुकारते

नामदेव,तुकाराम, ज्ञानेश्वर,

भक्ति, प्रेम, बंधुत्व बांचते

पंढरपुरी वारी उत्सव मनाते ।


यात्रा में उपस्थित हैं सभी

भक्त संग भगवान भी ।