वट वृक्ष सरीखा हो तुम्हारा रिश्ता
जङें गहरी हों इतनी थामे रहें सदा
वरदान सी विराट वट की छत्रछाया
यम को कर प्रसन्न तत्क्षण वर पाया
गठजोङा अटूट समर्पण-प्रेम का
सत्यवान ने सावित्री कवच पाया
शब्दों में बुने भाव भले लगते हैं । स्याही में घुले संकल्प बल देते हैं ।
वट वृक्ष सरीखा हो तुम्हारा रिश्ता
जङें गहरी हों इतनी थामे रहें सदा
वरदान सी विराट वट की छत्रछाया
यम को कर प्रसन्न तत्क्षण वर पाया
गठजोङा अटूट समर्पण-प्रेम का
सत्यवान ने सावित्री कवच पाया
सवाल बहुत थे मेरे पास..
बहुत सवाल पूछे..
जवाब जो मिले,
वो अक्सर धुँधले थे ।
माने सवाल पूछते-पूछते
खुद सवाल बन गए !
कोरे काग़ज़ पर
सिर्फ़ एक प्रश्नचिह्न।
जवाब के बिना
हर सवाल है अधूरा ।
सवाल पर औंधा लटका
कोई कैसे जिए ?
इसलिए..
अब ये भी कर के देखेंगे..
जवाब बन कर जिएंगे ।
नख पर गिरि गोवर्धन उठा लिया ।
नख से ही हिरण्यकशिपु को तारा ।
ना नर, ना मानव, नृसिंह रुप धरा ।
विराट चट्टान सा खंबे से प्रगट हुआ।
रौद्र स्वरुप ने जग का ह्रदय कंपाया,
प्रह्लाद ने पर करुणामय दर्शन पाया ।
ना दिन था ना रात जब काल आया
न्याय का ऐसा समय हरि ने ठहराया
दिवस रात्रि मध्य संधिकाल आया ।
इस घङी प्रभु आ विराजे देहरी पर ,
दानवराज अर्जित वर का रख मान ,
श्री नर हरि ने किया उसका उद्धार ।
क्षितिज पर मिलते हैं समय के दो छोर
असंभव को संभव कर हे लीलाधर !
निज भक्त प्रह्लाद को दिया करावलंबन ।
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चित्र साभार : अंतरजाल