रविवार, 5 जुलाई 2026

धूप ने छाँह कमाई

सूरज की रोशनी और
परछाइयों के बीच कहीं
ज़िंदगी ने जगह बनाई ।

धूप-छाँव की जुगलबंदी
वक्त की तर्ज पर रची गई 
ज़हन में पहरों गूँजती रही,
जोङती गई यादें पाई पाई ।

अलगनी पर दिन भर टँगी 
धूप सेंकती रही कमीज़
जेब में रखी छाँह कमाई 
रात भर चैन की नींद आई ।

भोर उजियारी चुनौती लाई 
आँचल में तारे भर ले आई
तारों को बो कर धूप उगाई 
छाँव बिन धूप रास न आई ।

सूरज की रोशनी और
परछाइयों के बीच कहीं
ज़िंदगी ने जगह बनाई ।


सोमवार, 22 जून 2026

पिता का होना


पिता जब तक 
साथ होते हैं,
उनके होने के 
बारे में
कौन सोचता है ?
जन्म से ही उनसे
श्वास का रिश्ता है ।
सब कुछ उनके 
होने से होता है ।

जब पिता नहीं रहते ।
तब उनका न होना,
होने की याद दिलाता है ।
घर के हर हिस्से में,
किस्से में,
अहम फ़ैसलों में
उनका होना 
समझ आता है ।
दिल कचोटता है ।
काश, और वक्त मिलता..
पर समय लौटकर नहीं आता है ।
नेमप्लेट बदलने से कोई 
चला नहीं जाता है ।
मन में समा जाता है ।
पिता कभी छोङ कर नहीं जाते ।
पिता को अपने भीतर जिया जाता है ।


रविवार, 21 जून 2026

क्या तुमने सुना ?


जीवन का आलाप ही 

संगीत कहलाया होगा ।

जब नवजात शिशु का

रोना भी मधुर स्वरालाप

था माँ और पिता के लिए।

तब से ही हर ध्वनि में

संगीत सुना संभवत: 

मैंने और तुमने ..

चिङियों का चहचहाना

पत्तों की सरसराहट 

हवाओं का अस्फुट स्वर

बूँदों का छनकना 

जल का कल-कल बहना

बैलों के गले में घंटी का

रह-रह कर हिलना,

कोयल की कुहू-कुहू

चप्पू का चलना

सायरन का बजना

टाइपराइटर का टकटकाना

कीबोर्ड का सरपट दौङना

गली में सामान बेचते 

हरकारे का आवाज़ लगाना

लङकियों का खिलखिलाना

बच्चों का शोर मचाना

खुश होकर ताली बजाना,

बादलों का गरजना,

अपने साथी का गुनगुनाना..

नवरस की अभिव्यक्ति

भावनाओं की प्रतिध्वनि

प्रतीत हुए जब भी सुना ।

संगीत चतुर्दिक बिखरा हुआ।

कभी सुना, कभी किया अनसुना ।

जब कभी जीवन गान अधूरा लगा,

ह्रदय के स्पंदन में ध्रुवपद सुना ।