जो कला, संस्कृति, परंपरा,सृजन
स्मृति में चिन्हित हो चुका है,
हमारा परिचय बन चुका है,
सदियों से समय के झंझावत
झेल कर भी टिका हुआ है,
वह हमारी अमूल्य धरोहर है ।
हमारे अस्तित्व का शिलालेख है ।
इतिहास से परे यह वो नाता है,
जो बिना कोई नाम दिए भी
हमसे जुङा है..हमारे साथ ही
चल रहा है अपनी छाप छोङता
समृद्ध हो रहा है ,आकार ले रहा है ।
सभ्यता की इस कथा का अंत नहीं होता ।
सहेज कर रखी जाती है धरोहर अवचेतन में
जब तक सौंप न दिया जाए भावी पीढ़ियों को,
तब तक पोषित करनी है, जीवन की हर विधा।
साहित्य, नृत्य, संगीत, स्थापत्य कला, संवाद
जो नदी और पर्वत श्रृंखला की तरह है स्थायी
राग जीवन का, वो सब कुछ जिसे हम कह सकें,
नि:संकोच, गौरव से सदा, अपनी धरोहर अक्षया ।
नमस्ते namaste
शब्दों में बुने भाव भले लगते हैं । स्याही में घुले संकल्प बल देते हैं ।
शनिवार, 18 अप्रैल 2026
अक्षय धरोहर
बुधवार, 15 अप्रैल 2026
कलावती
गोबर से लीप कर
तैयार की गई भित्ती पर
खङिया और लाल मिट्टी से
जीवन के प्रतीक चित्र
उकेरती स्त्री सबसे अनूठी
कलाकार है ।
उसने जो देखा वही
अपना लिया ।
जो जिया उसे ही
गोल, चौकोर,सीधी
और कभी घुमावदार
रेखाओं में उतार दिया ।
रंग तो दो ही थे, उनसे ही
अद्भुत रचना कर दी ..
मिट्टी पर बनी आकृतियाँ
सजीव हो उठीं , गीत गाती
गुनगुनाती छवि से उसकी
मैत्री है चिरंजीवी ।
घर के काम-धाम निबटा कर,
दोपहरी जब पसर जाती,
वो खूब बतियाती
अपने रचे मोर, गौरैया, हंस,
खेत, दालान, कुँए की जगत,
नदी, तालाब, जामुन का पेङ,
कुटिया, बकरी, गाय, कुकुर,
जीवन के सारें संदर्भों को
उंगलियों के पोरों से महसूस करती
अपनी भित्ती पर चित्रित कर,
अनुभव के आङे-तिरछे खानों को
अपनी समझ के सौंधे रंगों से भर देती ..
उसकी कला है कालजयी ।
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छवि : अंतरजाल से साभार
मंगलवार, 14 अप्रैल 2026
नूतन वर्ष फले-फूले
फसल कटी है !
खुशी की घङी है !
बहुत दिनों बाद
भूले सुर आए याद !
धन-धान्य से
भरें भंडार !
खाने को मिले
पेट भर ।
आज है त्यौहार ।
कल फिर आएगा
बीज बोने किसान ।
शुरु होगा काम ।
अन्न ब्रह्म देवता
रहें श्रम से प्रसन्न ।
वरद हस्त हो
कला साहित्य पर ।
मिट्टी से जुङे रहें ।
फूलों की तरह खिलें ।
अपनों का साथ रहे ।
जो भी हो, खुश रहें ।