वो देखो प्रह्लाद भक्ति में लीन
चारों तरफ़ लगी आग के बीच
निष्ठा का संबल अभय कवच
बाल-बाँका न कर सका ताप
ऐसे हुआ संपन्न होलिका दहन
कुटिलता के अभेद्य अस्त्र-शस्त्र
सरलता के तेज से जाते पिघल
अंततः वरदान भी होता विफल
धूँ-धूँ जलता उद्विग्न जगत सकल
रणभूमि हो अथवा होलिका दहन
अग्नि में निरर्थक हो जाता भस्म
शेष रहता भक्त प्रह्लाद कथा सार
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