Wednesday, 17 July 2019

नारायण की चवन्नी


जीवन को उत्सव जानो ।
कर्मठता में ढालो ।
परम उत्साह से सींचो ।
हर अनुभव से कुछ सीखो ।

विद्या का सार समझो ।
अवसर पर न चूको ।
परिश्रम करते रहो ।
हरि नाम जपते रहो ।

समस्याओं का सामना करो ।
विडंबनाओं से लोहा लो ।
गुरुदेव ने कहा,
और उतार दी नौका
भव सागर में ।

इससे पहले उन्होंने
सिर पर हाथ रखा
और हाथ में रख दी
सबसे बड़ी पूँजी
नारायण की चवन्नी ।

नारायण नारायण नारायण कहना
और केशव का ध्यान करना ।
सदा हँसते रहना
और निज कर्तव्य करते रहना ।

जीवन की हर कसौटी
पर उतरेगी खरी
यह संजीवनी बूटी,
तुम्हारी सबसे बड़ी पूँजी
नारायण की चवन्नी ।

10 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 18 जुलाई 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. भीगी धरती भीगी नयन की कोर !
      भीगी भावुक ह्रदय की कोर !

      चटक शीर्षक भा गया !
      पढ़ कर मज़ा आ गया !

      बधाई सबको !
      धन्यवाद सखी को !

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  2. बहुत सुंदर रचना

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    1. धन्यवाद अनुराधा जी.
      आपकी थोड़ी सी स्याही शायद इधर छलक गई होगी !
      आपका स्नेह बना रहे.

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (19-07-2019) को "....दूषित परिवेश" (चर्चा अंक- 3401) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद शास्त्रीजी.
      चर्चा के लिए अवश्य भेंट होगी.नमस्ते.

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  4. सुन्दर प्रस्तुति

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    1. ओंकारजी,बहुत बहुत आभार.
      बहुत दिनों में आपका आना हुआ.
      नारायण की चवन्नी साथ लेते जाइयेगा. : )

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  5. आभार प्रीतिजी.
    सुन्दर हर सद्भावना.

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