Tuesday, 6 April 2021

वजह जीने की


कभी-कभी 
कोई वजह नहीं होती
पास हमारे, 
आज का पुल 
पार कर के, 
कल का अभिनंदन 
करने की ।
ज़िन्दगी बन जाती
मशक्कत 
बेवजह की ।

ऐन वक्त पर लेकिन 
आपत्ति जता देती,
एक नटखट कली
जो खिलने को थी ।
यह बोली कली
जाने की वेला नहीं,
निविङ निशि ।
टोक लग जाती ।

फूल रही जूही
सुगंध भीनी-भीनी,
बिछी हुई चाँदनी,
धीर समीर बह रही ।
मौन रजनी,
ध्यानावस्थित
सकल धरिणी ।
कोई तो वजह होगी,
सुबह तक रूकने की ।

हाँ, है तो सही
एक इच्छा छोटी सी ..
देखने की कैसे बनी
फूल छोटी सी कली ।

भोर हो गई ।
मंद-मंद पवन चली ।
जाग उठी समस्त सृष्टि 
गली-गली चहक उठी ।
नरम-नरम धूप खिली ।
और खिली कली ।

एक फूल का
खिलना भी,
हो सकती है वजह
जीने की ।


7 comments:

  1. आज का पुल पार कर के कल का अभिनंदन करने की वजह अनेक हैं, एक छोटी कली ने कल का रास्ता दिखा दिया तो सोचिए, इसके जैसी अनगिनत कलियों से गूथा हुआ गजरा, जो कल लोकल ट्रेन में फिर महकेगा।

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  2. वाह , बस कोई भी छोटी सी वजह लेकिन हो .... खूबसूरत अभिव्यक्ति ...

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  3. जी हाँ । वीराने में खिला हुआ केवल एक फूल भी निराश मन को आशा का संबल दे सकता है । बहुत अच्छी कविता है यह । अभिनंदन ।

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  4. बहुत बहुत सुन्दर रचना

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  5. बहुत सार्थक और सुन्दर रचना।

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  6. सुन्दर प्रस्तुति

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  7. बहुत सुंदर भावों भरी अभिव्यक्ति,एक नन्ही कली को भी कितनी मशक्कत के बाद खिलता हुआ जीवन मिला,वह नन्ही कली तो प्रेरणा बनेगी ही,सुंदर सृजन के लिए सादर शुभकामनाएं ।

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