Tuesday, 25 May 2021

करावलंबन

कच्ची उम्र के बच्चे
अनुभव के कच्चे
छोटे-छोटे हादसे
क्यों सह नहीं पाते ?

क्यों उनके भीतर
जवान होता बच्चा
इतना सहम गया
कि आत्मघात करना पड़ा ??

उम्मीद बर ना आये
तो जान पर बन आये ?
ऐसा क्या खो बैठे ?
जिसकी भरपाई ना हो पाए ?

उनके भीतर कहीं
गहरी खाई थी क्या ?
जो पाँव फिसले
तो संभल भी ना पाए ?

क्या अपने चूक गए
इनके भीतर उठे
भूचाल के झटके
वक़्त रहते समझने में ?

माँ-बाप ने ला-ला के
खिलौने जैसे सपने दिए
पर क्या वो देना भूल गए
सुरक्षा कवच संस्कारों के ?

फिर किसी बच्चे ने अपने
प्राण तिरोहित कर दिए
यार-दोस्त देखते रह गए
माँ-बाप स्तब्ध रह गए

दुनिया ने सिखाया कैसे
सब कुछ हासिल करना
पर किसी ने ना सिखाया
ना मिले तो आगे बढ़ें कैसे ?

खाई में गिर के वो बचेगा कैसे ?
गोविंद आपने थामा था जैसे
भक्त प्रह्लाद को अपने हाथों में
अपना लेना उसे भी अंक में भर के ।

9 comments:

  1. उनके भीतर कहीं
    गहरी खाई थी क्या ?
    जो पाँव फिसले
    तो संभल भी ना पाए ?---बहुत गहरी रचना है।

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  2. बहुत सुंदर

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  3. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28 -5-21) को "शब्दों की पतवार थाम लहरों से लड़ता जाऊँगा" ( चर्चा - 4079) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  4. यह आश्रय बना रहे, सुन्दर पंक्तियाँ।

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  5. मर्मस्पर्शी सृजन।
    एक उद्बोधन है अभिभावकों और किशोर अनसुलझे मनों के लिए।
    साधुवाद।

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  6. उनके भीतर कहीं
    गहरी खाई थी क्या ?
    जो पाँव फिसले
    तो संभल भी ना पाए ?

    क्या अपने चूक गए
    इनके भीतर उठे
    भूचाल के झटके
    वक़्त रहते समझने में ?
    अंदर तक हिला दिया इन पंक्तियों ने।

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  7. बेहद हृदयस्पर्शी

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  8. माँ-बाप ने ला-ला के
    खिलौने जैसे सपने दिए
    पर क्या वो देना भूल गए
    सुरक्षा कवच संस्कारों के ?
    बस खिलौने से सपने टूटते ही टूट जाते हैं संस्कारों के सुरक्षा कवच की कमी है शायद...
    बहुत ही हृदयस्पर्शी मार्मिक सृजन।

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