गुरुवार, 21 जुलाई 2022

फूल खिलते रहेंगे


हम फूल हैं ।
तंग घरों की 
बाल्कनीनुमा
खिङकियों में बसे ।

सलाखों से घिरे हैं 
तो क्या हुआ ?
हर हाल में, हर रंग में, 
खिल रहे हैं तबीयत से ।

अपनी मर्ज़ी से 
ना सही, 
गमलों में ही
जी रहे हैं 
ज़िन्दादिली से !

आख़िर फूल हैं !
मिट्टी में जङें हैं ।
धूप में छने हैं ।
नज़ाकत से पले हैं !
खुश्बू ही तो हैं !

खुश्बू ही तो हैं !
हवाओं में घुल जाएंगे ।
ज़मीं पर बिखर जाएंगे ।
ज़हन में उतर जाएंगे ।

खुश्बू ही तो हैं ।
खयालात में ढल जाएंगे ।
और फिर खिलेंगे ।
आख़िर हम फूल हैं ।
खिलते रहेंगे ।

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

गुरु दक्षिणा


सूर्य रश्मि
आत्मसात कर
फूल खिलते हैं ज्यों,
खिल कर जगत को
खुशबू देते हैं ज्यों ।

सूर्य का प्रखर तेज
अपने अंतर में रोप कर
शीतल भीनी चांदनी ज्यों
चंद्रमा देता है भुवन को ।

सूर्य की भीष्म तपस्या
एकनिष्ठ सेवा
और जीवन यज्ञ देख कर,
छोटा-सा मिट्टी का दीपक
पाता है संबल ।
करता है संकल्प ।
गहन अंधकार को ललकार
अडिग लौ
बन जाता है ज्यों ।

इसी तरह गुरु की वंदना कर
समर्पित की जाती हैं गुरु दक्षिणा ।
इसी तरह दमकती है शिष्य के
व्यक्तित्व में गुरु शिक्षा की आभा ।

कृष्ण ने अर्जुन को दी थी यही शिक्षा ।
अपने जीवन को बना दो कर्म की गीता ।

सुपात्र बनाने के लिए गुरु देते हैं दीक्षा ।
सीख कर सिखाना ही उचित गुरु दक्षिणा ।



सोमवार, 11 जुलाई 2022

बरस रहा है पानी


रात भर बरसा है
मूसलाधार पानी ।
बादलों के मन की
किसी ने न जानी ।
और इधर धरा पर
देखो दूर एक पंछी
जल प्रपात समझ
सबसे ऊंची जगह
ढूंढ ध्यानावस्थित
बैठा है अविचल ।
भीग रहा है निरंतर
सोख रहा है जल
शीतल अविरल ।
संभवतः मौन धर
सुने जा रहा है
बादलों की व्यथा ।

बरस रहा है पानी ।
वर्षा का पानी
लाया ॠतु धानी ।
धरती कितनी तरसी
फिर बरसा पानी
तरलता हुई व्याप्त ।

बारिश की रागिनी
बूँदों की अठखेली
थिरक रही बावली
धिनक धिन-धिन ।
सृष्टि हुई ओझल
बूँदों की तरल झालर
बन गई मानो चूनर ।
धुले समस्त आडंबर ।
स्वच्छ हुआ अंतर्मन ।

अब भी लगातार
वही मूसलाधार
बरस रहा है पानी ।
बहा ले जाएगा
मन की सारी ग्लानि ।
फिर से शुरू कहानी ।
इस बार न डूबेगी
कागज़ की नाव हमारी ।
अंतर मार्जन कर ढुलका दी
बादल ने अपने कहानी ।

बूँदों के बाँध सहस्र नूपुर
घनश्याम कर रहे मयूर नृत्य
धाराप्रवाह बज रहा मृदंग
हर्षित हरित मन उपवन ।
जलमग्न धरा ध्यान मग्न
बूँद-बूँद जल आत्मसात
बिंदु-बिंदु सोख रही मिट्टी ।
अब भी बरस रहा है पानी ।




शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

अपना हाथ जगन्नाथ


रात को जब सोने लगो
दिन भर के सपनों को 
कंधों से उतार कर
ताक पर मत धर देना ।

सपनों को समेट कर
हौले से धूल झाड़ कर
अच्छी तरह तहा कर
हथेली की रेखाओं के बीच
सहेज कर रख देना ।

सुबह जब उठो
बंधी मुट्ठी जब खोलो
सबसे पहले ध्यान करो ..
तुम्हारी हथेली में ही है
लक्ष्मी सरस्वती और गोविंद का वास ।
अपने प्रयत्न से
पानी है तुम्हें
समृद्धि और विद्या ।
प्रयास करो, स्मरण रहे
तुम्हारे गोविंद हैं आधार ।

स्वप्नों की परतें खोलो
परत दर परत समझो
स्वप्न का शुभ संकेत ।

अंतर्मन तब तक मथो
जब तक सार ना पा जाओ ।

फिर उठो और जतन करो ।
एकनिष्ठ कर्म ही जीवन का सार
और भक्त के गोविंद हैं आधार ।

सत्यनिष्ठ के गोविंद हैं आधार
स्वयं सिद्ध करो काज
स्वप्न करो साकार

गोविन्द हैं आधार
और अपना हाथ जगन्नाथ

सोमवार, 20 जून 2022

दिनचर्या दिवाकर की


दिन भर तप कर सूरज जब
सांझ को ढल जाता है,
तारों भरा आकाश का आंचल
थपकी देकर सुलाता है ।

कभी-कभी चंद्रमा भी आकर
चांदनी रात ओढाता है,
और पवन का झोंका थम कर
मीठी लोरी सुनाता है ।

सप्त ऋषि दल तपोबल बट कर
पृथ्वी के दीप बालता है,
ध्रुव तारा सजग ध्रुव पद पर अटल 
भूले को राह दिखाता है ।

भोर की वेला में जब सूरज रथ पर
पुनः क्षितिज पर आता है,
सृष्टि के स्वर जगा छलका रंग सहस्र 
जग आलोकित करता है ।




शनिवार, 11 जून 2022

वह एक क्षण



सही वक्त पर 

एक फूल भी खिल जाए

तो बचा लेता है 

किसी को मुरझाने से

टूट कर बिखर जाने से ।


जब ज़रूरत हो तब

कोई साथ खङा हो जाए

कंधे पर रख कर हाथ

तो लौट आता है 

खोया हुआ आत्मविश्वास।


समय रहते ही

कोई जो पूछ ले 

पास बैठे अनमने

अपरिचित का हाल,

तो हो सकता है 

टल जाए वह

आत्मघाती घङी,

जब धक्के खा-खा कर 

आदमी का चिंतन

हो जाता है चेतना शून्य ।


एक पल ही होता है वह

जिसकी धुरी पर 

टिका होता है विवेक,

तट से जा लगती है 

भूली-भटकी जीवन नैया..

इस पार या उस पार 


एक ही क्षण होता है वह

दैदीप्यमान आत्मबोध का,

जब अंतर के हाहाकार से

कांपती लौ को स्थिर कर 

साध लेता है धैर्य का संपुट ।



सोमवार, 6 जून 2022

पेङ रहेंगे हमेशा

कल हो सकता है,
मैं रहूँ ना रहूँ,
पर हमेशा रहेंगे
तुम्हारी स्मृति में 
वे पेङ-पौधे हरे-भरे
जो हमने साथ लगाए..

वह नदी, जल जिसका
कभी नहीं ठहरता,
जिसकी धारा में हमने
दोनों में दीप धर करबद्ध
अनंत को संदेश पठाए..

यह नील नभ का विस्तार 
जिसमें अंतरतम के भाव
बादल बन छाए, गहराए
और बरसे निर्द्वन्द्व मूसलाधार..

वह बंजारन पवन सघन वन
झूमती, कभी सीटी बजाती
स्निग्ध बयार माथा सहलाती..

चूल्हे की आंच पर सिंकती
कच्ची-पक्की भावनाएं..
ये सब रहेंगे तुम्हारे साथ ।

मुङ कर देखो यदि अकस्मात 
संभावनाओं को देखना, 
असफलताओं को नहीं ।
अनुपस्थिति से 
विचलित मत होना ।

कल हो सकता है,
मैं रहूँ ना रहूँ,
पर हमेशा रहेंगे
तुम्हारी स्मृति में 
वे पेङ-पौधे हरे-भरे
जो हमने साथ लगाए..
उनकी घनी छाँव तले
बैठना और संकल्प लेना..
धरा को बनाना हरा-भरा ।


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चित्र - हस्तकला प्रदर्शिनियों में उड़ीसा के ताल पात्र पर बने चित्रों के स्टाल पर अवश्य गए होंगे 
वहीं से ली था यह जीवंत कलाकृति । प्रकृति से विशेषकर वृक्ष से जुड़े जीवन की सहज सरल अनुकृति । अनाम कलाकार का सादर अभिनंदन  अनंत आभार 



रविवार, 5 जून 2022

चलो रोपते हैं एक पौधा


चलो इस उम्मीद में 
रोपते हैं एक पौधा, 
कि एक दिन वह  
दुआ बन कर फलेगा ।
जो बरसों बाद घना होगा,
मज़बूत तना होगा ।
शाखों पर नीङ बना होगा, 
चिङिया का कुनबा होगा ।
टहनियों का झूला होगा ।
पक्षियों का कलरव होगा ।
पा कर आमंत्रण छाँव का
डेरा डालेगा गुज़रने वाला,
कोई कुटुंब थका-हारा ।
सुन कर बिटिया का तुतलाना 
कान लगा कर बैठा तोता
कंधे पर आ बैठेगा ।
नन्ही हथेली से चुग कर दाना
फुर्र उङेगी छोटी-सी चिङिया !
कौतुक देख हँस देगी माँ !
और पिता कृतज्ञ मना सोचेगा 
किसने रोपा होगा यह हरा-भरा
वृक्ष विशाल छायादार घना-सा ..
पत्ता-पत्ता झूम-झूम पंखा झलेगा
ठंडी बयार का झोंका थपकी देगा
आश्वस्त पाकर हरीतिमा की छत्रछाया  
धरती बिछा निश्चिंत सो जाएगा पिता ।

चलो रोपते हैं एक पौधा । उम्मीद का ।
बरसों बाद जिसकी ठंडी छांव में बैठा
कोई थका-हारा हो कृतज्ञ देगा दुआ ।
शायद वो भी फिर रोपेगा एक पौधा  
जो बन कर सघन वृक्ष छांव घनी देगा ।

गुरुवार, 12 मई 2022

तासीर

मेरी प्यारी बेटियों 
जुग जुग जियो !
जैसे-जैसे बड़ी हो..
बहुत कुछ बनना 

जब-जब छाये अँधेरा,
बिजली की तरह कौंधना 
गहरे ताल में पड़े उतरना 
तो कमल की तरह खिलना 
बहुत कुछ बनना ।
भुलावे में मत रहना ।
चौकस रहना ।

जो जो सीखो,
सहेजती जाना ।
जैसे अपनी किताब-काॅपी
बस्ते में लगाती हो ।
जैसे गर्म रोटियाँ मोङ कर 
कटोरदान में रखती हो ।
जैसे अपने दुपट्टे,कुर्ते, सलवार
साङी तहा कर रखती हो ।
जैसे घर का सारा सामान 
जगह-जगह जमा कर रखती हो ।

अपनी भावनाएं, अपने स्वाद,
अपने संकल्प, अपने व्यक्तित्व को 
सहेजे रखना । बचा कर रखना ।
समय बीतने के साथ नज़र की तरह
अपनी व्यक्तिगत रूपरेखा को
धुंधला मत पङने देना ।

अच्छी बेटी बनना ।
अच्छी बहन बनना ।
अच्छी पत्नी बनना ।
अच्छी माँ बनना ।
इस सबके बीच तुम जो हो,
वह बनी रहना ।

बहुत कुछ बनना ।
बहुत कुछ बदलेगा 
तुम भी बदलते हुए जीना 
बस तासीर मत बदलने देना ।


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आभार सहित 
चित्र इंटरनेट से 
इंडिया पोस्ट डाक टिकट 


रविवार, 8 मई 2022

स्वयंसिद्धा



महाकवि निराला ने 
देखा था उसे
इलाहाबाद के पथ पर 
वह तोङती थी पत्थर ।

आज मैंने जिसे देखा
क्या यही थी वह जिसे 
देखा था महाकवि ने ?

आप रहे भाव दृष्टा
आपने पढ़ लिया 
उलाहना आंखों का..
अथवा ..
मौन कटाक्ष था क्या? 
था भी तो आपसे ज़्यादा 
कौन समझ सकता था ?
ठंड में ठिठुरते 
फुटपाथ पर सोते 
विपन्न को अपना
ऊनी वस्त्र दे दिया था,
आपने उदार मना ।

उसका जता देना,
पुनः काम में जुट जाना ।
अपने हाथों और हथौङे से 
गढ़ना अपना भवितव्य ।
स्वीकार कर पत्थर सा 
कठोर जीवन अपना 
और जीवट इतना 
हथौङे से लगातार 
करती वार
वह तोङती पत्थर ..
विषमताओं पर करती प्रहार ..
आप जान गए थे महामना ।

तो क्या कुछ भी नहीं बदला ? 
पीठ पर बांध कर बच्चा 
कङी धूप में तप कर
हाथ में हथौङा लेकर 
अब तक वह स्वयंसिद्धा
तोङती है पत्थर ..

महाकवि निराला की संवेदना 
लिख गई कविता 
पिरो कर अनुभूति में 
भाव सरिता ।
आज मैंने भी देखा,
वह तोङती थी पत्थर ।

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छायाचित्र इंटरनेट से साभार 

शनिवार, 7 मई 2022

तुरपन














माँ कहती थी 
सीख लो बिटिया 
काम आएँगी 
छोटी-छोटी बातें. 

इसलिए नहीं कि 
हर लड़की को 
आनी चाहिए 
अच्छी लगने वाली बातें
यानी घर सँभालने वाली बातें.

इसलिए कि 
हर लड़की को 
आनी चाहिए 
आत्मनिर्भर 
बनाने वाली बातें.

ख़ुद कर सको 
सारा काम अपना 
इससे अच्छा क्या होगा ?
काम कोई भी सीखो 
कभी न कभी काम आएगा.

सीखना ही जीना है.
यह जीते-जीते समझ आएगा.

नहीं सीखना नाचना-गाना 
जो लड़के वालों को हो दिखाना.
सहज सीख लोगी तो जब चाहो  
जब मन हो तब गुनगुनाना.  

बेस्वाद ज़िन्दगी में क्या रखा !
स्वाद घोलने को जीवन में 
क्यों न सीखो स्वादिष्ट पकाना !
यदि गोल-गोल सेंकोगी फुलका 
काम बहुत जल्दी निबटेगा !

फिर सीखो फ्यूज उड़े तो 
ख़ुद कैसे ठीक करना.
छोटी-मोटी मरम्मत करना  
करते-करते आ जाएगा 
जीवन की उलझनें सुलझाना.

सीख कर तैयार रहना.
जब कभी पड़े आज़माना 
किसी से भी पीछे मत रहना.  
 
फटी सिलाई को फिर सिलना 
माँ को अक्सर करते देखा.
फिर धीरे से मुसका कर कहना 
ऐसा ही होता है जीवन. 
रोज़ उधडती रहती सीवन 
रोज़ उसे पड़ता है सीना.
सीख ही लेना तुम भी तुरपन.


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कलाकृति चित्र इन्टरनेट से साभार 


मंगलवार, 3 मई 2022

अक्षय मनोकामना


प्रातः सूर्य प्रखर अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर हुआ,
स्वर्ण कलशों में भर-भर पावन सोने-सा उजियारा ।
यही परंपरा रही थी सदा अक्षय पात्र होगा जिसका 
उसी के पात्र में उंङेला जाएगा तप कर निखरा सोना ।
अक्षय पात्र उसे ही मिलता है जो निरंतर श्रम करता
जिसके मन में हो दृढ़ संकल्प जगत की सेवा का ।
मार्ग में मिला एक निर्द्वंद फूलों से निश्छल बच्चों का,
बाट जोहते हथेलियां जोड़ बनाए नन्ही अंजुरी मुद्रा ।
दुआ मांगते हैं या आगे किया है अक्षय पात्र अपना ?
जो चाहे भला ही सबका और मांगे सबके लिए दुआ
वो ही तो सदुपयोग करेगा सर्वदा अक्षय पात्र का ।
ईद पर नेक बंदों को मिली ईदी में स्वर्ग की आभा ।
दमकने लगा सारा संसार हर्षित अपार सोने जैसा  !
स्वर्ण चंपा, गेंदा,कनेर, केसर, हल्दी,आम्र,जलेबियाँ !
संध्या समय जल की लहरों पर पिघलता खरा सोना !
अमलतास के झूमर,सोनमोहर,पत्तियों से छनती धूप !
पीत वसन पीतांबर, चंदन लेपन, किरणों की झालर ।
अक्षय विनय, विद्या, सुमति, स्वास्थ्य,संवेदना, सद्भाव,
यश, स्नेह मिले उसे, जिसका सरल सोने-सा हो मन ।



रविवार, 1 मई 2022

मज़दूर के हाथों में


एक मज़दूर के
खुरदुरे हाथों की 
गहरी लकीरों में 
खुदी होती है 
समाज की नींव ।

उसके मज़बूत 
कंधों पर
टिकी होती हैं, 
सभ्य समाज की
आलीशान इमारतें,
और वो दीवारें 
जो हम खङी करते हैं, 
उनके और अपने
बीच में ।

रोज़ फेरी लगाता है 
कर्मों का देवता,
जब झुटपुटा-सा 
होता है,
जब जलते चूल्हे की 
मध्यम रोशनी में 
कौंधते हैं,
मज़दूर परिवार के
मेहनत से तपे बदन ।
एक हल्की-सी मुस्कान 
जैसे दूज का चांद ।
शुक्र है ऊपरवाले का
हाथ-पांव सही सलामत 
रोटी खा कर तान चादर
नींद में बेसुध सोता है।
उधर ऊंचे मकानों में 
कुछ इंसान तङपते हैं 
एक अदद नींद के लिए ।

देवता सब देखता है ,
माथा सहला कर कहता है,
समाज को उतना ही मिलता है 
जितना वो मेहनत करने वाले
श्रमिक को पारिश्रमिक, आदर,
सुरक्षा और खुशहाली देता है ।

शनिवार, 23 अप्रैल 2022

बुकमार्क्स ले लीजिए !


पढ़ने के शौकीन दिल थाम कर ध्यान दें !
लपक लें झटपट मौका हाथ से जाने न दें !
यह चीज़ है कमाल की आपके काम की !
हमेशा नहीं मिलतीं नैमतें अपने रूझान की !

पढ़ते-पढ़ते जब कोई काम आ जाए ..
लौटें तो पुस्तक का पन्ना खो जाए !
विद्यार्थियों की तो और बङी बलाएं !
किताबों के समंदर में डूबते ही जाएं !

आप सबके लिए है एक ही उपाय !
जो हिंदी में पुस्तक चिन्ह कहलाए ।
छोटे-बङे सजीले बुकमार्क आज़माएं !
मनभावन डिज़ाइन छांट कर ले जाएं !

दाम तो हुज़ूर इनके कुछ भी नहीं जी !
जितनी कारीगरी इनकी मन को लुभाए !
ख़ास बात ये कि छोटे बच्चों ने हैं बनाए !
बहुत कुछ कहती हैं इनकी कल्पनाएं ।

शादी के कार्ड जो रद्दी की शोभा बढाएं ।
कैलेंडर,लिफ़ाफ़े,चित्र, जो काम न आएं ।
बचे हुए रंग, कतरनें , सब काम में लाएं ।
होनहारों के रहते कुछ भी बेकार न जाए ।

डायरी, किताबों की, नूरानी रंगत हो जाए !
पढ़ते-पढ़ते कहाँ रूके थे, यह याद दिलाए ।
स्वाभिमानी बच्चों को स्वावलंबी बनाएं ।
कद्रदान मनपसंद  चिन्ह खरीद ले जाएं ।

कान किताबों के उमेठने की नौबत न आए !
बुक काॅर्नर्स की टोपियाँ कोनों को पहनाएं !
सुलेख,सुविचार,फूल-पत्ती,मांडने से सजाएं,
इन्हें पढ़ने के सफ़र में मील का पत्थर बनाएं ।

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कलाकार : 
माखनचोरी - उड़ीसा के अनाम कलाकार 
अंग्रेज़ी बुकमार्क - वृंदा शांडिल्य 
शेष दो अपने बनाए हुए 

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सोमवार, 18 अप्रैल 2022

मनुहार


सूर्य रश्मि वृंद ने नीलम नभ शिखर पर 
फहराया आनंद प्लावित श्यामघन ध्वज
नव वर्ष का हुआ सहर्ष सादर सत्कार 
चिङिया संप्रदाय गा उठा समवेत स्वर
करतल ध्वनि कर रहे मगन नव पल्लव 
नदी के शांत जल की लयबद्ध कल कल
फूल श्रृंगार से शोभित धरा की हरीतिमा
प्रकृति ने मनुष्य को दी प्रचुर धन संपदा
हमने जिसे धीरे-धीरे बूंद-बूंद सोख लिया
अब भी है समय सूखे जलाशय भरने का
क्यों न हम प्रण लें इस पावन अवसर पर
जितना लें उसे बढ़ा के लौटा दें धरित्री को
आह्लादित मन भर दें धरती माँ का आंचल
मान उपकार हम भी तो दें धरा को उपहार 
आइये रोपते है पौधे हम-आप भी अविराम
सींच कर जतन से करें पूरे कुदरती नेगाचार
मिल कर खिलाएं जगत में हम फूल बेशुमार 
उपहार करें स्वीकार वसुंधरा से यही मनुहार 



प्रेरणा चित्र साभार : नेरुल, नवी मुंबई, भारत की एक चलती-फिरती सड़क की दीवार. 
माने wall art. अनाम कलाकार. 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

एक चिरैया गौरैया










हमने सुनाई जब आपबीती 
गौरैया की महिमा बखानी
तब एक नौजवान ने ठानी
नन्ही चिरैया से बतियाने की

मुक्त कंठ से हमने प्रशंसा की 
नवयुवक के सहज उत्साह की
बात 'गल्प करिबो' बिरादरी की
गोष्ठी में सदस्यता बढ़ाने की थी

बात करने से सुलझती है गुत्थी
बात करने से खुलती है मनोग्रंथी
जो बात समझ नहीं पाता आदमी 
चिरैया समझ जाती बिना कहे भी 

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

मुखर हो हास


 नव संवत्सर 
 हों स्वर मुखर 
 आशा के
 प्रार्थना के
 साहस के
 सद्भाव के ।

 श्रम के 
 फूल खिलें
 स्वेद बिंदु बन
 भाल पर ।
 
 कर्मठ तन-मन
 दामिनी सम 
 ललकारें ..
 देह की अस्वस्थता,
 अंतरद्वंद,
 मन के कलुष को ।
 
 खुरदुरे हाथों में 
 मुट्ठी भर मिट्टी,
 मेहनत से सींची जो,
 लो ! हथेलियों पर
 फूली सरसों ।
 
 स्वर मुखर हों ।
 घर-घर मंगल हो ।
 आनंद सुगंध हो ।
 धूप-सा हास हो,
 कुम्हलाए मुख पर ।

जीवन का संबल हो
आत्मबल का शंखनाद ।
 
 

शनिवार, 26 मार्च 2022

Why ?


Great men 
Wage wars.
Ordinary people 
Pay the price,
Without understanding 
Why ?

A man 
who has played music
On the streets of Ukraine
For years ,
Looks bewildered and asks,
What's happening ?

No one has the answer.
The man looks around
Then plays on ..the music.

It was in the news.
I looked for it later
To listen again.

But I guess 
Commonplace comments 
That do not become viral
Just disappear.
Why ?


 

मंगलवार, 22 मार्च 2022

कविता


 




 


कविता सुनियेगा  ?

कमल दल पर ठहरी
ओस की पारदर्शी 
प्रच्छन्न बूंदों में ,
चेहरे की नमकीनियत में,
मिट्टी की नमी में, 
मेहनत के पसीने में, 
ठंडी छाछ में, 
गन्ने के गुङ में, 
माखन-मिसरी में,
मधुर गान में, 
मुरली की तान में, 
मृग की कस्तूरी में, 
फूलों के पराग में, 
माँ की लोरी में, 
वीरों के लहू में, 
मनुष्य के हृदय में 
जो तरल होकर 
बहता है, 
उसे कहते हैं हम
कविता ।

सोमवार, 21 मार्च 2022

गौरैया अब मत जाना


बचपन से आदत थी ।
गौरैया के चहचहाने,
गहरे से हल्के नीले होते
नभ में धुंधले पङते तारे  
और उजाला होने पर
आंख खुलती थी ।
मानो गौरैया वृंद 
आता था जगाने 
बेनागा हर सुबह ।

जनमघुट्टी में घोल कर
एक बात माँ ने 
समझाई थी ।
इंसानों और पंछियों को
पीने का पानी और 
चुगने को दाना
पहले परोसना ।
फिर दिनचर्या 
आरंभ करना ।

समय बीता ।
बचपन की सहेलियों का
जिस तरह कोई
पता न था,
ठीक वैसे ही गौरैया का
घर में आना-जाना
कम होता गया ।
कुछ ख़ास फ़र्क नहीं पङा ।
बस नींद का उचटना
उचटना आम हो गया ।

फिर एक दिन सहसा
कानों में पङी वही
बचपन वाली 
गौरैया के चहचहाने 
का मधुर गुंजन ।

चारों तरफ़ देखा
मुंडेर पर सामने 
हो रहा था बाक़ायदा 
गौरैया सम्मेलन !
शोर कभी नहीं लगा
चिङियों का चहचहाना ।

घोंसला भी बना ।
आवभगत में बना-बनाया 
नीङ भी जुटाया गया ।
मिट्टी का सपाट-सा
जल का पात्र रखा गया!
दोबारा जुङ गया नाता ।

अब अकेलापन नहीं सताता ।
सूनापन भी नहीं सालता ।
छोटी-सी गौरैया का
जल में खेलना दाना चुगना ..
इतना अपनापन अनुभव होता,
मानो मुट्ठी में धङकता हो
ह्रदय मेरा और गौरैया का ।

शनिवार, 19 मार्च 2022

रंगरेज़ कोई


रंगरेज़ कोई छुप कर आता है रोज़ ।
सूरज उगते ही बिखेर देता चहुँ ओर
सोने - सा सुनहरा रंग आसमान पर ।
और ऐसे ही रंगता जाता सारा संसार ।

खिलते कमलों को रंग देता गुलाबी, 
झरते हरसिंगार के धवल भाल पर,
केसरिया तिलक लगाता उठ भोर ही ।

वृक्षों को रंग देता हरा,सांवला भी कभी ।
फूल-पत्ती,पंछी, सतरंगी, मत पूछो जी !
चित्र में रूपहले रंग भर देती ज्यों मुन्नी !

तोता हरियल, गौरैया भूरी-सी, मोरपंखी !
मैना काली, अनगिनत रंगों की फुलवारी ।
रंगरेज़ की अदृश्य कूची मानो जादूई छङी । 
ज़रा छूते ही बहने लगती रंगों की नदी - सी !

रंगों मे रंग घोल - घोल कर ही
रंगरेज़ लगा देता रंगों की झङी !
रंगों का मेला, रंगों भरी बारादरी 
पचरंगी घाघरा, सतरंगी चूनरी !

रंगों की दुनिया में कोई कमी नहीं ।
बस चाह हो,हर रंग में,रंग ढ़ूँढ़ने की ।

फीकी न पङे नज़र रंग देखने की ।
रंगरेज़ हर रोज़ लगाता रहता फेरी ।
बेरंग न रह जाए किसी की ज़िन्दगी ।






मंगलवार, 15 मार्च 2022

शब्द संजीवनी


बहुत दिनों बाद
लौटी एक किताब..
पुस्तकालय ।

शेल्फ़ में रखी गई 
जैसे ही, हर्ष सहित 
हुआ स्वागत ।

सारी किताबों ने 
ज़ाहिर की हैरानी, 
इतने दिन बीते
कहाँ रहे भाई ?

कैसे और क्या बताऊँ ?
जीवन के घटनाक्रम 
बदल देते हैं सोच ।
शायद समझा पाऊँ ।

इस बार मुझे 
जो लेकर गई थी,
अकेली रहती थी
साथ में छोटे बच्चे ।

दिन भर खटती थी,
मुझे पढ़ कर रोती थी,
बातें करती थी मानो 
मेरे सिवा उसको
कोई समझता न था ।

बच्चे जब घर आते
खिलखिलाते, 
अनभिज्ञ माँ के
दैनिक संघर्ष से ।

माँ भी सब भूल
मेरे पन्नों पर 
लिखी कथाओं से,
व्यथा छुपा के,
परी कथा बना के
बच्चों को रोज़ 
सुनाती थी ।

ज़िम्मेदारी अपनी 
समझने लगी थी मैं भी ।
फ़िक्रमंद रहती थी ।
वो जब भी मुझे 
लौटाने की सोचती,
मैं खो जाती ।

पर एक दिन उस पर
धुन हुई सवार ।
ढ़ूँढ़ निकाला मुझे
और बहुत देर तक
हाथों में थामे बैठी रही ।

विदा की वेला आई ।
आंखें छलछलाई ।
तुम्हारी बातें मेरे
बहुत काम आईं ।
मुझमें हिम्मत जगाई ।
तुमने ह्रदय पर रखी
भारी शिला हटाई ।

उस क्षण जाना,
उत्तरदायित्व होता है 
हर किताब का ।
लिखे गए प्रत्येक 
अनुभूत शब्द का ।

ये फ़र्ज़ है हमारा ।
संजीवनी बूटी को
मूर्छित चेतना तक 
अविलंब पहुँचाना ।
अवचेतन में बो देना ।
सुप्त प्राण जगाना ।

लोग जिल्द 
और नाम देख कर
ज़रूर खरीदते होंगे,
या पढ़ने को लेते होंगे किताबें, 
पर पढ़ने-पढ़ते जो थाम ले हाथ,
उसी किताब का मानते हैं कहना,
जनम भर करते हैं जतन ।

गुरुवार, 3 मार्च 2022

प्रजा के हित में


बङे- बङे राजे आए ।
राजों से बङे उनके अहं..
अहंकार टकराए ।

जिनके नाम पर
शुरु हुआ था युद्ध ,
वो जान बचा कर
भागते नज़र आए ।

विध्वंस के बाद वे सब
आमंत्रित किए गए जब,
तथाकथित जीत का 
जश्न मनाने के लिए,
वे या तो मारे जा चुके थे
या शरणार्थी हो गए थे ।

जब राजे ने जीत का 
परचम लहराया।
सलामी देने वाला
कोई ना था ।
राजे की विजय सभा में 
राजे अकेला था ।
प्रजा का कोई
अता-पता न था ।

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चित्र गूगल से साभार