सोमवार, 20 जून 2022

दिनचर्या दिवाकर की


दिन भर तप कर सूरज जब
सांझ को ढल जाता है,
तारों भरा आकाश का आंचल
थपकी देकर सुलाता है ।

कभी-कभी चंद्रमा भी आकर
चांदनी रात ओढाता है,
और पवन का झोंका थम कर
मीठी लोरी सुनाता है ।

सप्त ऋषि दल तपोबल बट कर
पृथ्वी के दीप बालता है,
ध्रुव तारा सजग ध्रुव पद पर अटल 
भूले को राह दिखाता है ।

भोर की वेला में जब सूरज रथ पर
पुनः क्षितिज पर आता है,
सृष्टि के स्वर जगा छलका रंग सहस्र 
जग आलोकित करता है ।




13 टिप्‍पणियां:

  1. सूरज की पूरी दिनचर्या ढाल दी कविता में । बहुत खूब।

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    1. धन्यवाद संगीता जी । बच्चों का वाॅटर सायकिल माॅडल बनाते-बनाते यह बात मन में आई । सारी सृष्टि सूर्य के आने-जाने के इर्द-गिर्द ही तो गतिशील है ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (22-06-2022) को चर्चा मंच     "बहुत जरूरी योग"    (चर्चा अंक-4468)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    
    --

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    1. शास्त्री जी, चर्चा संकलन में स्थान देने के लिए हार्दिक आभार । एक बुक जर्नल के बारे में पता चला । एक अलग किस्म का किताबी कोना । मन और धरती की फ़ितरत एक जैसी होने की बात बहुत अच्छी लगी । अन्य रचनाएँ भी सोने पर सुहागा । अभिनंदन ।

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  3. वाह!बहुत सुंदर सृजन।
    सादर

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    1. आपको अच्छी लगी बात
      हमारे बङ भाग धन्यवाद

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  4. उत्तर
    1. शुक्रिया ! आपकी तो रिश्तेदारी में हैं सूर्य देवता !!

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