गुरुवार, 12 मई 2022

तासीर

मेरी प्यारी बेटियों 
जुग जुग जियो !
जैसे-जैसे बड़ी हो..
बहुत कुछ बनना 

जब-जब छाये अँधेरा,
बिजली की तरह कौंधना 
गहरे ताल में पड़े उतरना 
तो कमल की तरह खिलना 
बहुत कुछ बनना ।
भुलावे में मत रहना ।
चौकस रहना ।

जो जो सीखो,
सहेजती जाना ।
जैसे अपनी किताब-काॅपी
बस्ते में लगाती हो ।
जैसे गर्म रोटियाँ मोङ कर 
कटोरदान में रखती हो ।
जैसे अपने दुपट्टे,कुर्ते, सलवार
साङी तहा कर रखती हो ।
जैसे घर का सारा सामान 
जगह-जगह जमा कर रखती हो ।

अपनी भावनाएं, अपने स्वाद,
अपने संकल्प, अपने व्यक्तित्व को 
सहेजे रखना । बचा कर रखना ।
समय बीतने के साथ नज़र की तरह
अपनी व्यक्तिगत रूपरेखा को
धुंधला मत पङने देना ।

अच्छी बेटी बनना ।
अच्छी बहन बनना ।
अच्छी पत्नी बनना ।
अच्छी माँ बनना ।
इस सबके बीच तुम जो हो,
वह बनी रहना ।

बहुत कुछ बनना ।
बहुत कुछ बदलेगा 
तुम भी बदलते हुए जीना 
बस तासीर मत बदलने देना ।


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आभार सहित 
चित्र इंटरनेट से 
इंडिया पोस्ट डाक टिकट 


6 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(१४-०५-२०२२ ) को
    'रिश्ते कपड़े नहीं '(चर्चा अंक-४४३०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सुन्दर अपेक्षाओं से बुनी सुन्दर रचना!

    जवाब देंहटाएं

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