सोमवार, 21 मार्च 2022

गौरैया अब मत जाना


बचपन से आदत थी ।
गौरैया के चहचहाने,
गहरे से हल्के नीले होते
नभ में धुंधले पङते तारे  
और उजाला होने पर
आंख खुलती थी ।
मानो गौरैया वृंद 
आता था जगाने 
बेनागा हर सुबह ।

जनमघुट्टी में घोल कर
एक बात माँ ने 
समझाई थी ।
इंसानों और पंछियों को
पीने का पानी और 
चुगने को दाना
पहले परोसना ।
फिर दिनचर्या 
आरंभ करना ।

समय बीता ।
बचपन की सहेलियों का
जिस तरह कोई
पता न था,
ठीक वैसे ही गौरैया का
घर में आना-जाना
कम होता गया ।
कुछ ख़ास फ़र्क नहीं पङा ।
बस नींद का उचटना
उचटना आम हो गया ।

फिर एक दिन सहसा
कानों में पङी वही
बचपन वाली 
गौरैया के चहचहाने 
का मधुर गुंजन ।

चारों तरफ़ देखा
मुंडेर पर सामने 
हो रहा था बाक़ायदा 
गौरैया सम्मेलन !
शोर कभी नहीं लगा
चिङियों का चहचहाना ।

घोंसला भी बना ।
आवभगत में बना-बनाया 
नीङ भी जुटाया गया ।
मिट्टी का सपाट-सा
जल का पात्र रखा गया!
दोबारा जुङ गया नाता ।

अब अकेलापन नहीं सताता ।
सूनापन भी नहीं सालता ।
छोटी-सी गौरैया का
जल में खेलना दाना चुगना ..
इतना अपनापन अनुभव होता,
मानो मुट्ठी में धङकता हो
ह्रदय मेरा और गौरैया का ।

20 टिप्‍पणियां:

  1. अम्मा की जन्मघुट्टी best है। रोज़ दिन की शुरुआत ऐसी हो तो मजे आ जाएं। कोशिश करूंगा कल से, एक चिरैया से बतियाने की।

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-3-22) को "कविता को अब तुम्हीं बाँधना" (चर्चा अंक 4376 )पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

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    1. धन्यवाद, कामिनी जी । इतना प्यारा शीर्षक । पढ़ने के लिए परम उत्सुक ।

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  3. गौरैया पर लिखी बहुत सुंदर रचना

    आपके घर आती है यह शुभ है
    बधाई

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    1. जी,शुक्रिया ।
      नित शुभ समाचार की तरह आती है गौरैया ।

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  4. बहुत सुंदर भावों से सजी कविता।
    इस समय मेरे किचन के ऊपर खिड़की में घोंसला बना लिया है,सुबह शाम मेरे साथ रहती हैं, मैं भी प्रफुल्लित वो भी । दिन भर तिनका लाती हैं, मेरे शमी के पेड़ को गंजा कर दिया है, पर क्या कहूं मेरी बचपन की दोस्त हैं न गौरैया रानी😀😀

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    1. आपने इतना सजीव वर्णन किया है कि दिखाई दे रहा है! हमारे यहाँ गौरैया तुलसी के पौधे पर एक पत्र नहीं छोङतीं !! स्वास्थ्य के प्रति पूर्णत: सजग !!! यह भी सीखना है गौरैया से !! 🤗🌿🌿🦅 धन्यवाद! अपना अनुभव साझा करने के लिए ।

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  5. बहुत ही सुंदर भाव नुपुर जी आत्मीयता और स्नेह से लबरेज।
    सुंदर सृजन।

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  6. थन्यवाद,सखी ।
    स्नेह और आत्मीयता से सींची फुलवारी में जरुर आती है गौरैया । आपका स्नेह बना रहे । गौरैया आती रहे ।
    आपने ठीक कहा ।

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  7. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति गौरैया-सी।
    सादर

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  8. शोर कभी नहीं लगा
    चिङियों का चहचहाना ।
    सुन्दर रचना की अनमोल पँक्तियाँ प्रिय नुपूरम जी।गौरैया के ये मधुर सम्मेलन जब किसी मुंडेर पर होते हैं,वह निश्चित रूप से उसके बहुत सौभाग्य की सूचक है।

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    1. आपकी स्नेहमयी सराहना सर-आँखों पर.
      गौरैया का आसपास होना, वास्तव में रौनक कर देता है.

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  9. बचपन की गौरैया आज की गौरैया जैसी कहाँ
    बहुत सुन्दर रचना

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    1. हार्दिक धन्यवाद, कविता जी.
      अब भी समय है, जतन किया तो लौट आएगी गौरैया .

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