शनिवार, 2 मई 2020
शनिवार, 25 अप्रैल 2020
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020
घर पर हैं आजकल
हम अपने घरों में बंद हैं ।
घर एक कमरे से लेकर
कई कमरों का हो सकता है ।
बेशक़ घर घर होता है ।
घर में रहने वाला अकेला
या पूरा कुनबा हो सकता है ।
बेशक़ घर घर होता है ।
बंद हैं हम ..पर घर पर हैं ।
रातों रात खानाबदोश ..
बेरोजगार नहीं हो गए ।
खुशकिस्मत हैं वो लोग
जो अपने लोगों के संग
बीमारी से लड़ने जंग में हैं,
जंग के मैदान में नहीं ।
हमारी जंग भी मामूली नहीं ।
दुश्मन का ठौर-ठिकाना नहीं ।
किससे लङना है पता नहीं ।
पर बेशक़ रहना है चौकन्ना ।
मोर्चे पर दिन-रात मुस्तैद ।
फिर भी वास्तव में हम
घरों में बंद बेहतर और
बेहतरीन हालात में हैं ।
सर पर हमारे छत तो है ।
काम और जेब में वेतन है ।
हाथ-पाँव अभी चलते हैं ।
दुख बाँटने को कोई है ।
झल्लाने को परिवार है ।
कोसने की फुरसत तो है ।
जी बहलाने को बच्चे हैं ।
पर जिनके पास इन सब में से
कोई एक चीज़ भी नहीं है,
उन पर क्या बीत रही है !!!
अगर फिर भी हमें अफ़सोस है ।
और सिर्फ़ अफ़सोस ही अफ़सोस है,
तो इसमें किसी का भी क्या दोष है ?
ये वक़्त भी बीत ही जाएगा ।
वक़्त की तो फ़ितरत ही है
बीतते बीतते बीत जाने की ।
इस वक़्त की नब्ज़ थामनी है यदि
जुगत लगानी होगी हमें ही ।
तुम देखना वक़्त कभी भी
खाली हाथ नहीं आता ।
बहुत कुछ ले जाता है ऐसा
जिसकी कद्र हमने नहीं की ।
बहुत कुछ बदल कर जाएगा
इस बार भी तुम देखना ।
बहुत कुछ सिखा कर जाएगा
जो हम खुद नहीं सीख सके ।
मूल्यों का मूल्य समझा कर जाएगा ।
वक़्त की नदी सब बहा कर ले जाएगी
किंतु तट की भूमि उपजाऊ कर जाएगी ।
जिस घर को सब कुछ दाँव पर लगा कर बनाया ।
कुछ दिन उस घर के हर कोने को जी कर देखो ।
गुरुवार, 9 अप्रैल 2020
खूब रंगो !
खूब रंगो
अंतर्मन रंगो
सकल भुवन रंगो
कोरी चूनर रंगो
काग़ज़ रंगो
स्वप्न रंगो
बोल रंगो
सुर रंगो
ताल रंगो
अपनी पहचान रंगो
जितना जी चाहे रंगो
खूब रंगो !
अपने रंगो
दूजे रंगो
भाव रंगो
साज रंगो
प्राण रंगो
दरो-दीवार रंगो
खेल-खिलौने रंगो
अपनी भावनाएं रंगो !
जितना जी चाहे रंगो !
खूब रंगो !
समय की सांसें रंगो
भवितव्य की गिरहें रंगो
घुमड़ती घटाएं रंगो
बल खाती हवाएं रंगो
जल की हलचल रंगो
नैया की पतवार रंगो
जितना जी चाहे रंगो
जीवन में हर रंग भरो
मेहँदी की तरह रचो !
खूब रंगो ! खूब रचो !
बुधवार, 8 अप्रैल 2020
उपहार
उपहार होते हैं
कई मिज़ाज के ।
एक होते हैं व्यवहार
निभाने के लिए ।
दूजे होते हैं संवाद
बढ़ाने के लिए ।
वो कहने के लिए
जो कहते ना बने ।
गिनती के शब्दों में
हरगिज़ बांधे न बंधे ।
कुछ होते हैं
प्यार दुलार में पगे ।
मीठे बताशों से ।
कुछ होते हैं
बात समझाते हुए ।
धैर्य धन से सधे ।
कुछ होते हैं
नटखट मासूम से ।
जग भर से अनोखे ।
और कुछ होते हैं
आशीर्वाद सरीखे ।
मर्म को झंकृत करते ।
ये उपहार होते हैं
खेतों में बोए
बीज जैसे,
जिनसे उपजती है
लहलहाती फसल ।
औपचारिकता से परे ..
अचानक सूझी
कविता जैसे !
हृदय में टिमटिमाती
आस जैसे ।
बड़े सिर पर रख दें
हाथ जैसे ।
******************************************************************************
रिश्ता तो कोई ऐसा ख़ास नहीं. पर उन्हें जय मौसाजी के संबोधन से जाना है. वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित कलाकार ,आर्ट स्कूल के प्रधानाध्यापक, लेखक और अपने सिद्धांतों पर अडिग व्यक्तित्व के रूप में उन्हें जाना और हमेशा यह तमन्ना रही कि कभी उनसे सीखने का अवसर मिले. वह अवसर तो पा नहीं सके पर अचानक एक दिन उनका भेजा उपहार मिला बिना किसी अवसर के ! चहेते कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ इतने सुन्दर स्वरुप में आशीर्वाद की तरह मिलीं. कविता का अक्षय पात्र ! जो चाहे इसमें समेटो ! जो चाहे बांटो !
******************************************************************************
बुधवार, 1 अप्रैल 2020
निःशब्द
अपनी एक भाषा,
जिसे हर कोई
समझ नहीं पाता ।
पहले कुछ भी
सुनाई नहीं देता ।
होती है
घबराहट सी ।
क्योंकि रिक्तता
बहुत ज़्यादा
शोर मचाती है ।
बहुत कुछ शोर में
छुपा देती है ।
फिर एक बोझ-सा
उतर जाता है ।
बोझिल तनाव
शिथिल पड़ जाता है ।
उसके बाद बहुत कुछ
सुनाई देता है ।
जो हमेशा से था,
पर ढका हुआ था ।
अपने ही हृदय का
मद्धम स्पंदन ।
कभी सुनने का
आग्रह कहाँ था ..
पत्तों की सरसराहट
लयबद्ध हिलना,
अभिवादन करना ।
धूप की दिनचर्या ।
छत पर चढ़ना और
सीढ़ी से उतरना।
चंचल गिलहरी का
दौड़ना कुतरना ।
पक्षियों का सुरीला
अंतरंग वार्तालाप ।
समय की पदचाप ।
सुकून भरा घर अपना
जिसने हमेशा जीवन का
हर व्यतिक्रम झेला ।
करीने से सजा हुआ ।
एक-एक बिसरी बात
स्मरण कराता हुआ ।
कोने में लाचार पड़ा
सामान कसरत का ।
रंगों का पुराना डिब्बा
अंबार किताबों का ।
बाबूजी का बाजा ।
इन सबका उलाहना
सुनाई ही कब दिया ?
जगत के कोलाहल में
निज स्वर खो गया ।
जब बाहर का शोर थमा
अंतरतम से संवाद हुआ ।
मानो मेले में बिछड़ा हुआ
कोई पुराना मीत मिला ।
बुधवार, 25 मार्च 2020
नव संवत्सर अभिवादन
अब समय आ गया है
पुराने बहीखाते बंद कर
नई जिल्द बंधवाने का ..
पुरानी सिलाई उधेड़ कर
नए धागों से भविष्य बुनने का ।
द्वार पर खड़ा है नव संवत्सर
अभिवादन करें इस बार हम
सविनय देहली पूजन कर ।
सब कुछ ठहर गया है ।
समय चकित खड़ा है ।
अब समय आ गया है,
सारे नियम बदलने का ।
विस्मृत पाठ दोहराने का ।
अब समय आ गया है
सजग सचेत सतर्क होने का ।
स्वयं से प्रश्न पूछने का,
क्या हमें यही चाहिए था
जो विनाश अब मिला है ?
या लक्ष्य भेद हो न सका ?
ध्येय से ध्यान भटक गया ।
अब समय आ गया है
आदतों को बदलने का ।
व्यवधान दूर करने का,
समाधान ढूढने का ।
मनमानी करना काम ना आया ।
प्रकृति ने यह सबक सिखाया,
सीखो मानव आदर करना,
प्रकृति और जीवन चक्र का ।
समय रहते जो मानव समझ गया,
मंगल आगमन होगा नव संवत्सर का ।
मंगलवार, 24 मार्च 2020
तुम सलामत रहो गौरैया
दाना चुगने नित आती रहो,
बड़े शहरों के छोटे घरों में
फुदकने चहकने के लिए ।
क्योंकि तुम हो शुभ शगुन
जीवन का सहृदय स्पंदन ।
तुम जब-जब घर आती हो,
हर बार दिलासा देती हो,
कि अब भी कहीं बचे हैं
हरे-भरे पेड़, बाग-बगीचे,
जिनमें अब भी खेलते हैं
बच्चे और बुजुर्ग टहलते ।
तुम्हारी बदौलत जान गए
हम अहमियत खिड़की में
संजोए इकलौते पौधे की
हरेक फूल के खिलने की ।
तुम्हारा आना दाना चुगना,
पानी पीना घोंसला बनाना,
जंगले से ताक-झांक करना,
और फिर फुर्र से उड़ जाना,
जी को है बहुत-बहुत भाता
मानो हरसिंगार का झरना ।
बना रहे तुम्हारा आना-जाना,
देखो शहरों को भूल मत जाना !
घर आंगन की रौनक़ बनी रहना
तुम सदा सलामत रहो गौरैया !
शुक्रवार, 20 मार्च 2020
दीवार से सटा फूल खिला
दीवार से सट कर
खिला हुआ एक पौधा
कैमरा फ़्रेम के बीचोंबीच
अचानक आ खड़ा हुआ,
महा-जिज्ञासु बच्चे सा
टुकुर-टुकुर ताकता हुआ ।
तब हमारा भी ध्यान गया ।
क्यों दीवार से सट कर
खिला हुआ है ये पौधा ?
खिला हुआ है ये पौधा ?
सामने तो खुला मैदान था ..
क्या अबीर-गुलाल जब उड़ा
हुड़दंग से बचता हुआ
जिसकी मुट्ठी में रंग था
छोटा-सा बच्चा
ईंट की दीवार से लग कर
खड़ा हो गया ? या ..
क्या कोई नन्हा रूठ कर
मुँह फुला कर
मुँह फुला कर
सबसे दूर जा कर
मुँह फेर कर
जा खड़ा हुआ है ?
ताकि गुस्सा भी ज़ाहिर हो..
नज़रों से ओझल भी ना हो..
कोई टॉफी देकर बहला ले !
खुशामद कर के मना ले !
रूठने के मासूम बहानों में
भोला बचपन छलकता है ।
भोला बचपन छलकता है ।
अनायास ही खिले फूल में
अंतरतम खिल उठता है ।
गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020
बापू की पेंसिल
तुम्हें पता तो होगा
दुनिया में कितनी
अफ़रा-तफ़री
मची हुई है
इन दिनों ।
जंगलों में
आग लग रही है ।
वृक्ष पशु पक्षी
ख़त्म हो रहे हैं ।
बाढ़ आ रही है कहीं ।
सूखा पड़ रहा है कहीं ।
ग्लेशियर पिघल रहे हैं ।
समंदर गरमा रहे हैं ।
मौसम बेमौसम बदल रहे हैं ।
फसलों पर ओले पड़ रहे हैं ।
प्रकृति डाँवाडोल है ।
मनुष्य अत्यंत भ्रमित है ।
ऐसे में तुम्हारी छोटी-सी
पेंसिल याद आ रही है,
जो मिल नहीं रही थी..
और तुम ढूंढे जा रहे थे ।
सब समझा रहे थे तुम्हें,
बापू आपकी पेंसिल तो
खत्म होने को ही थी !
दूसरी पेंसिल ले लीजिए !
पर अपना अमूल्य समय
उसे ढूंढने में मत गंवाइए !
और तुम हँस दिए थे ।
कोई भी चीज़ जब तक
काम आ सके तब तक
इस्तेमाल करनी चाहिए ।
फेंकनी नहीं चाहिए ।
बापू तुम कैसे समझ गए थे ?
एक दिन अपनी फेंकी हुई
बेकार मान ली गई चीजें ही
विकराल रूप धर लेंगी
और हमें निगल जाएंगी !
बापू हम में से बहुत सारे
तब भी नहीं समझे थे,
अब भी समझ नहीं पा रहे,
आधुनिक बहुलता के फेर में थे ।
अब भी सो-सो कर जाग रहे ।
बापू तुम थे दूरदृष्टा ।
तुमने जान लिया था,
महत्व संतुलन का
और इस नियम का ..
प्रकृति से लो जितना
कम से कम दो उतना
या उससे भी ज़्यादा
जिससे मंगल हो सबका ।
सोमवार, 27 जनवरी 2020
चवन्नी मत भूलना
अपना रास्ता चुन ही लिया है,
तो पहले पूरी तैयारी करना
उसके बाद ही घर से निकलना ।
रास्ता है भई यानी सबका है ।
देखो कुछ भी हो सकता है ।
हरदम आंख-कान खुले रखना ।
और ठोकर खाने से मत डरना ।
रास्ता है तो ठोकर भी लगेगी ।
बहुत दिनों तक दुखती रहेगी ।
पर डर से चलना मत छोड़ना ।
बस संभल के हर कदम रखना ।
रास्ता है खुला कड़ी धूप तो होगी ।
फेंटा सर पर बांध कर ही निकलना ।
राह में साथ पानी अवश्य रखना ।
और जेब में ज़रूर चवन्नी रखना ।
चवन्नी से आजकल क्या आता है !
बस हृदय अपना आश्वस्त होता है ।
नारायण जपने से ही क्या होता है ?
साधना को नाम का आधार होता है ।
बुधवार, 22 जनवरी 2020
Pondering Over A Rose
Pondering over a rose
A bird meditated on
The compelling beauty
Of a blooming life,
That actually survived
The thorns in its stride.
The rose stands poised and pretty
Smiling with innocent pride.
Its fragrance is a blessing
That awakens the soul.
Reminds me how a little bird
Understands the overcoming
Of the everyday survival test.
Dodging the dangers surrounding
Its little family in the little nest.
Looking at them I got this feeling
Life's beauty lies in its struggles.
रविवार, 19 जनवरी 2020
काग़ज़ की नाव
बारिश के पानी में
छम-छम नाचते
पानी के बुलबुले
तैरते देख कर,
जब कोई बच्चा
दौड़ कर आता है,
बड़े चाव से
काग़ज़ की नाव
बना कर
पानी में बहाता है,
और सांस रोके देखता है
नाव डूबी तो नहीं !
देखते-देखते
जब हिचकोले खाती,
फिर संभलती,
नाव बहने लगती है,
और बच्चा उछलता
शोर मचाता,
अपार ख़ुशी से
ताली बजाता है . .
बारिश की बूंद-सा
वो मासूम लम्हा,
उस बच्चे को
ताउम्र,
ज़िन्दगी के किसी भी
भंवर में
डूबने नहीं देता।
बुधवार, 15 जनवरी 2020
बचपन की पतंग
बन गया आसमान !
धूप का दुशाला लपेट
सूरज उचक कर
रुई के बादल पर
जा बैठा खुश हो कर
देखने बच्चों का खेल !
पतंगों भरा आसमान ..
लो मच गया घमासान !
हवा ने बजाई विसल !
दौड़ने लगे बच्चे सब !
धूप में चमकते उनके स्वेटर
नीला, पीला, हरा, लाल ..
गुलाबी स्वेटर पर जामुनी फूल,
शक्कर पारे से बने किसी पर,
किसी का स्वेटर पट्टीदार,
किसी का स्वेटर बूटीदार !
भूरे स्वेटर पर बनी रेल !
धानी स्वेटर पर फूलों की बेल !
एक से एक चटक सबके स्वेटर !
इधर रेवड़ी बंट रही छत पर !
चमकीले ऊन सी मांझे की डोर !
चरखी संभाले मुन्नी कर रही शोर !
वो देखो दो चोटी वाली पतंग !
लम्बी जटा खोले नाचे मलंग !
चाहिए मुझे चंदोबे वाली पतंग !
दिन ढलने से पहले काटो पतंग !
सुन कर सरपट भागी काली पतंग !
उसके संग हो ली लहरिया पतंग !
पहले दी ढील फिर लिया लपेट !
चौकस नारंगी ने किया चेकमेट !
वो काटा ! चिल्ला कर उछल पड़े सब !
ध्यान हटा ! नारंगी भी झट गई कट !
खुले आसमान में बच्चों का खेल।
खेलना, झगड़ना, फिर पल भर में मेल।
बच्चों की उमंग , उड़े जैसे पतंग !
पतंगें भी कभी करें, बच्चों-सा ऊधम !
अजी ! काटो पतंग या कट जाए पतंग !
मिलजुल कर मौज करो सबके संग !
तिल के लड्डू और गुड़ की गजक,
मुँह करो मीठा और बोलो मीठे बोल !
सोमवार, 6 जनवरी 2020
गुलाबी झुमके
बिटिया झुमके ले लो !
गुलाबी ठंड में
गुलाबी दुपट्टे संग
खूब फबेंगे तुम पर ।
गुलाब सी खिल उठोगी
बीबी इन्हें पहन कर !
गुलाबी रंग के क्या कहने !
और उस पर गुलाबी झुमके !
चेहरे की रंगत बदल देंगे !
गाल ग़ुलाबी कर देंगे !
जब हौले-हौले हिलेंगे
जी की बतियाँ कह देंगे ।
पहन के तो देखो
फिर चाहे मत लीजो
देखने के भाव ना लगते !
पहने तो फिर ना उतरते !
टूटेंगे तो नए मिलेंगे ।
पर फीके ना पड़ेंगे !
बड़े ग़ज़ब के हैं ये झुमके !
बड़े ग़ज़ब के हैं ये झुमके !
पिया के मन में जा अटकते !
बड़े काम के हैं ये झुमके !
बहरूपिये झुमके !
चाहे पर्स में बांध लो !
चाबी का गुच्छा बना लो !
या परांदे में गूंथ लो !
मेरी बात मानो !
इन्हें रख ही लो !
जब इन्हें पहन कर
किसी के मन भाओगी,
तो भौजी मुझे भी
याद करना !
गुलाबी रंग तो है ही
दुलार और मनुहार का !
खुशियों का शगुन हैं ये ..
जो अब हुए तुम्हारे
गुलाबी झुमके !
रविवार, 5 जनवरी 2020
गुलफ़ाम
और इनसे मिलिए !
माई के हाथों का बुना
लाल स्वेटर पहने
हरा गुलूबंद लपेटे
तबीयत से
इतरा रहे हैं !
बन-ठन के
गुलफाम बने
चले जा रहे हैं !
श्रीमान गुलाब राय की
बेफ़िक्र मुस्कान में,
गरमाहट,
गुनगुनी धूप की नहीं..
माई की
ममता से
डबडबाई आंखों,
काम कर-कर के
खुरदुरी हुई हथेलियों
और ऊन-सलाई सी
दक्ष उंगलियों की है !
गुरुवार, 2 जनवरी 2020
वंदनवार
एक दिन अकस्मात
झर गए यदि सब पात,
ऐसा आए प्रचंड झंझावात ..
ना जाने क्या होगा तब ?
सोच कर ह्रदय होता कंपित।
सूखी टहनियों पर कौन गाता गीत ?
सुने ठूंठ पर कौन बनता नीड़ ?
रीते वृक्ष का कोई क्यों हो मीत ?
क्या कभी हो पायेगा ऐसा संभव ?
ठूंठ की जड़ में जाग्रत हो चेतना।
प्राण का संचार हो शाखाओं में ऐसा ..
लौट आए बेरंग डालियों में हरीतिमा।
कोई पंछी रुपहला राह भूले पथिक सा,
संध्या समय में आन बैठे विस्मित-सा।
अनायास ही छेड़ दे कोई राग ऐसा,
धूप और वर्षा की बूंदों के शगुन-सा।
साहस के नव पल्लवों की हो ऐसी छटा
पात-पात शोभित हो वंदनवार-सा।
रविवार, 29 दिसंबर 2019
बाप
समझ में आया,
जो बहुत पहले
समझाया गया था ।
पर समझ ..
आया नहीं था ।
आया नहीं था ।
माँ के मन का अवसाद
उफ़नती नदी समान
आंखों से छलक जाता है ।
जी हल्का हो जाता है,
जैसे रुई का फाहा ।
पोंछ देता है
औलाद की आँखों का
औलाद की आँखों का
फैला हुआ काजल ।
और हर चोट पर
लगा देता है मरहम ।
लगा देता है मरहम ।
बाप के सीने में
उठते हैं कई तूफ़ान ।
घुमड़ते हैं बादल
गरज कर,
बिना बरसे
हो जाते हैं चट्टान ।
आंसू रिस-रिस कर
भीतर ही भीतर
हिला देते हैं जड़ ।
पर व्यक्त नहीं करता
कभी भी बाप ।
विस्तार कर देता है
अपनी व्यथा का ।
बन जाता है वरद हस्त,
विशाल वट वृक्ष..
विशाल वट वृक्ष..
और विराट आसमान,
जो दूर से चुपचाप
रखता है सबका ध्यान ।
जब बच्चे बनते हैं माँ-बाप,
और किसी बात पर बाप
बच्चों पर उठाता है हाथ,
याद आ जाती है
एक-एक बात ।
बाप उठाता है हाथ
बच्चे की कमज़ोरियों की
बेतरतीब लकीरें
संवारने के लिए ।
झटक देता है बच्चे को दूर
उसे अपने पैरों पे
खड़ा करने के लिए ....
अपने सामने ...
ताकि झटका लगे
तो संभाल सके,
वक़्त रहते बच्चा सीख जाए
माँ-बाप के बिना भी
चलना अकेले
बिना डरे ।
बिना डरे ।
बाप के रूखेपन की तह में
बहती है सरोकार और प्यार की नदी ।
देखना .. शायद कभी दीख जाए
बाप की आंखों में नमी ।
रविवार, 24 नवंबर 2019
अल्पना
भान नहीं कुछ,
ज्ञात नहीं पथ,
मुंह चिढ़ा रहा
दोराहा ।
खेल खेलना
आया ना ।
कोई दांव ना
आया रास ।
जो भी खेला
पाई मात ।
समझ ना आया
ग़लत हुआ क्या ?
ध्येय समक्ष था
राह क्यों भूला ?
लक्ष्य जो चूका,
भ्रमित मन हुआ ।
धुंध छंटे ना ।
मार्ग सूझे ना ।
इस मोड़ पे ठिठका,
मैं बाट जोहता,
तुमसे विनती करता ..
पार्थसारथी कृष्ण सखा
इस बेर अर्जुन को क्या
ना समझाओगे गीता ?
रथ को ना दोगे दिशा ?
तुम्हारी ही रचना
मैं हूँ ना ?
तो फिर आओ ना
पूरी करो ना,
मेरे जीवन की
अल्पना ।
शुक्रवार, 15 नवंबर 2019
कृष्ण का सुदामा
खयालों में रंग हों तो
उन्हें दरारों में भर कर
रुपहली कलाकृति
बनाया जा सकता है ।
बेरंग चटकी ज़मीन को
कृष्ण भाव के गाढ़े
रंगों का महीन दुशाला
ओढ़ाया जा सकता है ।
जो उपेक्षित कोने को
अपनी कलात्मकता की
सांझी सेवा से सजा दे
वही कृष्ण का सुदामा है ।
कलाकृति : श्री कर्ण सिंह पति
बुधवार, 13 नवंबर 2019
बुधवार, 30 अक्टूबर 2019
आए हैं सिया राम
आओ
एक नए दिन का
सहर्ष स्वागत करें ।
आए हैं सिया राम
लंका जीत कर ।
अभिनन्दन करें ।
हम भी अपने-अपने
युद्ध जीतने का
संकल्प करें ।
यथासंभव
प्रसन्न रहने का
प्रयत्न करें ।
दिये की लौ से
तिमिर का
तिलक करें ।
नन्हे दियों सी
छोटी खुशियों का
आनंद संजोएं ।
मर्मभूमि पर हृदय की
सियाराम लिख
वंदन करें ।
आओ जीवन की
विसंगतियों को
त्यौहार में बदल दें ।
आओ आशा के
टिमटिमाते दियों की
झिलमिलाती रोशनी में
अल्पना बन संवर जाएं ।
सोमवार, 14 अक्टूबर 2019
डायरी के ख़ाली पन्ने
बड़ा शौक है मुझे
डायरियां इकट्ठी करने का..
उन लोगों का है कहना
जो जानते हैं मुझे।
उन लोगों का है कहना
जो जानते हैं मुझे।
देखा है उन्होंने
मुझे डायरियां खरीदते हुए,
डायरियों के इश्क में
मजनू होते हुए ..
खूबसूरत डायरी देखी नहीं
कि लट्टू हो गए !
आव देखा ना ताव
घर ले आए
सीने से लगा के !
बस यूँ समझ लीजिए
एक निकाह ही नहीं पढ़ा !
हम भी वर्ना ...
आदमी थे काम के !
आदमी थे काम के !
कभी तशरीफ़ लाइए !
नाचीज़ के गरीबखाने पे !
शेल्फ़ में करीने से सजी
दिखेंगी डायरियां !
बहुत कुछ जिनमें
बाकी है लिखना।
नाचीज़ के गरीबखाने पे !
शेल्फ़ में करीने से सजी
दिखेंगी डायरियां !
बहुत कुछ जिनमें
बाकी है लिखना।
ख़ाली पन्ने नहीं ये
दामन हैं उम्मीद का।
किसी दिन देखना,
मुझे आ जाएगा लिखना
अपने मन का।
बस ये मत पूछियेगा
इन डायरियों का होगा क्या ?
कुछ ना कुछ तो होगा ज़रूर !
ये नाज़नीं ठहरीं मेरा गुरूर !
ये नाज़नीं ठहरीं मेरा गुरूर !
और क्या कहिये इनका सुरूर !
मरमरी काग़ज़ की खुशबू
कर देती है दीवाना !
अपने-आप से बेगाना !
जब डायरी का कोरा पन्ना
खुलता है आँखों के सामने,
जी में उमड़ने लगता है
जज़्बात का सैलाब !
और बाहों में समाने लगता है
संभावनाओं का असीम आकाश।
आज नहीं तो कल बोल उठेंगे शब्द,
और भर देंगे डायरी के सारे ख़ाली पन्ने।
और भर देंगे डायरी के सारे ख़ाली पन्ने।
बुधवार, 9 अक्टूबर 2019
अंततः जीतता है सत्य ही
असत्य तो हारता ही है अंततः
बेशक़ हम समझ ही ना पाएं,
भेद न कर पाएं हार-जीत में।
चूक जाए विश्लेषण हमारा।
भ्रमित कर दे अन्वेषण हमारा।
याद करो जब घटती है दुर्घटना
अथवा होता है कुछ बहुत बुरा
आदमी अनभिज्ञ बन कर है पूछता
मेरे ही साथ आखिर ऐसा क्यों हुआ ?
मैंने क्या किया था जो यह दंड मिला ?
उसे याद नहीं आता अपना किया।
अपने ही कर्मों का मिलता है सिला।
सोचो तो अवश्य मिल जाएगा सिरा।
हर दृष्टांत रामलीला जैसा
स्पष्ट कथानक नहीं होता।
साफ़-साफ़ दिखाई नहीं देता
हमेशा न्याय विधाता का
दो और दो चार के सामान।
पर कचोटता है अनुचित जो किया।
आजीवन प्रेत बन करता है पीछा।
इसलिए विश्वास डिगने मत देना।
संशय को सेंध मत मारने देना।
जो करना चाहिए तुम वही करना।
दूसरों के किये का हिसाब तुम्हें नहीं देना।
तुमसे पूछा जायेगा कि तुमने क्या किया ?
सदस्यता लें
संदेश (Atom)















