Thursday, 6 February 2020

बापू की पेंसिल


मेरे प्यारे बापू
तुम्हें पता तो होगा
दुनिया में कितनी 
अफ़रा-तफ़री
मची हुई है 
इन दिनों ।

जंगलों में
आग लग रही है ।
वृक्ष पशु पक्षी
ख़त्म हो रहे हैं ।
बाढ़ आ रही है कहीं ।
सूखा पड़ रहा है कहीं ।
ग्लेशियर पिघल रहे हैं ।
समंदर गरमा रहे हैं ।
मौसम बेमौसम बदल रहे हैं ।
फसलों पर ओले पड़ रहे हैं ।
प्रकृति डाँवाडोल है ।
मनुष्य अत्यंत भ्रमित है ।

ऐसे में तुम्हारी छोटी-सी
पेंसिल याद आ रही है,
जो मिल नहीं रही थी..
और तुम ढूंढे जा रहे थे ।
सब समझा रहे थे तुम्हें,
बापू आपकी पेंसिल तो 
खत्म होने को ही थी !
दूसरी पेंसिल ले लीजिए !
पर अपना अमूल्य समय
उसे ढूंढने में मत गंवाइए !
और तुम हँस दिए थे ।
कोई भी चीज़ जब तक 
काम आ सके तब तक
इस्तेमाल करनी चाहिए ।
फेंकनी नहीं चाहिए ।

बापू तुम कैसे समझ गए थे ?
एक दिन अपनी फेंकी हुई
बेकार मान ली गई चीजें ही
विकराल रूप धर लेंगी
और हमें निगल जाएंगी !

बापू हम में से बहुत सारे
तब भी नहीं समझे थे,
अब भी समझ नहीं पा रहे,
आधुनिक बहुलता के फेर में थे ।
अब भी सो-सो कर जाग रहे ।

बापू तुम थे दूरदृष्टा ।
तुमने जान लिया था,
महत्व संतुलन का
और इस नियम का ..
प्रकृति से लो जितना
कम से कम दो उतना
या उससे भी ज़्यादा
जिससे मंगल हो सबका ।

16 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (07-02-2020) को "गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा "(चर्चा अंक - 3604) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है ….
    अनीता लागुरी 'अनु '

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    1. हार्दिक आभार, अनीताजी.

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ७ फरवरी २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. बापू की पेंसिल को भी साथ रखने के लिए अनेकानेक धन्यवाद, श्वेताजी.

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  3. सुंदर लेखन।
    उपयोग करने का तरीका हर किसी को कहाँ आता है

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    1. धन्यवाद, रोहितास जी.
      जहां चाह वहां राह. जो आता नहीं, वो सीखा जा सकता है.
      हम चाहें तो. : )

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  4. सटीक चिंतन देता सृजन।

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    1. अनंत आभार सखी. बापू की बातें याद करने की कोशिश है.
      कभी-कभी लगता है, हम बापू के सिखाए छोटे-छोटे पर बड़े जीवन सूत्रों को भूल गए.उन्हें बस नोटों में देखना और इस्तेमाल करना याद रहा.

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    1. धन्यवाद, कौशिक जी.
      नमस्ते पर आपका स्वागत है.
      आते रहिएगा.

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  6. बापू तुम थे दूरदृष्टा ।
    तुमने जान लिया था,
    महत्व संतुलन का
    और इस नियम का ..

    बहुत ही सुंदर , सटीक और चिंतनपरक सृजन ,सादर नमन आपको

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    1. कामिनी जी,आपकी स्नेहमयी सराहना के लिए आभारी हूँ ।

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  7. बेहद शानदार लिखा ...

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    1. आपने सुन ली सदा : )
      तहे-दिल से शुक्रिया !

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  8. लाजवाब चिंतन....
    बापू की पेंसिल ....सही कहा दूरदृष्टा थे बापू
    बापू तुम कैसे समझ गए थे ?
    एक दिन अपनी फेंकी हुई
    बेकार मान ली गई चीजें ही
    विकराल रूप धर लेंगी
    और हमें निगल जाएंगी !
    वाह!!!
    उत्कृष्ट सृजन

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    1. सुधा जी, बापू से हमने सीखा कम, और अपने अहंकार में उनका विश्लेषण बड़ी अकड़ से करते हैं. ये सब देखते हुए एक दिन अनायास ही बापू की पेंसिल याद आ गई. सारी दुनिया इन छोटी-छोटी बातों का अनुसरण करती तो आज ये नौबत नहीं आती कि विश्व भर में पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा हुआ है.
      आपका हार्दिक आभार.

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नमस्ते