Wednesday, 30 October 2019

आए हैं सिया राम




आओ
एक नए दिन का
सहर्ष स्वागत करें ।

आए हैं सिया राम
लंका जीत कर ।
अभिनन्दन करें ।

हम भी अपने-अपने
युद्ध जीतने का
संकल्प करें ।

यथासंभव
प्रसन्न रहने का
प्रयत्न करें ।

दिये की लौ से
तिमिर का
तिलक करें ।

नन्हे दियों सी
छोटी खुशियों का
आनंद संजोएं ।

मर्मभूमि पर हृदय की
सियाराम लिख
वंदन करें ।

आओ जीवन की
विसंगतियों को
त्यौहार में बदल दें ।

आओ आशा के
टिमटिमाते दियों की
झिलमिलाती रोशनी में
अल्पना बन संवर जाएं ।


8 comments:

  1. Felt rejuvenated after reading the poem. Thanks!

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    1. राम नाम का बल अपार है सा ।

      तुलसी बिरवा बाग के सींचे ते मुरझायें
      राम भरोसे जे रहें परबत पे लहरायें


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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-11-2019) को "यूं ही झुकते नहीं आसमान" (चर्चा अंक- 3506) " पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं….

    -अनीता लागुरी 'अनु'
    ---

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    1. धन्यवाद अनीता जी. नमस्ते.
      चर्चा का शीर्षक शामिल होने को प्रोत्साहित कर रहा है.

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  3. बहुत ही सुन्दर लिखा है। सब कुछ हम पर ही है, की हम ज़िन्दगी
    को कैसे जीना चाहते हैं।

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    1. भली कही नम्रता.
      नमस्ते पर तुम्हारा सहर्ष स्वागत है.
      धन्यवाद.

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  4. Replies
    1. Thank you.
      Glad you liked.
      Welcome to namaste !
      Do keep visiting !

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कुछ अपने मन की कहते चलिए

नमस्ते