Sunday, 24 November 2019

अल्पना


भान नहीं कुछ,
ज्ञात नहीं पथ,
मुंह चिढ़ा रहा
दोराहा ।

खेल खेलना
आया ना ।
कोई दांव ना 
आया रास ।
जो भी खेला
पाई मात ।

समझ ना आया
ग़लत हुआ क्या ?
ध्येय समक्ष था
राह क्यों भूला ?

लक्ष्य जो चूका,
भ्रमित मन हुआ ।
धुंध छंटे ना ।
मार्ग सूझे ना ।

इस मोड़ पे ठिठका,
मैं बाट जोहता,
तुमसे विनती करता ..

पार्थसारथी कृष्ण सखा
इस बेर अर्जुन को क्या
ना समझाओगे गीता ?
रथ को ना दोगे दिशा ?

तुम्हारी ही रचना
मैं हूँ ना ?
तो फिर आओ ना
पूरी करो ना,
मेरे जीवन की 
अल्पना ।

14 comments:

  1. Strong. Bery strong. ठाकुर जी आपके जीवन की रंगोली में रंग भर दें।

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    1. अनंत आभार अनमोल सा ।
      या अनुरागी चित्त की गति समझयौ नहीं कोय ।
      ज्यों ज्यों बूड़ै श्याम रंग त्यों त्यों उज्ज्वल होय ।।

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  2. बेहतरीन रचना नुपुर जी

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    1. शुक्रिया अनुराधा जी ।

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  3. बहुत भावपूर्ण रचना ...

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    1. धन्यवाद । आपका बहुत दिनों में इधर आना हुआ । बहुत खुशी हुई ।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (26-11-2019) को    "बिकते आज उसूल"   (चर्चा अंक 3531)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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    1. धन्यवाद शास्त्रीजी । नमस्ते ।

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    1. शुक्रिया मोहतरमा ।

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  6. भक्तिरस में ओतप्रोत करती सुंदर रचना

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कुछ अपने मन की कहते चलिए

नमस्ते