रविवार, 21 फ़रवरी 2021

विद्या ददाति विनयम्

विलक्षण है निस्संदेह 
आपकी बहुआयामी प्रतिभा ।

किंतु क्या करें बताइए 
आपकी विद्वता का ?
जिसके भार तले 
साधारण जन मन
दबते चले जाते हैं ।
धराशायी हो जाता है 
आत्मविश्वास इनका,
तिनका-तिनका जोङा
जो साहस जुटा कर ।

लाभ क्या हुआ?
यदि ज्ञान आपका
हमेशा आंखें तरेरता,
तत्काल कर दे स्वाहा 
किसी की सीखने की 
प्रबल इच्छाशक्ति ?

हमने सुना तो ये था,
फल-फूल से लदा
वृक्ष और झुक जाता है ।
जो जितना ज़्यादा 
जानता है,
उतना ही विनम्र 
होता चला जाता है ।

यदि लक्ष्य था विद्या का 
प्रभुत्व सिद्ध करना,
तो चाबुक ही क्या बुरा था,
अज्ञानी को हांकने के लिए ?
तुम बिल्कुल भूल गए क्या ?
समाज में सबको नहीं मिलता 
अवसर एक जैसा सीखने का ।

गुरुता वो नहीं जो किसी सरल सीखने वाले को
खामियां गिनवाए,अहसास कराए तुच्छता का ।
विद्या है सजल आशीष माँ का,सदा साथ रहता ।
शिक्षा है एकमात्र अनिवार्य अवलंब जीवन का ।
प्रथम संस्कार है सबसे सीखते रहने की विनम्रता ।
दीक्षा मंत्र है निर्भय हो प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता ।
अनुगत को सजग स्वालंबन में ढालने की दक्षता ।
अंतर में अंकुर आत्मविश्वास का रोपने की उदारता ।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

सही दिशा

उठो अब जागो !
दरवाज़ा कोई
खटखटा रहा,
आतुर है तुम्हें 
बुलाने को,
साथ ले जाने को ।

बाहर निकलो ।
देखो दुनिया की 
रौनक, चहल-पहल ।
काम पर सब के सब 
निकल पङे हैं ।

तुम क्यों हताश हो ?
जीवन से क्यों निराश हो ?
भागदौड़ आपाधापी से 
निरर्थक व्यस्तता से त्रस्त हो ?

चले जा रहे हैं सारे बेतहाशा 
पर इन सभी ने क्या 
मार्ग सही चुना था ?
इस अथक परिश्रम से क्या 
भला किसी का हुआ था ?

अच्छा तो ये है जटिल समस्या!
तुम्हारा चिंतन ही बन गया 
तुम्हारे कर्म पथ की बाधा !

सुनो सोचते रहने से भी क्या होगा ?
घर की बिजली का बिल ही बढेगा !
करवट बदल-बदल कर बिस्तर पर
ना किसी बिल का भुगतान होगा,
ना ही किसी का कल्याण होगा !

कुछ ना करने से और तार उलझेगा ।
दम तोङेंगे सुर, राग बिखर जाएगा ।
कुछ करने से ही जीवन क्रम सुधरेगा ।
जो ग़लत राह चुनते हैं, उन्हें जाने दो ।
तुम अपने जीवन को तो सही दिशा दो ।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

सूर्यास्त के बाद

शाम ढले देखा,
सामने की छत पर 
पहने नारंगी जामा
टहल रहा था सूरज,
अब तक ढला न था ।

असमंजस में था ।
मन में सोच रहा था
आज अगर छत पर
सो जाऊं मैं चुपचाप ?
देखूँ कैसे दिखते हैं तारे 
दूर गगन में झिलमिलाते ।
कैसा लगता है चंद्रमा ?
नभ के भाल पर चमकता ।
और चांदनी का उजियारा ।

इतने में कोई वहां रख गया
इक लालटेन और बस्ता ।
जला कर पढ़ने लगा बच्चा ।
सूरज फिर सोच में पङ गया ।

सूर्यास्त के पश्चात जगत सारा
करता है विश्राम थका-हारा ।
अथवा निपटाता बाकी के काम,
मन में लिए भोर होने की आशा ।
सबके जिम्मे अपना-अपना काम ।
बोरिया-बिस्तर अपना बांध तत्काल 
करना होगा मुझे अविलंब प्रयाण ।
समस्त सृष्टि को है जिसकी प्रतीक्षा 
समय पर वह सूर्योदय अवश्य होगा ।

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

जन गण मन प्रतिबद्ध

जन्मभूमि के लिए 
जो जिये और मरे,
उनका अनुकरण 
कर पाएं हम ..
साहस का उनके 
कर वरण,
नित करें स्मरण 
और वंदन ।

शहीदों और वीरों के
बलिदान का हर क्षण,
अमिट छाप छोङे
जन मानस पर ।

जो न्योछावर हुए 
देश की माटी पर,
उन पर न्योछावर 
देश की धङकन ।

श्वास श्वास कृतज्ञ
शत शत नमन,
सदा सेवा में सजग
सज्ज रहें जन गण मन ।


रविवार, 24 जनवरी 2021

निरे बांस की बांसुरी

सब कुछ 
छिन जाने के बाद भी 
कुछ बचा रहता है ।

सब समाप्त 
होने के बाद भी 
शेष रहता है जीवन, 
कहीं न कहीं ।

सब कुछ 
हार जाने के बाद भी, 
बनी रहती है 
विजय की कामना ।

फिर तुम्हें क्यों लगता है,
कि तुममें कुछ नहीं बचा ?
न कोई इच्छा, 
न कोई भावना ?
न ही तुम्हारी कोई उपयोगिता  ..

अरे! इस सृष्टि में तो,
ठूंठ भी 
बेकार नहीं जाता ।

टटोलो अपने भीतर ।
संभाल कर,
और बताओ क्या 
कुछ नहीं मिला  ?

क्या कहा  ?
बस ढांचा ?
अंदर से खोखला ..
तो क्या  ?

खोखला बांस भी, 
तमाम छिद्रान्वेषण के बावजूद, 
केशव के प्राण फूंकने पर,
बांसुरी बन जाता है ।

फिर तुम तो मनुष्य हो ।
जो बन सके, वो करो ।
चरणों की रज ही बनो,
जो न बन सको ..
गिरिधारी की बांसुरी ।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

संदर्भ जीवन का


इस मिथ्या जगत में 
एक सच्ची अनुभूति की
आस है मुझे, इसलिए 
हर करवट में दुनिया की
दिलचस्पी है मेरी ।

इतने शानदार खेल-तमाशे 
चप्पे-चप्पे पर जिसने सजाए,
वो जो हो हमारे-तुम्हारे लिए,
नीरस तो नहीं होगा ।

कुछ तो होगा ऐसा,
जिसके लिए जी-जान लगा के
मेंहदी की तरह रचता गया ..
रचता गया संसार चक्रव्यूह जैसा,
किसके लिए  ?
अभिमन्यु के लिए  ??
छल और बल की क्षुद्र विभीषिका 
डिगा ना पाई जिसकी सत्यनिष्ठा ।

इसीलिए मैंने कहा ना ।
इस विलक्षण अनुभूति का
मुझे भी है स्वाद चखना ।

सबके जीवन में घटती है एक लोककथा ।
हर पङाव पर मिलती है कोई संभावना ।
भ्रम को भेदने वाला कोई तो बाण होगा ।
अभिमन्यु छला गया पर परास्त ना हुआ । 
उसके प्राणों में जिस स्वर ने अलख जगाया
निर्भय चेतना का ... कभी तो भान होगा
मनमोहन की बाँसुरी के उस सम्मोहन का ।

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

उङ रही पतंग है



सुबह सुबह सांकल खटका के,
चंचल हवा आ बैठी सिरहाने ।
हाथों में थामे थी चरखी और पतंग, 
बातों से छलके थी बावली उमंग !
बोली जल्दी चलो खुले मैदान में !
सूरज भी आ डटा है आसमान में !
झट से रख लो संग पानी की बोतल !
मूंगफली,तिल के लड्डू,रेवङी,गजक !
देखो टोलियाँ तैनात हैं आमने-सामने !
पतंगें भी कमर कस के तनी हैं शान से !
बहनें मुस्तैद हैं चरखियां लिए हाथ में !
हरगिज़ आंच ना आए भाईयों की आन पे !
लो वो उठीं ऊपर और छा गईं आकाश में !
पतंगें ही पतंगें टंकी हैं धूप की दुकान में !
बच्चे तो बच्चे बङे भी बच्चे हो गए !
हंसी - ठिठोली घुल गई आबो-हवा में !
जिसने पतंग काटी सिकंदर से कम नहीं !
जिसकी कट गई उसके दुख की सीमा नहीं !
खेल क्या है ये तो भावनाओं की उङान है !
डोर है, पतंग है और खुला आसमान है !
पतंगों की कोरों पर झूलती उमंग है !
ठान लो यदि संभावनाएं अनंत हैं !
वो काटे चिल्ला कर नाचे मस्तमौला है !
लूटने पतंग जो दौङा वो मलंग है !
सच्चा है सारा खेल झूठी ये जंग है !
झूठी है हार-जीत सच्चा मेलजोल है !


रविवार, 20 दिसंबर 2020

प्रफुल्ल फूल



टहनियों पे खिलते फूल ।
पूजा की टोकरी में रखे फूल ।
माला में पिरोए फूल ।
चित्रों में सजीव फूल ।
किताबों में संजोए फूल ।
गुलदस्तों से झांकते फूल ।
सेहरे की लङियों में फूल ।
वेणी में गुंथे गजरे के फूल ।
मन की टोह लेते फूल ।

मन की टोह लेते फूल ।
मर्म को छू लेते हैं फूल ।

ख़ैरियत का पैग़ाम
लाते हैं फूल ।
दुआओं भरा सलाम
पहुंचाते हैं फूल ।

तरह-तरह से बचा के
रखे जाते हैं अपने-अपने 
जिगरी .. मनपसंद फूल ।
दवा की मानिंद वक़्त पड़े 
काम आते हैं फूल ।
 
और फूलों की सुगंध ?
कैसे सहेजी जाती है ?

आप ही गुपचुप.. स्वतः
प्राणों में समा जाती है,
कल्पना में बिखर जाती है,
जीवन में घुल-मिल जाती है,
प्रफुल्लित फूलों की सुगंध ।

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

ढलते सूरज ने भी देखा

आज संध्या समय
जो बाला दिया, 
बहुत देर तक
जलता रहा ।

अकंपित लौ
तम के भाल पर 
तिलक समान
शोभायमान ।

लक्ष्य केवल साध्य 
पूर्णतः समर्पित 
ध्यानावस्थित लौ ।

जब-जब दीप बाला,
जगमगाता देखा 
अंतर के देवालय का
छोटा-सा आला ।

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

एक रुपहला फूल

कोई कोई दिन 
होता है ऐसा ..
स्वाद उतरा हुआ सा
फीका ..मन परास्त 
हार मान लेता,
जब काम सधते नहीं 
किसी तरह भी ।

तब ही अकस्मात 
नज़र पड़ी बाहर
रखे गमले पर ।

जिस पौधे की 
सेवा बहुत की थी,
फिर छोङ दी थी
सारी उम्मीद ।

उसी पौधे पर
नाउम्मीदी को 
सरासर 
मात दे कर,
खिला था 
एक रुपहला फूल ।

सोमवार, 31 अगस्त 2020

ना छोड़ेंगे अकेला

होने चाहिए
हर आदमी की
ज़िंदगी में
मुट्ठी भर ऐसे लोग
जो आपकी चुप्पी का
बहुत बुरा मानें ।
अपनी नाराज़गी से
आपको खंगालें,
मजबूर कर दें,
अपनी चुप्पी
उंडेल देने को ।
ये जताने को कि 
फ़र्क पड़ता है उन्हें
हमारे होने या
ना होने से ।
आश्वस्त करने के लिए
कि वो हमेशा रहेंगे
मौजूद कहीं आसपास
आपको तंग करने के लिए ।
जीना हराम कर देंगे ।
पर अकेला नहीं छोड़ेंगे ।

शनिवार, 29 अगस्त 2020

The Colour Palette


I like the way
The green leaves
Of bougainvillea
Slowly put on
A shade of pink
A mellow yellow 
And sage green,
Before a full bloom..
Opening your heart
To the much awaited
burst of colour...
A fashionable pink
Silent sombre white
Or a go between
Peach and orange !

Same with the rose.
A touch of vermilion
On some leaves
All set to roll out
A red carpet
To welcome 
The blooming bud first,
And then
Sashaying in 
The ever graceful 
Most beautiful rose
Striking a poignant pose
Wearing an endearing fragrance.

This is how nature blooms.
The seasons change.

Witnessing the flowering,
The bees buzzing busily
Greeting the butterflies
Basking in sunshine,
Harnessing the nectar
Making honey..
Gradually carves out
A vast warm embracing 
Space within,
To absorb
The inevitable and
The inexplicable changes,
And learning to discover 
A purpose 
In the different shades
Of the colour palette
Named life.

रविवार, 23 अगस्त 2020

ये भी नहीं


फूल नहीं,
फूल की खुशबू नहीं ।
आकाश का छलकता
गहरा नीला रंग नहीं ।
बादलों के पंख नहीं ।
चंद्र और सूर्य नहीं ।
बारिश में भीगी
मिट्टी की सुगंध नहीं ।
नदी का भंवर नहीं ।
कल कल बहता 
जल भी नहीं ।
नैया नहीं, खेवैया नहीं ।
आँगन के कुँए का 
मीठा पानी भी नहीं ।
रूप की लुनाई नहीं ।
शिशु की किलकारी नहीं ।
बगीचे की फुलवारी नहीं ।
धनुष पर चढ़ी प्रत्यंचा नहीं ।
यौवन का मुक्त हास नहीं ।
वय का विलाप नहीं ।
पश्चाताप नहीं ।
प्रकृति का श्रृंगार नहीं ।
पक्षी का गान नहीं ।
ज्ञान की गरिमा नहीं ।
प्रारब्ध का अट्टहास नहीं ।
बचपन की मधुर स्मृति नहीं ।
शब्दों का द्वंद नहीं ।
नवरस अलंकार नहीं ।

ये सब नहीं ।
इन सबके होने की
गहन अनुभूति ही 
कविता है ।


बुधवार, 19 अगस्त 2020

कभी जाना नहीं कैसे


रात्रि के सूने निविड़ अंधकार में
निकल पड़ो अकेले अनमने से
रास्ता नापने निस्तब्ध निर्जन में
तो जान पड़ता है चलते-चलते
बहुत कुछ है अपनी परिधि में जिसे
जान कर भी कभी जाना नहीं कैसे 

न पत्तों की सरसराहट न कोई पदचाप
ऐसे में दूर कहीं से आने लगी मंद-मंद
मंदिर के घंटों की ध्वनि लयलीन और स्पष्ट
हृदय का कोलाहल करती शांत और आश्वस्त
गगन पर टंके चंद्रमा को भी हो रहा कौतूहल
बोझिल परिवेश में हुआ भला-सा परिवर्तन

अनायास ही खुल गए स्मृति के बंद किवाड़
मंदिर जाने के मार्ग में पड़ता था एक घर
टूटी-फूटी ईंटों से झांकता कुटिया का कोना
ढिबरी की रोशनी में मंजीरों का स्वर मधुर
एक साधु अपने में मगन गाता रहता भजन

आते-जाते बना रहा बरसों तक यह क्रम
कीर्तन में डूबा भक्त प्रसन्न भाव अविचल
रस यमुना प्रवाहित होती रहती प्रतिपल
लहर-लहर लयबद्ध प्रवाहित यमुना जल
तट पर हो रहा गान झिलमिलाता दीपदान

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

बौराई सुबह


सुबह हो गई है ।
देखो ठंडी हवा बह रही है ।
पहाड़ी चमेली खिली है ।
अमलतास झूम रहा है ।
तमाल ध्यानावस्थित
और भी घना लग रहा है ।

तुलसी के पौधे मानो
संकीर्तन में मग्न
ठाकुर द्वारे पर समवेत
प्रफुल्लित प्रतीक्षारत
हरि को समर्पित 
होने को तत्पर ।

वो दूर खड़ी कर्णिका
सोच में डूबी हुई सी
हिलडुल कर जता रही
सेवा व्रत लेने की सहमति ।

हरी घास लग रही
और भी हरी ..
नरम दूब मखमली ।

और अभी-अभी कोई
स्थल कमल के पत्ते पर
रख कर मुट्ठी भर मौलश्री 
थमा गया है ।

सहसा सब कुछ बदल गया है ।
आकाश में फड़फड़ाती नवरंगी पतंग
अब सुरों की तरह सध गई है ।

मौसम रहमदिल हो गया है ।
हथेली में खुशबू बस गई है ।
जैसे मेंहदी रचती है ।
क्या हो यदि यही बौराई सुगन्ध
गुपचुप समा जाए 
हाथ की रेखाओं में !
बदलें नहीं हाथ की रेखाएं
बस बौरा जाएं !

देखो रंग-रंग के अनगिनत 
फूल खिले हैं ।
तुम भी खिलो ।
खाली खानों में रंग भरो ।

आज के दिन का स्वागत करो । 
चहचहाती चिड़ियों का गान सुनो । 

स्वर सरस्वती सुब्बलक्ष्मी का सुप्रभात
झकझोर कर जगा रहा है ।
जीवन में रस घोल रहा है ।
बिजली की तरह कौंध रहा है 
तुम भी कौंधो !

भ्रमर बन फूलों का मधु रस चखो ।
पराग हृदयंगम करो 
मौलश्री की बौराई सुगंध बनो ।

सुबह हो गई है, उठो ।

सोमवार, 6 जुलाई 2020

अपने में क्या रहना ?



कभी देखा है 

किसी वृक्ष को 
अपने में 
सिमट कर रहते ?

वृक्ष की जड़ें
मिट्टी में जगह
बनाती जाती हैं ।
वृक्ष की शाखाएं
बाहें पसारे
झूला झूलती हैं,
पल्लवित होती हैं ।

फूल खिलते हैं
जब पंखुरियाँ
घूँघट खोल
श्याम भ्रमर को
भोलेपन से तकती हैं ..
हौले से खिलती हैं ।
खिलती हैं नृत्य मुद्रा में,
सुगंध घोलती हुई
धीर समीर में,
लयबद्ध लहर लहर ।

फिर फल आते हैं,
पक कर गिर जाते हैं,
धरती की झोली में ।
पत्तियों की ओट में
पंछी टहनी टहनी
जोड़ घोंसला बनाते हैं ।

ये सब इसलिए
कि खुली बाँहों में ही
आकाश समा पाता है ।
क्योंकि निरंतर बहना
नदी को निर्मल बनाता है ।

इसलिए नदी की तरह बहना ।
खुशबू की तरह हवाओं में
घुलमिल कर जीना ।
सिर्फ़ अपने में क्या रहना ?



शुक्रवार, 26 जून 2020

रिश्तों का मर्म

रिश्ते 
रेत के महल होते हैं ।
भव्य सुंदर मनोरम
पर एक लहर आए
तो ढह जाते हैं ।
उंगलियों के बीच से
रेत की तरह 
फिसल जाते हैं,
देखते-देखते ।
जतन ना करने से
और कई बार
बिना किसी वजह
रीत जाते हैं ।

संबंध
छीज जाते हैं ।
जैसे छलनी में से
जल ।
अश्रु जल से
बह जाते हैं,
जब बांध
टूट जाता है ।

भवितव्य
पता किसे ?
पर रिश्ते
बनते ही हैं
भले टूट जाएं
कालांतर में ।
बदल जाएं
अनायास ।

स्वभावगत 
क्रम टूटता नहीं पर
प्रकृति का ।
कण-कण जुड़ा है,
एक दूसरे से ।
रिश्ते ना जुड़ें
ये हो सकता नहीं ।
रिश्तों के बिना
आदमी जी सकता नहीं ।

तो क्या हुआ ?
रिश्ते बनाना-निभाना
कष्टप्रद हो या सुखद
व्यर्थ नहीं जाता 
रिश्ते जीना ।

हर रिश्ता
कोई बीज बो जाता है ।
फले ना फले बीज
वृक्ष बन ही जाता है ।
वृक्ष की सघन छाँव में
संभव है एक दिन
कोई थक कर बैठे
और समझ पाए
लेन-देन से परे
रिश्ते-नातों का मर्म ।




गुरुवार, 11 जून 2020

अंतर्कथा

तिरेपन तुरपनों के बाद
बार-बार उधड़ी सिलाइयों की,
तिरेपन पैबंद जोड़ने के बाद,
रंग कुछ फीके पड़ने के बाद,
जैसा भी है कथा ताना-बाना,
कुल मिला कर बुरा नहीं रहा,
हिसाब-किताब लेन-देन का,
बही खाते में जो दर्ज हुआ ।
जुलाहे ने जतन से जो बुना था ।
साधारण पर कच्चा नहीं था धागा ।
धागों और बुनावट की सुघड़ कला
सीखते-समझते समय सरस बीता
तिरेपन धागों की तिहत्तर तुकबंदियां
तमाम किस्सा बिल्कुल वैसा ही था
जैसा और जितना हमसे बन पड़ा ।
अब आगे बढ़ती है धागों की अंतर्कथा ।



शुक्रवार, 5 जून 2020

खुश रहिए

खुश रहने को 
कौन बहुत सामान चाहिए !
सुबह जल्दी आँख खुली
खुश हो गए !
एक नई चिड़िया देखी
खुश हो गए !
बड़े दिनों में चिट्ठी आई 
खुश हो गए !
आज चहेती सखी मिली
खुश हो गए !
गमले में इक कली खिली
खुश हो गए !
नल में पानी देर तक आया
खुश हो गए !
मुश्किल सवाल हल हो गए
खुश हो गए !
अच्छा-सा इक गीत सुना
खुश हो गए !
नानी ने नई कहानी कही
खुश हो गए !
बाबूजी ने शाबाशी दी
खुश हो गए !
माँ की गोद में सो गए
खुश हो गए !

छोटी-छोटी खुशियाँ
चाबी भर देती हैं,
मन तो एक खिलौना है
झट चल देता है !
चलते-चलते मिलती है,
कोई राह नई !
खुशियों की
कड़ियाँ जुड़ती हैं ।
लहर लहर से
एक नदी बन जाती है ।
बड़ी खुशी पाने के लिए
खुश रहना आना चाहिए ।
वर्ना खुश होने को 
कौन बहुत सामान चाहिए !

सोमवार, 1 जून 2020

जड़ें

एक पेड़ का 
धराशायी होना,
टूट कर गिरना,
हतप्रभ कर देता है ।
एक सदमे की तरह
आघात करता है ।
कुछ तोड़ देता है
अपने भीतर ।

एक पेड़ को
ठूंठ बनते देखा
तो लगा,
क्या फ़र्क है,
पेड़ के सूखने
और भावनाओं के
जड़ हो जाने में ?

इसीलिए जब
ठूंठ भी ना रहा,
हृदय की तरल
अनुभूति भी
जाती रही ।

जड़ों के बिना कोई
जी पाता नहीं ।
टिक पाता नहीं ।
पेड़ हो या आदमी ।

सोमवार, 18 मई 2020

दिलो-दिमाग़


जा रहे हो
तुम अपने रास्ते
किसी काम से ।

तभी देखा
रास्ते के किनारे
कोई बेचारा
चोट खाया 
पड़ा हुआ था ।
कोई ना मदद को
आगे आ रहा था ।

दिल बोला
हाथ बढ़ा ।
कर सहायता
अस्पताल पहुँचा ।

दिमाग़ बोला,
क्या फ़ायदा ।
ये ना बचेगा ।
उल्टा तू फँसेगा ।

दिल फिर बोला,
बहाने न बना !
कोशिश तो कर जा
जान बचा !

दिमाग़ फिर अड़ा
कोई न कोई तो
पहुँचा ही देगा ।
तू चल ना !

किसकी सुनोगे भैया ?
कैसे लोगे फ़ैसला ?

सोचने का समय
लिए बिना,
दिल जो पहली दफ़ा
रास्ता बताता है,
सही बताता है ।

रास्ता पार कैसे होगा ?
ये तिकड़म लगाना
दिमाग़ को
बेहतर आता है ।

किसी बात को,
किसी काम को 
हाँ कहना है या 
ना कहना,
ये फ़ैसला लेना
दिल से ।

पर काम को
कैसे करना है, 
ये तय करना
दिमाग़ से ।

दिल की सुनना ।
दिमाग़ से काम लेना ।

शुक्रवार, 8 मई 2020

अंतरंग

ध्वस्त मनःस्थिति
कोई राह सूझती न थी
सन्नाटा पसरा था
बाहर और भीतर
शब्द-शून्य क्षण था
पत्ता भी हिलता न था 
अव्यक्त असह्य पीड़ा का
बादल घुमड़ रहा था ।

इतने में सहसा 
दूर कहीं टिमटिमाया
जुगनू सा
आरती का दिया
और सुनाई दी
घंटी की धीमी ध्वनि ।

भीतर कुछ पिघल गया
एक आंसू ढुलक गया ।
कोई तार जुड़ गया ।
कोई ना था पर लगा
कोई सुन रहा था
समझ रहा था
साथ था सदा।

मंगलवार, 5 मई 2020

सारी लड़ाई


सारी रस्साकशी !
सारी खींचतान !
सारी लड़ाई ..
मुल्कों के बीच ..
संप्रदायों के बीच..
समुदायों के बीच ..
परिवारों के बीच ..
लोगों के बीच ..
रिश्तों के बीच..
अधिकार की नहीं..
न्याय की नहीं ..
सामंजस्य की नहीं..
विरोधाभास की नहीं ..
विचारधारा की नहीं ..
टकराव की नहीं..
पैसे की नहीं ..
सत्ता की भी नहीं ..
आदमी की बसाई
इस बेहतरीन दुनिया की
सारी लड़ाई,
मानसिकता की ..
थी, है और होती रहेगी ।