Monday, 18 May 2020

दिलो-दिमाग़


जा रहे हो
तुम अपने रास्ते
किसी काम से ।

तभी देखा
रास्ते के किनारे
कोई बेचारा
चोट खाया 
पड़ा हुआ था ।
कोई ना मदद को
आगे आ रहा था ।

दिल बोला
हाथ बढ़ा ।
कर सहायता
अस्पताल पहुँचा ।

दिमाग़ बोला,
क्या फ़ायदा ।
ये ना बचेगा ।
उल्टा तू फँसेगा ।

दिल फिर बोला,
बहाने न बना !
कोशिश तो कर जा
जान बचा !

दिमाग़ फिर अड़ा
कोई न कोई तो
पहुँचा ही देगा ।
तू चल ना !

किसकी सुनोगे भैया ?
कैसे लोगे फ़ैसला ?

सोचने का समय
लिए बिना,
दिल जो पहली दफ़ा
रास्ता बताता है,
सही बताता है ।

रास्ता पार कैसे होगा ?
ये तिकड़म लगाना
दिमाग़ को
बेहतर आता है ।

किसी बात को,
किसी काम को 
हाँ कहना है या 
ना कहना,
ये फ़ैसला लेना
दिल से ।

पर काम को
कैसे करना है, 
ये तय करना
दिमाग़ से ।

दिल की सुनना ।
दिमाग़ से काम लेना ।

4 comments:

  1. बड़े बेहतरीन भाव

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 18 मई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. अद्भुत कविता! दिल हमेशा दिमाग को जीत लेता है न!

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कुछ अपने मन की कहते चलिए

नमस्ते