Tuesday, 7 July 2020

बौराई सुबह


सुबह हो गई है ।
देखो ठंडी हवा बह रही है ।
पहाड़ी चमेली खिली है ।
अमलतास झूम रहा है ।
तमाल ध्यानावस्थित
और भी घना लग रहा है ।

तुलसी के पौधे मानो
संकीर्तन में मग्न
ठाकुर द्वारे पर समवेत
प्रफुल्लित प्रतीक्षारत
हरि को समर्पित 
होने को तत्पर ।

वो दूर खड़ी कर्णिका
सोच में डूबी हुई सी
हिलडुल कर जता रही
सेवा व्रत लेने की सहमति ।

हरी घास लग रही
और भी हरी ..
नरम दूब मखमली ।

और अभी-अभी कोई
स्थल कमल के पत्ते पर
रख कर मुट्ठी भर मौलश्री 
थमा गया है ।

सहसा सब कुछ बदल गया है ।
आकाश में फड़फड़ाती नवरंगी पतंग
अब सुरों की तरह सध गई है ।

मौसम रहमदिल हो गया है ।
हथेली में खुशबू बस गई है ।
जैसे मेंहदी रचती है ।
क्या हो यदि यही बौराई सुगन्ध
गुपचुप समा जाए 
हाथ की रेखाओं में !
बदलें नहीं हाथ की रेखाएं
बस बौरा जाएं !

देखो रंग-रंग के अनगिनत 
फूल खिले हैं ।
तुम भी खिलो ।
खाली खानों में रंग भरो ।

आज के दिन का स्वागत करो । 
चहचहाती चिड़ियों का गान सुनो । 

स्वर सरस्वती सुब्बलक्ष्मी का सुप्रभात
झकझोर कर जगा रहा है ।
जीवन में रस घोल रहा है ।
बिजली की तरह कौंध रहा है 
तुम भी कौंधो !

भ्रमर बन फूलों का मधु रस चखो ।
पराग हृदयंगम करो 
मौलश्री की बौराई सुगंध बनो ।

सुबह हो गई है, उठो ।

5 comments:

  1. bahut hi sundar...mere birthday par apne itni pyari kavita likhi hai hayyy...tulsi amalatash sab hain.. khaskar ki humare pyari कर्णिका :) :)

    ReplyDelete
  2. सुबह हो गयी है ,उठो ! बहुत सुंदर नुपुरम जी | अत्यंत प्यारी रचना और एक उदीयमान दिवस का अति सुंदर शब्दांकन ! ये पंक्तियाँ बहुत ही मनभावन लगीं --
    तुलसी के पौधे मानो
    संकीर्तन में मग्न
    ठाकुर द्वारे पर समवेत
    प्रफुल्लित प्रतीक्षारत
    हरि को समर्पित
    होने को तत्पर !!
    हार्दिक शुभकामनाएं सुंदर रचना के लिए |

    ReplyDelete

कुछ अपने मन की कहते चलिए

नमस्ते