नीलकंठ महादेव बाघंबर धारी
हरो मन के विकार हे त्रिशूलधारी ।
तुमने विषपान कर हे त्रिपुरारी
जन की पीङा धारण की स्वयं ।
जीव मात्र को दिया पूर्ण संरक्षण
और सम्मान दिया हे पशुपतिनाथ ।
नंदी को माना कुटुंब का सदस्य
अहर्निश सेवा में किया संलग्न ।
शीष की जटाओं में गंगा की धारण
धारा का वेग बाँध,धरा का कल्याण।
वासुकि कंठ हार बन सदा ही रहें संग
जोगी की जटाओं में विराजें अर्ध चंद्र ।
रूपा सी ज्योत्सना से जगत समस्त
प्रेरित हो रचता कला, भाव अनुरूप ।
भोलेनाथ मन में हमारे हो शुभ संकल्प
ध्यान में रहे सदा सत्यम् शिवम् सुंदरम् ।
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026
सत्यम शिवम सुंदरम
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
श्रीमान गुलाब
ये गुलाब आपके लिए !
लीजिए भई लीजिए!
कोट पर लगाइए!
या जूङे में सजाइए !
ख़िदमत में हैं आपके !
इनका एहतिराम कीजिए!
ये समझ लीजिए..कि ये
फूलों के सरताज गुलाब हैं !
जीते जी हर गुलदान,
हर बगीचे की शोभा हैं,
दिलफरेब तोहफ़ा हैं ,
खूबसूरती की मिसाल हैं !
उसके बाद भी कमाल हैं !
इत्र बन कर महकते हैं !
तरी पहुँचाते हैं बन गुलकंद !
इनकी तारीफ़ में शेर पढ़े जाते हैं !
इनके बहाने अफ़साने बुने जाते हैं !
जनाब.. ये गुलाब हैं गुलाब !
तरानों, तस्वीरों, कहानियों-किस्सों में
हर दौर में मुस्कुराते नज़र आते हैं !
पुरानी किताबों के पन्नों के बीच भी
किसी की याद में मिल जाते हैं !
सबके चहेते ये गुलाब हैं गुलाब !
बुधवार, 11 फ़रवरी 2026
धरा की आत्मजा सिया
माँ जानकी सीता का स्मरण बारंबार
मुझ में बो दे धैर्य और पावन संस्कार
माँ को नित यही प्रार्थना करते देखा
जब बालक ने तो उत्सुकतावश पूछा
बोने की बात करे यह कैसी है वंदना ?
माँ ने हाथ जोङे फिर सोच कर कहा
जानते हो ना धरा से जन्मी हैं माँ सीता
धरती से ही हर बीज प्रस्फुटित होता
जङें हम सबकी धरती के मर्म में हैं ना
सृष्टि का भार समस्त धरती ने समेटा
माटी से उगता है,माटी में मिल जाता
जीवन क्रम सारा साक्षी भाव से देखा
धैर्य न डिगा माँ का जब आई विपदा
सुख-दुख की वृष्टि के जल को सोखा
आर्द्रता से संकट में साहस को सींचा
आत्मबल से सीता जी ने संग्राम जीता
संस्कार के अलंकार धारण करती माँ।
बाल मन के भोलेपन ने क्या समझा ?
माँ के स्वरुप की छवि को कैसे आंका..
भूमिजा सीता का मन उदार धरती जैसा
प्रफुल्ल प्रकृति ने भाव अभिव्यक्त किया
कोमल कुसुम कली श्रृंगार धानी ओढ़ना
पुष्पों की वेणी गूंथ कर की केश सज्जा
नयनों में उमङती सरस्वती और यमुना
वाणी में मधुर कल-कल जल प्रपात बहता
वरद हस्त संकट, विषाद , क्लेश हर लेता
जङमति होवे सुमति, चरणों में शीश नवा
रघुनंदन राम की शक्ति परम पुनीता सिया
राघव की भक्ति में लीन सदा समर्पित सीता
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माँ जानकी छवि अंतरजाल से आभार सहित
रविवार, 1 फ़रवरी 2026
लौट आना गौरैया का
आ रही थी बहुत याद गौरैया की,
दिन भर आसपास चहचहाने की ।
चुगती थी दाना, तुलसी की मंजरी,
मिट्टी के बरतन से पीती थी पानी ।
छपाक-छपाक खेलती, नहाती थी,
पास जाओ तो फुर्र उङ जाती थी ,
फिर भी वो मेरी पक्की सहेली थी !
मेरी दिनचर्या के नेपथ्य में रहती थी,
उस पर हमेशा मेरी निगाह रहती थी ।
व्यस्त जीवन में राहत की घङी थी,
सूनेपन में चहकती सुनहरी स्मृति..
फिर घर आना गौरैया का थम गया ..
इसलिए जब सुना आज चहचहाना,
लगा लौट आया दोबारा कोई अपना ।
वो अपना जिसका होना ही बहुत था ।
गर्दन घुमा चतुर्दिक देखना संवाद था ।
क्यारी में, गमले पर, तारों पर झूलना,
छज्जे से उङ कर खिङकी पर आना,
बाहर से झाँक कर मुआयना करना ,
फिर चहकने लगना ..आश्वस्त करता ।
मुझसे तुम्हारा रिश्ता दखल नहीं देता,
लेकिन लगता है जैसे तुमने ही समझा ।
मेरे मन का मंगल गीत हो तुम गौरैया,
जहाँ भी जाओ लौट कर आना गौरैया ।
शनिवार, 24 जनवरी 2026
सरस्वती पूजा
बचपन में कहती थी नानी
सरस्वती पूजा की कहानी
पीले वस्त्र पीले फूलों की,
पीले नैवेद्य की पीली थाली
पर देवी जिनकी पूजा होती
पहनें श्वेत रंग की ही साङी
सफ़ेद हँस की उनकी सवारी
पय समान और शुभ्र हिम सी
माँ शारदे की छवि उजियारी ..
खेतों में पीली सरसों जो फूली
हरी-भरी डाली पर फूल बेशुमार !
हो गई वसंत आगमन की मुनादी
बही बसंती पवन बाँध पग में नूपुर !
गेंदे की लङियों से सजावट सारी
धूप और पुष्पों की सुगंध सुवासित !
समस्त कला-कौशल की अधिष्ठात्री
माँ शारदा की वंदना करते पंक्तिबद्ध..
संगीत वाद्य वृंद ने झंकृत किए तार
मृदुल सुरों ने अर्पित की मधुर रागिनी
सुर स्तुति सुन मुसकाई वीणापाणि
माँ के नयन ज्यों गहरी नदिया में नैया
माँ की दृष्टि, सृष्टि तरणी की खेवैया ।
माँ की नासिका पर कौंधे हीरे की कनी
मुख से फूल झरे हरसिंगार से शब्दिता ।
कंठ में पहने देवनागरी की वर्णमाला
सुगंधित सतरंगी कुसुम कली मुक्ता मणि
कर में धारण कर कमल और जपमाला,
करकमल में कलम से लिखी स्नेह पाती
चित्रकला, नृत्य, नाट्य की वरद हस्तमुद्रा ।
अभिव्यक्ति सरल, सहज , सत्यनिष्ठ हो ।
विद्या से ज्ञान , विनय, विवेक जाग्रत हो ।
प्रकृति के विविध रुपहले चित्र अंकित हों ।
ह्रदय के स्पंदन में इंद्रधनुषी तरंग हो ।
मौन मुखर, वाणी ओजस्वी, मधुर बैन हों ।
कल्पना की अल्पना रचना मनमोहक हो ।
शब्द अलंकार ,भाव की शुभ प्रतिध्वनि हों ।
जीवन में रस उपजे ऐसा तुम सृजन करो ।
जङता का तम हरो, सुमति और संवेदना दो ।
रविवार, 18 जनवरी 2026
मौन की भाषा
मौन एक भाषा है
समस्त सृष्टि के मध्य
सहज संवाद की ।
सूर्योदय मौन ,
चंद्रोदय मौन ..
दिवस रात्रि मौन..
फूलों का खिलना मौन ।
शब्द मौन..संवेदना मौन ।
मन जुङने की पुलक मौन ।
मौन भीगे नयनों की भाषा ।
मौन ह्वदय की अभिलाषा ।
मौन रह कर सुना जाता है,
जो रह गया था अनसुना ।
मौन बुनता है शब्दलोक
मौन रचता है बूँद-बूँद संगीत ।
मौन करता है सृजन।
विवेचना जीवन की ।
मौन गढ़ता है स्मृति ।
मौन सुनाता है इतिहास ।
मौन लिखता है किताब ।
सोख लेता अश्रु का सैलाब ।
मौन बदलता है दृष्टिकोण।
देखने देता है दूसरा पक्ष ।
यज्ञ की समिधा है मौन ।
मौन गहरे पैठ पा जाता है मर्म।
मौन है गहरे कूप का जल ।
मन प्रांत कर देता शीतल ।
मौन का आकाश है स्वतंत्र।
मौन की व्याख्या है मौन ।
मौन आत्म विश्लेषण
दिखाता है दर्पण ..
मौन जगाता शक्ति,
दृढ़ करता मनोबल,
सुलझाता उलझे तार ।
बहुधा मौन बन कर खेवैया
किनारे लगा देता है नैया ।
बुधवार, 14 जनवरी 2026
धूप की मचान पर ठिठकी पतंग
धीमे-धीमे पतंग
उठ रही है ऊपर,
ऊँची आसमान में ।
उङती जा रही है,
आगे बढ़ रही है,
रास्ता बनाते हुए
सूर्य दीप बालने ।
नभ को छूते हुए
बादलों से बातें ,
किरणों की पाँतें
करती अभिनंदन।
लगभग अदृष्य डोर
बँधी है उनके हाथों से,
जो हुनरमंद क़ायदे से
खूब उङाते हैं पतंग ..
जिनकी जिजीविषा
लाँघ लक्ष्मण रेखा,
उङ चली है रचने
स्वतंत्र परंपरा नई,
आकाश नापने की ।
जब तक पतंग
कटती नहीं,
लूटी नहीं जाती ।
एक बार कट गई
तो जो लूटे उसकी !
पर.. किस काम की ?
डोर हो हाथों में
किसी के भी,
बनी है पतंग
उङने के लिए ही ।
पर पतंग के काग़ज़ की
रंग और बनावट की
बात है कुछ ऐसी !
बिजली के तार से,
पेङों की डाल से
झूलती हुई ,
छज्जों पर अटकी
रंग-बिरंगी ,
छू लेती हैं दिल को..
दीवाने पतंग के
पतंगें सहेजते,
चिपका कर देखते,
और ना उङे तो
दुछत्ती के बक्से में,
यादों की अल्बम में
रखे रहते समेट कर ।
स्मृतियों की कतरनें भी
कर देतीं मरहम पट्टी ।
किसी दिन फिर कभी
उङेगी पतंग कहीं !
आकाश के चंदोबे पे
सलमा-सितारों सी !
हवा में तैरती मलंग सी,
नीली नदी में गोते लगाती,
इठलाती, बल खाती,
उचक कर ठहर जाती
धूप की मचान पर !
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छवि : अंतरजाल / ए आय / पिकबेस्ट से आभार सहित
शुक्रवार, 9 जनवरी 2026
हरफ़नमौला हिन्दी
थोङी-बहुत सभी
समझते हैं हिन्दी,
भाषा में ढल जाती
कई लहजे अपनाती ।
हर भाषा की अपनी
पहचान है अनोखी ।
पर अलबेली हिन्दी
बनी सब की सहेली ।
बारहखङी वंदनवार सी,
चौवालीस मनकों की
वर्णमाला वनमाला सी,
राजभाषा भारत की ।
संरचना सहज भाषा की
अल्पना ग्यारह स्वरों की
और तैंतीस व्यञ्जनों की
देववाणी संस्कृत से जन्मी ।
कहलाई फिर भी हिन्दी
फारसी द्वारा नामित हुई।
अन्य भाषाओं से जुङी
शब्दावली समृद्ध हुई !
लिपि देवनागरी सिद्ध हुई
वैज्ञानिक कसौटी पे खरी,
जग को शब्दों से जोङती
सबसे सहज जुङी है हिन्दी ।
शुक्रवार, 2 जनवरी 2026
मंदिर के कपाट
नवागन्तुक समय प्रतीक्षारत देहली पार
देहली के भीतर रच-बस गया है अतीत
बीते कल की नब्ज़ थाम करना स्वागत
चुनौतियाँ मिलेंगी करते ही चौखट पार
खुलते ही द्वार होता संभावना का जन्म
हवा-पानी,गंध,धूप और धूल का पदार्पण
ठोक-पीट सिखाता जीवन का शिष्टाचार
अनुभव और अनुभूति के सहज नेगाचार
मन की वीथियों के छूटें जब द्वंद और फंद
तब खुलते हैं स्वत: सानंद मंदिर के कपाट
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कोलम कलाकार : श्री करन पति
गुरुवार, 1 जनवरी 2026
समय के साथ चल
समय लेता है करवट हर बरस
जैसे मुट्ठी से रेत जाए फिसल
हर बीता पल समय का स्पंदन
लहर-लहर बहता नदी का जल
घूम-फिर कर फिर लौटेगा कल
क्षितिज तक नाव अपनी ले चल
आगे न पीछे समय के साथ चल
अपने बल पर मुकाम हासिल कर
शनिवार, 15 नवंबर 2025
पेंसिल
बच्चे किताबें पढ़ें,अच्छी किताबें गुनें,नई-नई बातें सीखें।कल्पना के पर तोलें,सारा आकाश नापें,नभ से धरती को देखें ।खेलें-कूदें, चोट से न डरें,अनुभव गुणा-भाग करें,मिल कर सवाल हल करें ।इस छोटी-सी दुनिया मेंबङे जिगर वाले ख़्वाब देखेंहौसले बुलंद करें बङों के..पहाङ,नदी, वृक्ष की छाँव बनें..जिस धुरी पर टिकी है पृथ्वीउसी पेंसिल के भरोसे है दुनिया ।
शुक्रवार, 7 नवंबर 2025
उन बातों का क्या ?
उन बातों का क्या ?
जो तुमने कहनी चाहीं,
जो हमने सुननी चाहीं,
पर ऐसा हो ना पाया ।
क्या शब्दों में ही
बात कही जा सकती है ?
अभिव्यक्ति का और कोई
माध्यम नहीं है ?
सुना है मौन की भी
भाषा होती है ।
बिना कुछ कहे भी
भावना व्यक्त होती है ।
सृष्टि का प्रत्येक कण
हर पल कुछ बोलता है ।
अस्तित्व में होना ही
उसका मुखर होना है ।
ऐसी भी आती है घङी
ईश सम्मुख होता है,
मन में होती है प्रार्थना
मुरली वाला सुनता है ।
मोहन मन में बसता है ।
छल से भीतर आता है ।
माखनचोर कहलाता है ।
चित्त चुरा के ले जाता है ।


