गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

भक्त वत्सल भगवान


नख पर गिरि गोवर्धन उठा लिया ।

नख से ही हिरण्यकशिपु को तारा ।

ना नर, ना मानव, नृसिंह रुप धरा ।


विराट चट्टान सा खंबे से प्रगट हुआ।

रौद्र स्वरुप ने जग का ह्रदय कंपाया,

प्रह्लाद ने पर करुणामय दर्शन पाया ।


ना दिन था ना रात जब काल आया

न्याय का ऐसा समय हरि ने ठहराया

दिवस रात्रि मध्य संधिकाल आया ।


इस घङी प्रभु आ विराजे देहरी पर ,

दानवराज अर्जित वर का रख मान ,

श्री नर हरि ने किया उसका उद्धार ।


क्षितिज पर मिलते हैं समय के दो छोर

असंभव को संभव कर हे लीलाधर !

निज भक्त प्रह्लाद को दिया करावलंबन ।

 

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चित्र साभार : अंतरजाल 

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