नख पर गिरि गोवर्धन उठा लिया ।
नख से ही हिरण्यकशिपु को तारा ।
ना नर, ना मानव, नृसिंह रुप धरा ।
विराट चट्टान सा खंबे से प्रगट हुआ।
रौद्र स्वरुप ने जग का ह्रदय कंपाया,
प्रह्लाद ने पर करुणामय दर्शन पाया ।
ना दिन था ना रात जब काल आया
न्याय का ऐसा समय हरि ने ठहराया
दिवस रात्रि मध्य संधिकाल आया ।
इस घङी प्रभु आ विराजे देहरी पर ,
दानवराज अर्जित वर का रख मान ,
श्री नर हरि ने किया उसका उद्धार ।
क्षितिज पर मिलते हैं समय के दो छोर
असंभव को संभव कर हे लीलाधर !
निज भक्त प्रह्लाद को दिया करावलंबन ।
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चित्र साभार : अंतरजाल
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