बरस दर बरस गाँठ बाँध ली हर वो बातजो थी सहज, सरस, ह्वदय के निकट,या इसके विपरीत छीन ले गई सब सुख-चैन,और कर गई हठात, मर्म पर कुठाराघात ।करने बैठे एक दिन जो हिसाब-किताब ,एक-एक कर खोली गाँठ तो समझे विज्ञान ।बाँसुरी के छिद्रों में समाई श्वास से उपजे संगीत,चाखो जब गन्ने की गाँठों के बीच भरा रस,तब जानो गाँठ-गाँठ में हो रहा रस का सृजन ।कुछ गाँठें होंगी नीरस, लेखा-जोखा सपाट ।पर गाँठ बाँधी बात आङे वक्त में आती काम ।पल्ले में जैसे गाँठ बाँध अम्मा रखती थीं याद,बाहर जाने पर दो-चार रुपैया रखती थीं साथ,या गुपचुप माँगती रहती थीं मन्नत, मन ही मन ।गठरी में मार के गाँठ सुख-दुख समेटते रहना।यात्रा में साथ रखते हैं ज़रुर.. जैसे चना-चबैनावैसे ही लाज़िमी है,सीख की गिरह बाँधते रहना ।
गुरुवार, 18 जून 2026
गाँठ बाँध ली बात
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