गुरुवार, 18 जून 2026

गाँठ बाँध ली बात



बरस दर बरस गाँठ बाँध ली हर वो बात
जो थी सहज, सरस, ह्वदय के निकट,
या इसके विपरीत छीन ले गई सब सुख-चैन,
और कर गई हठात, मर्म पर कुठाराघात ।
करने बैठे एक दिन जो हिसाब-किताब ,
एक-एक कर खोली गाँठ तो समझे विज्ञान ।
बाँसुरी के छिद्रों में समाई श्वास से उपजे संगीत,
चाखो जब गन्ने की गाँठों के बीच भरा रस,
तब जानो गाँठ-गाँठ में हो रहा रस का सृजन ।
कुछ गाँठें होंगी नीरस, लेखा-जोखा सपाट ।
पर गाँठ बाँधी बात आङे वक्त में आती काम ।
पल्ले में जैसे गाँठ बाँध अम्मा रखती थीं याद,
बाहर जाने पर दो-चार रुपैया रखती थीं साथ,
या गुपचुप माँगती रहती थीं मन्नत, मन ही मन ।
गठरी में मार के गाँठ सुख-दुख समेटते रहना।
यात्रा में साथ रखते हैं ज़रुर.. जैसे चना-चबैना 
वैसे ही लाज़िमी है,सीख की गिरह बाँधते रहना ।


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