गुरुवार, 11 जून 2026

गुलमोहर खिल रहे हैं


बाहर मौसम तप रहा है ।

भीतर आलस्य पक रहा है ।

अवसाद पनप रहा है ।

शिकायतों से पन्ने भर रहा है ।

हताशा का बादल घुमङ रहा है ।

पर पसीना बरस रहा है ।

घर उबल रहा है ।

सौ-सौ उलाहने दे रहा है ।

हिलना-डुलना डस रहा है !


बस करो भैया ! बिल बढ़ रहा है !

खिङकी की संध से तनिक बाहर देखो ।

देखो बाहर क्या उत्पात हो रहा है ..

मजदूर फेंटा बाँधे मरम्मत कर रहा है ।

चिलचिलाती धूप में चीले सा सिक गया है ।

काम पर जाने वाले जूझ रहे हैं..

पर किसी तरह मोर्चा सँभाले हुए हैं ।

स्कूल से छूटे बच्चे भुन कर लाल हो गए हैं ।

लोहे के चने चबाना सीख रहे हैं । 

पर सूर्य देवता हरगिज़ न पसीज रहे हैं ।

फिर भी सारे काम बदस्तूर हो रहे हैं ।


मौसम के मिज़ाज जितने बिगङ रहे हैं ।

गुलमोहर उतने ही दहक रहे हैं ।

टूट कर खिल  रहे हैं..गीत बन गए हैं ।

क्यों न हम भी चलें रंग बटोरने के लिए !

देखो तपते हुए गुलमोहर खिल रहे हैं !

 

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