बाहर मौसम तप रहा है ।
भीतर आलस्य पक रहा है ।
अवसाद पनप रहा है ।
शिकायतों से पन्ने भर रहा है ।
हताशा का बादल घुमङ रहा है ।
पर पसीना बरस रहा है ।
घर उबल रहा है ।
सौ-सौ उलाहने दे रहा है ।
हिलना-डुलना डस रहा है !
बस करो भैया ! बिल बढ़ रहा है !
खिङकी की संध से तनिक बाहर देखो ।
देखो बाहर क्या उत्पात हो रहा है ..
मजदूर फेंटा बाँधे मरम्मत कर रहा है ।
चिलचिलाती धूप में चीले सा सिक गया है ।
काम पर जाने वाले जूझ रहे हैं..
पर किसी तरह मोर्चा सँभाले हुए हैं ।
स्कूल से छूटे बच्चे भुन कर लाल हो गए हैं ।
लोहे के चने चबाना सीख रहे हैं ।
पर सूर्य देवता हरगिज़ न पसीज रहे हैं ।
फिर भी सारे काम बदस्तूर हो रहे हैं ।
मौसम के मिज़ाज जितने बिगङ रहे हैं ।
गुलमोहर उतने ही दहक रहे हैं ।
टूट कर खिल रहे हैं..गीत बन गए हैं ।
क्यों न हम भी चलें रंग बटोरने के लिए !
देखो तपते हुए गुलमोहर खिल रहे हैं !
सही है, जितना भयभीत होंगे मौसम डरायेगा, सामना करो तो वही संग मुस्कुरायेगा
जवाब देंहटाएंवाह ! क्या बात कही है ! आपका आभार।
हटाएंयह रचना सोमवार को आएगी
जवाब देंहटाएंवंदन
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 15 जून, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छा लिखा है आपने नूपुर जी। और अनिता जी की टिप्पणी भी सार्थक है।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंवाह!! सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंयही तो जीवन है
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना
स्कूल से छूटे बच्चे भुन कर लाल हो गए हैं ।
जवाब देंहटाएंलोहे के चने चबाना सीख रहे हैं ।
पर सूर्य देवता हरगिज़ न पसीज रहे हैं ।
फिर भी सारे काम बदस्तूर हो रहे
हैं ।
.बहुत सटीक ...सही कहा ...गर्मी बहुत ज्यादा ही पड़ रही है..।
गर्मी पर बहुत ही सुन्दर रचना ।