सूरज की रोशनी औरपरछाइयों के बीच कहींज़िंदगी ने जगह बनाई ।धूप-छाँव की जुगलबंदीवक्त की तर्ज पर रची गईज़हन में पहरों गूँजती रही,जोङती गई यादें पाई पाई ।अलगनी पर दिन भर टँगीधूप सेंकती रही कमीज़जेब में रखी छाँह कमाईरात भर चैन की नींद आई ।भोर उजियारी चुनौती लाईआँचल में तारे भर ले आईतारों को बो कर धूप उगाईछाँव बिन धूप रास न आई ।सूरज की रोशनी औरपरछाइयों के बीच कहींज़िंदगी ने जगह बनाई ।
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