रविवार, 5 जुलाई 2026

धूप ने छाँह कमाई

सूरज की रोशनी और
परछाइयों के बीच कहीं
ज़िंदगी ने जगह बनाई ।

धूप-छाँव की जुगलबंदी
वक्त की तर्ज पर रची गई 
ज़हन में पहरों गूँजती रही,
जोङती गई यादें पाई पाई ।

अलगनी पर दिन भर टँगी 
धूप सेंकती रही कमीज़
जेब में रखी छाँह कमाई 
रात भर चैन की नींद आई ।

भोर उजियारी चुनौती लाई 
आँचल में तारे भर ले आई
तारों को बो कर धूप उगाई 
छाँव बिन धूप रास न आई ।

सूरज की रोशनी और
परछाइयों के बीच कहीं
ज़िंदगी ने जगह बनाई ।


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