सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

नट का नाच



हँसी आ गई
देख कर
बिजली के तार पर
नट की तरह
सूरज दादा को
संतुलन बनाते हुए !

इंसान की
क्या बिसात !
बड़े-बड़ों को
झंझटों में फंस कर
झूलते तारों में
उलझ कर
डगमगाते देखा ।

घटनाक्रम और
कालचक्र के पेंच ने
दुर्दांत टेढ़ों को
सीधा कर दिया ।
समय की
डुगडुगी बजा कर
चुटकी बजाते
सिखा दिया
नट का नाच ।

जब विकल्प ना हो
और गिरना ना हो
तो आ ही जाता है
इकहरी रस्सी पर
नट की तरह
दम साध कर
संभल कर चलना ।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

घुलने दो रंग



दिल और दिमाग़ की
खिड़कियां खुली रखना ।
ताज़ा हवा आने देना ।

ज़रूरी नहीं हमेशा
हम जो सोचते हों,
वही सही हो ।

सामने वाले की
नज़र से सोचना भी,
कभी कभी
होता है अच्छा ।

रंग कोई भी
हो जाता है दूना,
जब उसमें घुलने दो
कोई रंग दूसरा ।



चित्र साभार - सुवीर शांडिल्य 

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

कैलेंडर


सुबह से ही गहरे बादल घिरे हुए थे. सायली झटपट काम निबटा कर जल्दी घर जाना चाहती थी. इधर कुछ दिनों से झुटपुटा होने से पहले घर पहुँचने की कोशिश रहती थी उसकी. उसकी खोली तक पहुँचने के रास्ते में एक चाय की टपरी पर.. मरे कुछ आदमी आकर बैठने लगे थे एक दो महीने से ! बेहुदे कहीं के ! फालतू गाने गाना ! खी-खी हँसना घूरते हुए !

चाय वाला काका आँखों के इशारे से ही टपरी तक आने को मना कर देता था. संझा को लौटते हुए ख़ुद ही बिस्कुट जैसा छोटा-मोटा सामान दे जाता था. कहता था, "दूर ही रहना बिटिया. ये बेशरम मुझे कुछ ठीक नहीं लगते. औरतों के बारे में बेकार बातें करते हैं." 
उस दिन सामान दे कर पैसे लिए और जाते-जाते ठिठक गया. हिचकिचाते हुए माई को देख कर बोला,"मोबाइल में शायद भद्दी चीज़ें देखते हैं. अच्छा नहीं लगता. पर मुस्टंडों से क्या कहूँ ? अभी कुछ ऐसा किया भी नहीं है बीबी. किस बात पर टोकूं ? मेरे साथ वाला कहता है ..आजकल सब देखते हैं. कोई गुनाह थोड़े है...पता नहीं. पर मेरा जी घबराता है. अभी तक कुछ ना हुआ..पर भगवान ना करे ..कुछ हो जाए तो ? संभल के रहना." काका ने जो खुटका बैठा दिया मन में, तो घर से निकलने से लेकर वापिस लौटने तक मन में बेचैनी बनी रहती.
ये सब सोचते-सोचते सायली के हाथ फुर्ती से चल रहे थे. तभी अचानक तूफ़ान-सा आ गया. खिड़की-दरवाज़े खड़कने लगे जोर-जोर से.. इतनी तेज़ हवा चलने लगी. 
दीदी ने कमरे से ही आवाज़ दी,"सायली, बाहर से कपड़े उठा लेना. बारिश आएगी लगता है. सब भीग जाएंगे."
सायली ने जवाब दिया,"हाँ,दीदी. उठती हूँ." भाग कर कपड़े उठा कर लाई और तखत पर धर दिए.
एकाएक उसकी नज़र दीवार पर पड़ी तो देखा, एक बहुत बड़ा कैलेंडर टंगा था जो पहले तो नहीं था. कैलेंडर में बहुत बड़ा चित्र था दुर्गा पूजा का. बहुत सुंदर. एकटक देखती रह गई सायली. तभी दीदी गुड़िया को संभालती हुई बाहर आ गई.
सायली को कैलेंडर निहारते देखा तो मुस्कुरा के बोली,"क्यों ? तुझे बहुत पसंद आया क्या कैलेंडर सायली ?"
सायली चौंक गई. बोली,"हाँ, दीदी कितना सुन्दर है ना ? और इतना बड़ा ! सच्ची के जैसा ! इसलिए मैं देखते ही रह गई !"
दीदी हँस कर बोली," हाँ, है तो बहुत सुन्दर. हर महीने का एक चित्र है. अच्छे-मोटे कागज़ का है तो भारी भी बहुत है. हम तो लगाने से रहे. तुझे चाहिए तो ले जा."
सायली,"अरे नहीं नहीं दीदी ! मैं तो बस देख रही थी. हमारी खोली भी तो छोटी-सी है."
दीदी बोली,"ले जा घर एक बार.नहीं जमे तो वापिस ले आना. किसी और को दे देंगे. ले जा."
इतना कहने पर सायली ने कैलेंडर उतार कर रख लिया अपने पास. फिर बाकी बचा काम ख़त्म कर निकल पड़ी.
इतनी ही देर में बादल ज़ोर से बरस कर चलता बना था. अँधेरा-सा तो हो गया था पर अच्छा हुआ कि बारिश बंद हो गई थी. उसने जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाये. चाय की टपरी की बगल से दबे पाँव निकल जाना चाहती थी कि देखा टपरी तो बंद पड़ी है. ऐसा कैसे ? पर खैर ...सायली ने चैन की सांस ली. टपरी की रौशनी नहीं थी तो मोहल्ले का वो कोना अँधेरा-सा हो गया था. सायली ने सोचा..जल्दी से निकल जाऊँ ...तभी दबी आवाज़ में हँसने की आवाज़ ने उसको चौकन्ना कर दिया. वो एक आड़ में हो गई और बिना हिले-डुले सुनने की कोशिश करने लगी. आदमियों की आवाज़ थी. फुसफुसा कर कुछ कह रहे थे. और हंसी तो रुक ही नहीं रही थी.
"अरे यार ! रोज़-रोज़ मोबाइल देख कर पक गया था ! लाइव माल का मज्जा ही मस्त है !"
"लाइव माल ? कैसे ? घर वालों को मालूम नई पड़ेगा ? और पैसा ? उसका क्या ?"
"वोई तो यार ! इधर टपरी पर गाना गाने ..घूरने से कोई बोल नहीं सकता. पर..."
"अरे छोड़ ना यार ! इधर भी कोई कुछ नई बोल सकता."
"ऐसा क्या ? बता-बता !"
"अरे वो लास्ट में खोली के पीछे बाजू ख़ाली जगह है ना ..भंगार पड़े रहता है जिधर. उधर दीवार नई क्या ? बस वो दीवार पे चढ़ा था बच्चा लोग का गेंद लाने को. अरे रात में नई खेलते क्या उधर ?"
"हाँ तो ?"
"अरे उधर ही देखा ! क्या नज्जारा ! उधर सबका घर का खिड़की ! टूटा-फूटा तो रहता ही है ! रात को लाइट जलाये तो फुल वीडियो !"
सबका ठहाका ...
और सायली सुन्न पड़ गई थी. पसीने से तर-बतर. फिर से ठहाका लगा तो होश आया.
"ए चल रे ! अभी चल ! ट्रेलर ! क्या ?"
ठहाका ...
सायली पूरा दम लगा कर भागी और घर जा कर ही रुकी. हाँफते-हाँफते खोली में घुसी और धम से बैठ गई. सर घूम रहा था.
अचानक वो उठी और पूरी खोली को टटोल-टटोल कर देखने लगी, कहीं फांक तो नहीं ! खिड़की तो ठीक है. रोशनदान ? हाय राम ! कितने दिनों से सोच रही थी...तभी दीदी के दिए कैलेंडर पर ध्यान गया. अगर ये उधर टांग दें तो ? उसके ऊपर एक खूँटी भी है. फटाफट कुर्सी सरका कर ,उस पर चढ़ कर सायली ने कैलेंडर टांगा और उतर कर पंखा फुल स्पीड कर दिया. देखने लगी कहीं कैलेंडर फड़फड़ा कर गिर ना जाए..पर इतना बड़ा और भारी कैलेंडर दीवार की तरह दीवार से चिपक गया था.
सायली दीवार की तरह ढह गई और ज़मीन पर बैठी-बैठी दुर्गा पूजा का चित्र एकटक देखने लगी और उसका सारा डर और गुस्सा पिघल कर आँखों से बहने लगा.
"वाह री सायली ! इत्ता सुन्दर कैलेंडर कहाँ से लाई ? और लगा भी दिया. अच्छा है रे ! पेंटिंग जैसा !"
माई कब आ कर पीछे खड़ी हो गई थी,पता ही नहीं चला सायली को.
"है ना माई ? सबके घर में एक ऐसा ही कैलेंडर होना चाहिए. और उसे पता होना चाहिए कि कहाँ लगाना चाहिए."
"बिलकुल ठीक बोली सायली. फटा कपड़ा के लिए रफ़ू और टूटी-फूटी दीवार को ढांपने वास्ते कैलेंडर !

मंगलवार, 24 सितंबर 2019

ढीठ


रोज़ जिस बस स्टॉप से
बस मिलती है मुझे
ठीक उसके सामने
लाल ईंट की बनी
एक टूटी दीवार है ।

इस रास्ते पर वैसे
कई पेड़ हैं हरे-भरे
पर इस दीवार को जैसे
छोड़ कर आगे बढ़ गए हैं ।
ये बस एक दीवार है,
जिस पर इश्तहार भी
नहीं चिपकाए जाते ।

सूनी दोपहर में अकेले
खाली बस स्टॉप पर बैठे
कई दफ़ा इस दीवार से
कह डाले अपने गिले-शिकवे ।
क्योंकि अब आदमी लोग
दुखड़े नहीं सुनते ।
वक़्त बर्बाद नहीं करते ..
कामकाजी ठहरे,
झटपट आगे बढ़ जाते हैं ।
अगला स्टॉप आने से पहले ।

और ये तो ईंट की दीवार है ।
उजाड़ और बेरोज़गार है ।
मवाली कौवे तक पास नहीं फटकते !
ढीठ बन कर फिर भी खड़ी है ।
भग्न हृदय जैसे हार नहीं मानते ।

बहरहाल इसी तरह बरसों गुज़र गए
हम अभ्यस्त हो गए थे एक-दूसरे के
शायद एक दूसरे की दरारों के ।

फिर एक दिन बस का इंतज़ार करते
दीवार पर नज़र गई तो देखा अरे !
बीचों-बीच दीवार में पड़ी दरार से
फूटी थी हरी कोपल अपने ही रंग में !
मानो पत्थर का कलेजा चीर के !

दीवार भी थी बड़े ही असमंजस में !
टूट गई थी मरम्मत की आस करते-करते ।
अचानक कुछ बदल गया था आबोहवा में ।
उम्मीद जाग गए थी कोपल के उगने से ।
हो सकता है नव पल्लव घना वृक्ष बन जाये ।
छाँव मिले तो कोई टेक लगा कर बैठ जाये ।

अब दीवार से बातें करो तो चहकती है ।
मेरे मन में भी ज़िंदादिली करवट बदलती है ।



शनिवार, 14 सितंबर 2019

अपनी लगती है हिंदी



हिंदी
भाषा नहीं
नदी है,
जो अविरल
बहती है,
गंगा यमुना
कावेरी गोदावरी
चेनाब रावी
ब्रह्मपुत्र की तरह
देश भर की
यात्रा करती हुई,
हर तट से
गले मिलती,
सुख-दुख बटोरती,
लोक संस्कृति
और बोली
समेटती हुई,
बहती ही जाती है ।


यह भाषा ऐसी है ।
सबको अपनाती है ।
अपनी लगती है ।

जैसे नदियां जोड़ती हैं,
सारे देश की कड़ी
स्नायुतंत्र की भांति,
धमनियों में हृदय की
धड़कती है हिंदी ।

बुधवार, 11 सितंबर 2019

इच्छाशक्ति



मेघों से आच्छादित आकाश में 
जब अनायास खिलता है इंद्रधनुष
जल की बूंदों से छन कर आती
सूर्य रश्मि के प्रखर तेज को ही
कहते हैं इच्छाशक्ति ।


दुख से जकड़े घोर अंधकार में
जब सब हो जाता छिन्न-भिन्न
हारा मन होता टूक-टूक हो मूक
आस का दीप बने जीवट को ही
कहते हैं इच्छाशक्ति ।


दुर्घटना की असह्य विडंबना में
श्वास जब बूंद भर तन में रह जाए
तब झंझावत में डटी अडिग लौ सम
प्राण जगाने वाले मनोबल को ही
कहते हैं इच्छाशक्ति ।


बुधवार, 4 सितंबर 2019

वंदनवार



एक दिन अकस्मात
झर गए यदि सब पात 
ऐसा आये प्रचंड झंझावात.. 

ना जाने क्या होगा तब ?
सोच कर ह्रदय होता कम्पित।

सुखी टहनियों पर कौन गाता गीत ?
सूने ठूंठ पर कौन बनाता नीड़ ?
रीते वृक्ष का कोई क्यों हो मीत ?

क्या कभी हो पायेगा संभव ऐसा ?
ठूंठ की जड़ में जाग्रत हो चेतना।
प्राण का संचार हो शाखाओं में ऐसा
लौट आये बेरंग डालियों पर हरीतिमा।

कोई पंछी राह भूले पथिक सा 
संध्या समय आन बैठे विस्मित सा।  
अनायास ही छेड़ दे कोई राग ऐसा 
धूप और वर्षा की बूंदों के शगुन का। 
दृढ विश्वास के नव पल्लवों की हो ऐसी छटा 
पात-पात शोभित हो वन्दनवार सरीखा। 


रविवार, 1 सितंबर 2019

बप्पा इस बार जब तुम आना


 प्यारे बप्पा,
आख़िर आ ही गया 
समय का चक्र 
घूम कर उस पर्व पर 
जब तुम आते हो,
घर-घर में करते हो
निवास। 

वास करते हो  .. 

या व्रत रखते हो 
दस दिन का ?
भक्त का 
मंगल करने को ?

जो भी हो  .. 

तुम आते हो। 
हर घर पावन कर जाते हो। 
अशुभ को शुभ कर जाते हो। 
जब तक तुम हो। 
विघ्न हर ले जाते हो,
जब जाते हो। 

जब तक तुम हो। 

विग्रह में उपस्थित हो। 
वरद हस्त रखते हो,
हमारे शीश पर.. 
हमारे चिंतन पर 
अंकुश रखते हो। 
फिर क्या होता है ?  

क्या होता है ?

तुम्हारी विग्रह के 
विसर्जन पश्चात् ?

कहाँ चले जाते हो 

विसर्जन के बाद ?
क्या सचमुच हमें छोड़ कर 
विदा हो जाते हो ?
या प्रतिमा के 
विसर्जन के बाद, 
बस जाते हो 
उनके अंतर्मन में तत्पश्चात, 
जिनके चित्त में होता है वास 
मंगल कामना का, 
सद्भावना का ?

सच में क्या तुम 

बस जाते हो 
अस्त्र,शस्त्र,उपकरण,
और हमारी चेष्टा में,
चेतना में, 
मंगल बन कर ?

यदि ऐसा है तो 

किसान के हल में,
लोहार के हथौड़े में,
कुम्हार के चाक में,
चित्रकार की तुलिका में,
शिल्पकार की छेनी में,
अध्यापक के आचरण में 
हो सदा तुम्हारा वास। 

और एक बात। 

सबसे बड़ी बात। 
महर्षि वेद व्यास की रचना 
महाभारत का लेखन 
आपने ही किया था ना ?
क्योंकि प्रत्येक श्लोक 
आत्मसात कर लिखना था,
इसीलिए शब्दों के प्रवाह, 
नियति के आरोह अवरोह,
हर प्रसंग की विवेचना में 
जन जन का मंगल निहित था। 

तो बप्पा क्यों ना इस बार 

विग्रह विसर्जन उपरान्त 
मुझे दो ऐसा ही वरदान ?

महाभारत सामान नियति का,

हर प्रसंग तुम चुनना जीवन का। 
पर जब समय हो भावार्थ करने का, 
तब तुम मेरी कलम पकड़ कर 
लिखना सिखा देना बप्पा। 
सिखा देना लोकहित में
भावानुवाद करना। 

सुन्दर लिखना। 

उससे भी सुन्दर जीवन जीना। 

शनिवार, 31 अगस्त 2019

टिकुली की माला


पीला गेंदा, नारंगी गेंदा, मोगरा, रजनीगंधा, हरसिंगार, बेला, जूही और ये गुलाब !
टिकुली फूली नहीं समा रही थी ! सात साल की इस नन्ही परी  के हाथों में फूलों से भरी टोकरी नहीं, फूलों की घाटी ही सिमट आई थी !

वसंत पंचमी की मीठी बयार ने टिकुली को सुबह-सुबह टपली मार के जगा दिया था.सरस्वती पूजा के दिन फूलों की अल्पना बनाने और माला पिरोने का काम टिकुली को बहुत भाता था. अल्पना पूरी हो गई थी. अब माला पिरोने की बारी थी. बड़े मनोयोग से टिकुली काम में जुट गई. 

उधर टिकुली सुई-धागा लाने गई, टोकरी में एक-दूसरे से सट  कर बैठी फूल सखियाँ हंसी-ठिठोली करने लगीं आपस में.

बेला ने इतरा कर कहा, "मोती जैसा रूप मेरा ! है कोई मेरे जैसा ?"

रजनीगंधा ने नन्ही जूही का हाथ थामा और मंद-मंद मुस्काते हुए अपना पक्ष रखा, "अच्छा !"
"देखो जी ! रात की रानी और जूही को शायद तुमने नहीं देखा !
अजी ! बावरा कर देता है हमारी भीनी-भीनी खुशबू का झोंका ! "

चंपा-चमेली दोनों बहन सी ..दोनों ने अपनी आँखें तरेरी !
"अपनी ही अपनी कहोगी री ?
  हम भी तो किसी से कम नहीं !"

इतने में गेंदे ने अपनी कही !
"अब बस भी करो जी ! 
बहुत हुई तुम्हारी जुगलबंदी ! अब मेरी सुनो जी !
मेरी तो हर मंगल काज, हर पर्व पर होती है उपस्थिति ! अब कहो जी !"

"एक बात मैंने हमेशा देखी है। क्या तुमने भी गौर किया है ?"

सारी की सारी  चहक पड़ीं, "क्या ?"

"तुम सब बहुत सुंदर और सुगन्धित पुष्प हो. तुम्हारी तो बात ही निराली है !
पर कभी इस गुलाब पर भी नज़र डाली है ?"  .... ...... ..... ...... 

"गुलाब कहलाता तो फूलों का राजा है।  पर वो राजा, जिसके सर पर कांटों का ताज है।"  

सारे फूल मौन हो कर सोच में पड़ गए.... बात तो सही है। 
गुलाब के दामन में कांटे ही कांटे हैं। 

मोगरा भी भावुक हो पास ढुलक आया और हाथ जोड़ कर गुलाब से बोला, "वास्तव में तुम्हारी बलिहारी है ! कांटों में ही कटती सारी ज़िन्दगी तुम्हारी है। राजा की पदवी तुम्हें इसीलिए मिली है।"

सभी फूलों ने हामी भरी और शीश नवाया। यह सब सुन कर गुलाब लजाया और मुस्कुराया। बोला,"सब की अपनी नियति है। किसी को कोमल पत्तियां मिली हैं। किसी को कांटों का कवच मिला है। जितना अपनाओ जीवन उतना सरल है। हर बात के पीछे कोई कारण है। कांटे चुभते अवश्य है।  पर फिर भी मेरा रक्षा कवच हैं। जैसा समझो जीवन वैसा लगता है। यही मन और जीवन की सुन्दरता है। "

सारे फूलों ने सुगन्धित समर्थन जताया। जो कांटों में भी खुश हो कर जीता है, उसे ही गुलाब के रूप और सुगंध का वरदान मिलता है। 

सारे फूल टुकुर-टुकुर आकाश को देख रहे थे। और तभी खिलखिलाते हुए टिकुली सुई धागा लेकर माला पिरोने आ गई। 

टोकरी में झाँका तो ठिठक गई। अपलक देखती ही रह गई। फूल तो और अधिक खिल गए थे ! 
कितनी सुन्दर माला बनेगी ! माँ सरस्वती पर और भी खिलेगी !

माला में पिरोये वासंती फूल और बीच में गुलाब। टिकुली को क्या पता, इस बीच क्या हुआ था !
पर देवी सरस्वती ने सब कुछ देखा था। सारे फूल और अधिक  रूपवान हो गए थे, क्योंकि उनके मन संवेदना से जुड़ गए थे।  और टिकुली का मन था, माला का धागा। फूलों को पिरोने वाला। 

इस संसार में सबसे सुन्दर वह है , जो हर परिस्थिति में, दूसरों में भी सुन्दरता देखता है और उसे मन में पिरो लेता है। 



बुधवार, 31 जुलाई 2019

नमक का दारोगा


नमक का दारोगा  ?
अजी ऐसे किरदार, 
जो अपने ईमान पर 
चट्टान की तरह 
अडिग रहते हैं,
वो असल ज़िंदगी में 
कहाँ होते हैं ?

इतना कह कर हम 

छुटकारा पा लेते हैं। 

असल ज़िन्दगी में भी 

नमक के दारोगा होते ,
अगर हम दूसरों से नहीं 
ख़ुद से उम्मीद रखते। 

यदि हम सचमुच चाहते,  
तो दूसरों में नहीं ढूंढते  ..  
अपने भीतर ही खोजते  
नमक का दारोगा। 

अगर हमें अच्छे लगते हैं 
ईमानदार किताबों में, 
तो हम असल जिंदगी का 
उन्हें हिस्सा क्यों नहीं बनाते ? 
क्यों नहीं बन कर दिखाते वैसा 
जैसा था नमक का दारोगा। 

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

पुलक


बीज बोने के
बहुत दिनों बाद तक
सींचते-सींचते
मिट्टी को नरम रखते
आतुर नयन
ढूँढते हैं
जीवन का कोई चिन्ह ।
और तब
जब एक दिन अचानक
नम मिट्टी में
एक अंकुर
फूटते देख
जो पुलक हृदय में
हिलोर लेती है ..
उल्लास का सरोवर
बन जाती है ।
उस सरोवर को कभी
सूखने मत देना ।
उस निर्द्वंद पुलक को
भाव सरोवर में,
अनगिनत कमल बन
खिलने देना ।


रविवार, 21 जुलाई 2019

भक्ति की आभा




नीलाम्बर सा
नभ का चंदोबा,
पतंगों सी झिलमिलातीं
पताकाएं बावरी झूमती,
पीताम्बर सी फहरातीं ..
कीर्तन करती हुई
आनंद उत्सव मनातीं  
वंदना की वंदनवार। 
ह्रदय को आभास करातीं
भक्ति की आभा का ।

कोई तान हृदय से उठती
जुगल जोड़ी के चरणों में
शीश नवाती अश्रु बहाती
हो समर्पित लौ लगाती ..

दीजिये सन्मति शक्ति
धर्म पथ पर दृढ़ रहने की,
सजग आराधना की ..
और दीजिये भक्ति की
अनमोल थाती,
चरणारविन्द में शरण
पग में धारित शरणागत 
नूपुर समान ।

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

नानाजी ने दी थी


नानाजी ने दी थी
नारायण की चवन्नी ।

कहा था,
संभाल कर रखना
इसे कभी मत खोना ।

ये भी कहा था,
जब सब खो जाता है,
तब काम आती है
नारायण की चवन्नी ।

बात सच्ची निकली ।
जब किस्मत खोटी निकली
तब चवन्नी ही काम आई ..

नारायण की चवन्नी 

क्या नहीं खरीद सकती ?
चांदी-सोने की गिन्नी ?
पर मन का चैन देती
नारायण की चवन्नी ।

इस चवन्नी के बल पर
हम दुनिया से लड़ गए 

बहुत हारे, पर हारे नहीं 

हमारी मुट्ठी में जो थी,
नारायण की चवन्नी ।

अमीरी का हमारी 

ठिकाना नहीं !
ठाकुरजी के दिए 

ठाठ हैं सभी !
प्रारब्ध की कील 

गड़ती नहीं ।
विरासत में हमको

सेवा मिली ।

रसास्वादन की 
कला दी थी ..
रस में पगी 
कथा दी थी ..

नानाजी ने दी थी
नारायण की चवन्नी ।

बुधवार, 17 जुलाई 2019

नारायण की चवन्नी


जीवन को उत्सव जानो ।
कर्मठता में ढालो ।
परम उत्साह से सींचो ।
हर अनुभव से कुछ सीखो ।

विद्या का सार समझो ।
अवसर पर न चूको ।
परिश्रम करते रहो ।
हरि नाम जपते रहो ।

समस्याओं का सामना करो ।
विडंबनाओं से लोहा लो ।
गुरुदेव ने कहा,
और उतार दी नौका
भव सागर में ।

इससे पहले उन्होंने
सिर पर हाथ रखा
और हाथ में रख दी
सबसे बड़ी पूँजी
नारायण की चवन्नी ।

नारायण नारायण नारायण कहना
और केशव का ध्यान करना ।
सदा हँसते रहना
और निज कर्तव्य करते रहना ।

जीवन की हर कसौटी
पर उतरेगी खरी
यह संजीवनी बूटी,
तुम्हारी सबसे बड़ी पूँजी
नारायण की चवन्नी ।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

आषाढ़ी एकादशी का नमन




तीन गुलाब 
खिले एक साथ !
छोटे से पौधे पर !
पात-पात पर आई बहार !
चतुर्दिक छाई रौनक़ !

वर्षा हो रही थम-थम  .. 
बूंदों का जलतरंग कर्णप्रिय 
सुन कर गदगद मन मयूर 
फैला कर इंद्रधनुषी पंख 
बाँध कर बूंदों के नूपुर  
नृत्य कर रहा झूम-झूम !

मन मगन बना विशाल गगन 
तब प्रस्तुत हुआ यह प्रश्न  .. 
मुरझा जाएं ये सुमन  .. 
उससे पहले ही इनको चुन 
कैसे करूँ इनका अभिनन्दन ?
क्योंकि इनकी छटा है अनमोल !

तभी सुना वारकरी का मधुर गान
पांडुरंग हरि विट्ठल ! विट्ठल विट्ठल !
रोली से लाल स्निग्ध तीन गुलाब
किये ठाकुर सेवा में सहर्ष अर्पित 
मन का दीप बाल किया हरि का वंदन।  

  

रविवार, 7 जुलाई 2019

जलमय सजल मन




जो पूछना नहीं भूलते
कैसे हैं आपके पौधे ..
उन्हें पता है
आपकी जान बसती है
अपने पौधों में,
जैसे कहानियों में
अक्सर राजा की
जान बसती थी
हरे तोते में ।

उन्हें आभास है
जीवन की
क्षणभंगुरता का ।
इसलिए जी उनका
उत्साह से छलकता
स्वच्छ ताल गहरा..
जिसमें खिलते
अनुभूति के कमल ।
जल में सजल
जीवन का प्रति पल ।


सोमवार, 27 मई 2019

जिजीविषा और दुआ



आज 
यह फूल खिला
उस पौधे पर,
जिस पौधे की
लगभग इति
हो चुकी थी ।

पर जब
किसी ने कहा,
चमत्कारी
होती है आशा..
और सेवा,
उस भरोसे ने
पौधा फेंकने
नहीं दिया ।

दिन-रात बस
मन में मनाया
जी जाए पौधा ।

मिट्टी खाद धूप जल
और देखभाल ने
पौधे में रोप दी
जिजीविषा ।

आशा ने
औषधि का
काम कर दिखाया ।

आज सुबह देखा
ऐसा फूल खिला !
मानो किसी ने
मांगी हो दुआ ।

रविवार, 12 मई 2019

कर्णफूल


आज ही खिले
ये फूल !
सुबह-सुबह इनकी
भीनी-भीनी
सुगंध ने
हिला कर जगाया ।

उठते ही 
स्मरण हो आया..
मोती सरीखी
जो कली थी,
संभव है
खिल गई हो !

भाग कर 
खिड़की से
झांक के देखा ।
सचमुच
फूल खिले थे !

शरारत से
मुस्कुरा के
हिल-हिल के
हौले-हौले
अभिवादन
कर रहे थे ।

दिन-प्रतिदिन
कई दिनों तक
पौधे को सींचना
पालना-पोसना
जब-तब
बार-बार देखना कहीं
फूल तो नहीं खिला !

देखते रहो !
संभव है
आंखों के सामने ही
फूल खिल जाए !

जतन कर के
पाले-पोसे
पौधे पर
जब फूल खिलता है,
उसे देखने की
खुशी से बढ़ कर
कोई खुशी नहीं होती ।

हाँ जी !
आज ही खिले
मन-उपवन में
कर्णफूल से फूल !

गुरुवार, 2 मई 2019

भई ये लोकतंत्र है




भई ये लोकतंत्र है ..
वो भी संसार का सबसे बड़ा !
कोई क्या कह सकता है किसी को !
पर भाइयों और बहनों कभी तो सोचो !
हम इस लोकतंत्र में रहने लायक हैं क्या ?
लोकतंत्र में रहने के कर्तव्य हमें क्या होंगे पता !
संविधान में दिए अधिकार भी मालूम हैं क्या ?
फिर किसको देते हो किसका वास्ता ?
कैसा वास्ता ? मेरे भाई कैसा वास्ता ?
बंद करो ऊँची आवाज़ में चिल्लाना !
कुछ नहीं तो नागरिकता का ही पाठ पढ़ो !
खुद समझो और समझने में मदद करो !
केवल नारों से मत कृतार्थ करो जन मानस को !
अपने सिद्धांतों को खंगाल अब अमल करो !
नीचे उतरो मंच से, आसन छोड़ो और श्रम करो !
नेता को अपशब्द कह छाती मत ठोंको !
नेता हम जैसा है ! हमारे बीच से ही आता है ।
वह देश भक्त ना रहे तो अपदस्थ करो !
पर बाहर तो निकलो बिल से और वोट करो !
अफ़सर और नेता को समझाने से पहले
ख़ुद तो पहले ज़िम्मेदारी अपनी समझो !
जम कर आलोचना करो यदि उचित हो !
पर काम करो खुद भी और सबको करने दो !


शनिवार, 27 अप्रैल 2019

कितना नीला और गहरा



घास पर लेट कर
गुनगुनी धूप में
आकाश को देखना..
टकटकी लगा कर..

और बताना,
कितना नीला
और गहरा
दिखाई देता है..
आसमाँ.

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

किताबें सब जानती हैं

किताबें ..
झकझोरती हैं,
नींद से जगाने के लिए ।
कचोटती हैं,
ग़लतियों के लिए ।
झगड़ती हैं,
हमारे पूर्वाग्रहों से ।
चुनौती देती हैं,
अपना मुस्तकबिल
खुद गढ़ने के लिए ।
कुरेदती हैं,
दिल की दीवारों पर
जमी काई को ।
किताबों से कुछ नहीं छुपा ।
किताबों को ही चलता है पता   
चुपके से टपका आंसू,
धड़कनों की खुराफ़ात,
अनकही बात ..
किताबें सब जानती हैं ।