Saturday, 27 April 2019

कितना नीला और गहरा



घास पर लेट कर
गुनगुनी धूप में
आकाश को देखना..
टकटकी लगा कर..

और बताना,
कितना नीला
और गहरा
दिखाई देता है..
आसमाँ.

4 comments:

  1. दार्शनिक अंदाज । वैसे आज की व्यस्त जिन्दगी में ऐसी कल्पना, महज कोरी कल्पना सी लगती है। सुन्दर सपन सलोने सा।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-04-2019) को "झूठा है तेरा वादा! वादा तेरा वादा" (चर्चा अंक-3320) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. गहरा तो इतना की खुद का अस्तित्व भी सागर मेंं बूंद सा लगता है । बहुत सुन्दर सृजन ।

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कुछ अपने मन की कहते चलिए

नमस्ते