बुधवार, 20 नवंबर 2024

वोट डालें महानुभाव !


हे लोकतंत्र के उपासक !

वोट नहीं डाला ?

क्यों नहीं डाला ??


तुम कहते हो,

नकली है मतदान 

चुनाव में हेरफेर है !


मित्र, हेरफेर है अगर,

तो होना चाहिए सतर्क 

और भी अधिक !


वोट का अपने

करो सदुपयोग,

मत जाने दो व्यर्थ !


सुनो श्रीमान !

वोट का अपने

रखो मान !


राजनीति के उलटफेर

होते हैं सर्वत्र

क्या देश क्या घर !


घर छोङ देते हो क्या ?

भाग्य भरोसे ?

यदि नहीं ..तो देव जागो !


चेतना के कपाट खोलो !

अकर्मण्यता छोङो !

अवसरवादी ही बन लो !


हे कुंभकर्ण ! आंखें खोलो !

वोट देकर भविष्य चुनो !

पूरे हक़ से हालात बदलो !



गुरुवार, 14 नवंबर 2024

बचपन


बचपन याद आता है बहुत 

जब जीवन था सहज-सरल ।

खेलते-कूदते, लङते-झगङते 

पर छोङते नहीं थे कभी हाथ ।


कङी धूप में खेलना दिन-रात 

या पानी छपछपाना बेहिसाब ।

और छोङना काग़ज की नाव

सवार कर कल्पना का संसार ।


पास थी दुनिया भर की दौलत

माचिस की डिबिया,पत्थर गोल,

कंचे, पंख, चवन्नी, डाक टिकट,

कलर, सुगंधित रबर, स्टिकर ।


खाते-खेलते,पङते बीमार,मगर

फिर भी हमेशा रहते थे बेफ़िकर ।

डाँट-फटकार, तकरार सब भूल

माँ की गोद में सोते बेसुध होकर ।



शनिवार, 2 नवंबर 2024

मिट्टी का दिया


रात्रि का निविङ अंधकार 

उस पर अमावस की रात

साधक हुए ध्यान में मग्न 

शेष सबके ह्रदय थे खिन्न 


ऐसे में एक मिट्टी का दिया

जिसके तले रहता अंधेरा

उसने ही बीङा उठा लिया

अंधियारी से लोहा लेने का


रात भर पहरा देता रहता

जागते रहो पुकारता जाता

घोर निशा में अलख जगाता

महीन लौ से मशाल जलाता


पहले साहस की बाती बटता

गाढ़े स्नेहिल अभ्यंग में पगता

चिंतन की अडिग लौ बालता

गहन तम में निर्भय टिमटिमाता


सामर्थ्यवान जब हार मान लेता

कौशल तज हथियार डाल देता

तब धनुष तान श्री राम बन जाता

छोटा-सा निरुपाय मिट्टी का दिया


शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

को जागरी ?


नभ के भाल पर

जब हुआ उदय

दूधिया चंद्रमा,

झरने लगी चाँदनी

शीतल उजियारी

छल-छल गगरी !

को जागरी ?


जो जाग रहा था,

मनसा वाचा कर्मणा,

उसने पाई चाँदनी 

भर-भर अंजुरी,

जगत हुआ तृप्त 

बूँद-बूँद अमृत

जब बरसा धरा पर ।


माँ लक्ष्मी की श्री

चाँदनी में घुली

ह्रदय में समाई ।

मानस हंस धवल

चुगते मोती उज्जवल 

तरल अनुभूति ,

धीर धरती धरित्री ।


मुदित हुआ मन

वृंदावन में बजी वंशी

मृदंग पर पङी थाप

छन छन नूपुर ध्वनि 

सुन जागी रासस्थली

जुगल जोङी संग सखी

आह्लादित रास रस पगी ।


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छवि साभार : जयति गोस्वामी

रविवार, 13 अक्टूबर 2024

अल्पना



विदा की वेला भी 

अब आ गई माँ ।


दुष्टता का कर संहार, 

पीहर में करने विश्राम, 

अर्थात मनन.. ध्यान .. 

जगत जननी, जगद्धात्री माँ

पग फेरे को आईं थी घर 

रुप धर कन्या का ।


व्रतोपासना, उत्सव,

सृजन अभिराम ।

विधिवत घट स्थापना 

नव दुर्गा आराधन

कन्या पूजन, कथा 

जौ बोना, बढ़ते देखना ..

ह्रदय में उल्लास

तन में ऊर्जा अपार !

कल्पना की वंदनवार 

रंगों की छटा बलिहार ।

धूनीर नाच,शेंदूर खेला,

ढाक बाजे तो कोई 

कैसे ना नाचे सब बिसार !


जगत के व्यवहार..

सकल आडंबर त्याग

मुक्त भाव से होकर प्रसन्न 

करुँ जीवन को स्वीकार,

और दूँ एक नया आकार ।

जाते-जाते अपनी रुप रश्मि

मेरे प्राणों में भर दो माँ।


प्रतिमा तुम्हारी भले ही 

जल में हो विसर्जित, 

ज्योतिर्मय छवि तुम्हारी 

कर लूँ मैं आत्मसात,

जैसे मिट्टी सोख लेती  

वर्षा का जल अपरिमित ।  


तुम्हारे पुनरागमन तक,

जीवन का विषम और सम

रेखाओं में समेट परस्पर 

भवितव्य की भूमि पर 

उकेर सकूँ अनूठी अल्पना ,

ऐसा विवेक और यथोचित

संकल्प शक्ति दो माँ ।


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दशहरा साभार - श्री करन सिंह पति

अल्पना - अंतरजाल से आभार सहित




शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2024

पत्र जो लिखे नहीं गए


चिट्ठियाँ जो लिखी नहीं गईं, 

लिखी गईं तो भेजी नहीं गईं,

भेजी गईं तो कभी पहुँची नहीं,

पहुँची तो पढ़ी न जा सकीं ..


उन चिट्ठियों के नाम..

मेरा ये ख़त है ।


जैसे ख़त लिखे जाते हैं ..

दुआ-सलाम के बाद,

कुशल-क्षेम, हाल-चाल

समाचार का आदान-प्रदान,

और फिर लिखना वह बात

जो सामने कहते ना बनी ।

उमङ-घुमङ कर बदली

एक दिन अनायास बरस गई।

शब्दों की बूँदें काग़ज़ भिगो गईं ।


जैसे बोतल में बंद संदेश 

कभी रवाना ही ना हों,

या हो सकता है..

अब तक सफ़र में हों,

या फिर निर्जन समुद्र तट पर

अब तक गिनती हों लहरें ।

पर रेत पर पङते नहीं निशान ।

कलम पर रह जाती है बेशक

उंगलियों की अमिट छाप ।


किन्तु पत्र जो आज तक

न हुए कभी अभिव्यक्त, 

कहने को हो गए विलीन

पर अब तक प्रतीक्षारत 

लिफ़ाफ़ाबंद घर की किसी 

पुरानी दराज में चुपचाप ।

शायद किसी दिन जब

खंगाले जाएं उपेक्षित खन

कोई उत्सुकतावश ही सही

खोल कर पढ़ ले चिट्ठी ।


चिट्ठियाँ जो लिखी नहीं गई, 

लिखी गईं तो भेजी नहीं गईं,

भेजी गईं तो कभी पहुँची नहीं,

पहुँची तो पढ़ी न जा सकीं ..


उन चिट्ठियों के नाम

है मेरा ये ख़त..

विचारों से उपजे शब्द 

जिसके लिए रचे गए, 

उस तक पहुँचते हैं ज़रुर

भावनाओं का वेश धर ।

एक दिन भरी दोपहर 

डाकिया आता है आवाज़ लगाता   

साइकिल पर सरपट या पैदल..

बस सजग रहना मन,

जब वो खङकाए साँकल ।

इस बार अपने हाथों से लेना,

खोल कर पढ़ लेना अविलंब ।


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 चित्र साभार : अंतरजाल !

शनिवार, 5 अक्टूबर 2024

अर्जी

अर्जी माँ दुर्गा के दरबार में

भारत से इज़रायल, 

फ़िलीस्तीन से लेबनान, 

बल्कि दुनिया के

किसी भी कोने में,

जो अंधेरे से

लङ रहा है, 

उसके हाथों में

मशाल दे दो माँ।

कांपते हृदय में

अभय का उजाला

भर दो माँ ।


भारत से इज़रायल,

फ़िलीस्तीन से लेबनान, 

बल्कि दुनिया के

किसी भी कोने में,

जो बस जी रहा है,

उसके जीवन को 

अर्थ दे दो माँ।


भारत से इज़रायल, 

फ़िलीस्तीन से लेबनान, 

बल्कि दुनिया के

किसी भी कोने में,

जो दो जून रोटी

और ज़रूरतें 

पूरी करने में

मरा जा रहा है,

उस जन साधारण की

युद्ध की विभीषिका से

रक्षा करना माँ।


भारत से इज़रायल, 

फ़िलीस्तीन से लेबनान, 

बल्कि दुनिया के

किसी भी कोने में

जो सिर्फ़ किसी को 

बचाने के वास्ते 

जान हथेली पर लेकर

निकल पङा है,

अपनी दस भुजाओं से

उसके साथ लङना माँ।

 

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माँ की छवि अंतर्जाल से साभार 

बुधवार, 2 अक्टूबर 2024

माँ


माँ आओ ! आओ माँ !

हुआ भोर का शंखनाद !

रश्मि रथ पर हो सवार

भव का तम हरने आओ !

दूर करो माँ यह अंधकार

जो लील रहा अस्तित्व मेरा !

सूझता नहीं मुझे पथ मेरा !

इस जग में है ही कौन मेरा

जिसको पुकार कर बुलाऊँ ?

अंतर का हाहाकार सुनाऊँ ?

अपनी कृपा दृष्टि का दीप जला

मुझे आगे का मार्ग दिखाओ ।

मेरे मन के महिषासुर बलवान 

दैन्य, दौर्बल्य, भय, संताप,

इन दुष्टों को मार भगाओ !

अपने नयनों के प्रखर तेज से

मुझमें साहस प्रज्ज्वलित करो माँ !

भावशून्यता के भंवर से उबारो !

जड़ तिमिर भेद मनोबल दो !

चरण धूलि तुम्हारी पा जाऊँ माँ !

ह्रदय आलोकित कर दे मेरा माँ

तुम्हारे पावन रूप की ज्योत्सना ।


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माँ की छवि अंतरजाल से साभार 

सोमवार, 30 सितंबर 2024

सृष्टि की संजीवनी वृष्टि


डबडबाए से आसमान की

धुंधली दृष्टि से पूछा बदली ने,

पहाङों की सीढियाँ उतर के,

धरती पर खिले सुंदर फूलों से..

क्या तुम इस मूसलाधार पानी,

जल के वेग से चिंतित नहीं ?

हठात कहीं बहा ले जाए..

तुम कैसे मुस्कुरा रहे

और ठाठ से खिल रहे ?


फूल बोले सहमति में 

सिर हिलाते, खिलखिलाते.. 

हम भीगे और भीज के

कुम्हला भी गए तो क्या ?

भरपूर खिले, बिखेरी छटा

प्यास बुझा कर तृप्त हुए !

अब सूखी मिट्टी भी नम हो,

वर्षा के जल से सिंचित हो,

सघन वृक्षों की जङें सिंचें ।


उर्वर भूमि में अंकुर फूटे,

पौधे पनपें, अभिषिक्त हों,

अभीष्ट है यही ।

फसलें झूमें, भरें ताल,

शीतल पवन बहे ।

सबके मुख पर हो हास

हमारे मन में यही आस ।

वृष्टि से तरल सृष्टि में

फूल खिलते ही रहेंगे ।


शुक्रवार, 27 सितंबर 2024

सांझ की सांझी

 

रंग पुकारते हैं ।

जी टटोलते हैं ।


सृष्टि की हर कोर

रंगों से सराबोर ।


ढल जाती है

रंगों की आभा

भावों में,

संवेदनाओं में,

अनुभूति में,

अभिव्यक्ति में ।

कलाकृति में ।

फ़र्क है ही क्या ? प्रकृति की छटा और मनुष्य द्वारा तूलिका से उकेरी रंग संयोजना में ?

क्वार के दिनों में

ध्यान से देखना ..

सितंबर के महीने में 

रंगत कुछ और ही

होती है आकाश की ।

प्रतिस्पर्धा रंगों की

सजा देती हैं मंच

चटक रंगों का ।


कुछ रंग इन दिनों में

छिटक जाते हैं 

संभवत: धरती पर ।

बिन त्यौहार वाले

समय को मापते हैं

अनगिनत रंगों से ।

पितृ भी होते होंगे 

रंगों की बिछावट से 

परम प्रसन्न और तृप्त।

जीवन के रंग ही तो 

नहीं उस तरफ़।


इसी समय मनाया

जाता है ओणम।

फूल ही फूल आते 

हैं हर तरफ़ नज़र ।


वृंदावन में राधा जू

सखियन संग मिल

बनाती हैं सांझी ।

मिट्टी और जल पर 

सजीव हो उठतीं

झिलमिलाती,

होती प्रतिबिंबित

आनंद लीला ।


अभ्यास और भाव 

भरते हैं विविध

आकृतियों में रंग,

जीवंत हो उठता है

कलात्मक सृजन ।


रंगों का समागम

घुल-मिल कर 

रचता नया रंग ।

इतना नहीं सुगम

अंकन का गणित !


बुझाते हैं पहेली !

कभी नभ में लहराते

रंग-बिरंगी चूनर दुपट्टे !

कभी परस्पर गुंथ जाते 

जैसे माला में फूल ..

सांझ समय नभ में

बिखरे रंग छन छन

सांझी में ढल रचते

बेलों से सुसज्जित 

प्रभु लीला की झांकी ।

सुसज्जित सांझी ।

धरा, नभ और मन मगन देख रंगभीना अनूठा सृजन ।

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चित्र साभार : अंतरजाल और श्री करन पति