बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

राग





सघन वृक्ष की 
ममतामयी छांव में,
कुहू कुहू
कोयल कूक रही है ।
और मन ही मन
सोच रही है,
जीवन पथ जाने
कहाँ-कहाँ ले जाएगा ।


इस पथ पर चलने वाला
क्लांत पथिक क्या,
मेरी तान सुन कर
कुछ पल चैन पाएगा ?
यदि ऐसा हो पाएगा,
उसकी थकान दूर कर
मेरा मन सुख पाएगा ।


गान मेरा
सार्थक हो जाएगा ।
जब मेरा गायन
जन-जन के मन में
सोया राग जगाएगा ।






शनिवार, 22 सितंबर 2018

पिता नहीं होते विदा










                              






बप्पा यदि जाएं ही ना
हमें छोड़ के
कभी घर से
तो अच्छा हो ना ?
सदैव मंगल हो ना ?

पर विसर्जन में
बप्पा जाते हैं क्या ?
ऐसा हमें लगता है ना ?

पर पिता
बच्चों से दूर कभी नहीं जाते ।

विसर्जन होता है उसका
जो जीवन में नहीं खपता ।
दुख ग्लानि आक्रोश कुंठा का
जो भी निभ नहीं सकता ।

जो अपना हो, कभी नही जाता,
बप्पा विराजते हैं मन में सदा ।



हम बस गर्व करते रहेंगे ?

हम गर्व तो नहीं करते रह सकते।
उसने कहा।

छर्रे की तरह
उसका ये कहना
चीर गया।

उसने कहा
क्योंकि उसका कोई अपना
शहीद हुआ था।
वो ख़बर पढ़ कर 
नहीं बोला।

ज़माने ने पढ़ा
आगे बढ़ गया ।
शहीद का कुनबा
ठगा-सा रह गया।
इसलिए बोला।

अब क्या होगा ?
दो जून रोटी का
जुगाड़ कैसे होगा ?
पहाड़ से जीवन का
हिसाब कैसे होगा ?
सब जुटाना होगा।

गर्व से क्या होगा ?
कल फिर कोई शहीद होगा।
सारे देश को गर्व होगा।
फिर क्या होगा ?

कभी सोचा ?
बस गर्व करने से क्या होगा ?

कभी नहीं सोचा।
क्योंकि हमारा अपना
शहीद नहीं हुआ।

जो शहीद हुआ।
आंकड़ा था।
अपना नहीं था।
इसलिए फिर गर्व हुआ।

पर उसने कहा -
हम हमेशा,
गर्व तो नहीं करते रह सकते।

रविवार, 16 सितंबर 2018

संध्या वंदन


सांझ की लौटती धूप
धीरे-धीरे आती है,
सोच में डूबी हौले-हौले
भोले बच्चों जैसी
फूल-पत्तियों को..
सरल सलोने स्वप्नों को
दुलारती है ।
हल्की-सी बयार से
पीठ थपथपाती है ।

बस इतनी-सी बात पर
शाम रंग-बिरंगे दुपट्टों-सी
झटपट रंग जाती है ।
थके-हारे मन सी
माथे की शिकन-सी
आसमान की
सलेटी सिलवटों को,
कल्पना की कूची से
कभी चटक कभी गहरा
गुलाबी,नारंगी,जामुनी और
नीलम से नीला रंग कर
रुपहला बना देती है ।

जीवन के भले-बुरे 
सारे रंगों का दिलचस्प
कोलाज बना देती है ।

स्मरण कराती है ..
उठो अब दिया-बाती करो ।
संध्या वंदन करो ।
चलो आगे बढ़ो ।
समय का पथ प्रशस्त करो ।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

उनका भी त्यौहार है


उनका भी त्यौहार है ।
उनका भी परिवार है ।

पर कहीं देश में बाढ़ है ।
कहीं आतंक की मार है ।
कौन संभालेगा ?

कौन जल प्रलय में डूबते को हाथ बढ़ाएगा ?
कौन अशक्त को कंधे पर लाद के लाएगा ?
कौन भूखे-प्यासों को राशन पहुंचाएगा ?
सर्वस्व गंवा बैठे जो उनको कौन दिलासा देगा ?

कौन दिन-रात सीमा पर अलख जगाएगा ?
कौन अनजान खतरों को चुनौती देगा ?
कौन हर रोज़ आज़ादी का परचम फहराएगा ?
कौन जान पर खेल कर हमारी जान बचाएगा ?

हम विश्लेषण करते हैं ।
वो काम करते हैं ।
हम दोषारोपण करते हैं ।
वो समाधान करते हैं।

धन्य हैं जो ऐसा नेक काम करते है ।
जान और जवानी क़ुर्बान करते हैं ।1
अपने श्रम से देश का रौशन नाम करते हैं ।
बड़े नाज़ से हम जिनको जवान कहते हैं ।
हम भारतवासी इन जांबाज़ों को प्रणाम करते हैं ।

उनके भी अपने कहीं बसते हैं ।
उनके भी अपने घर होते हैं ।

उनका भी त्यौहार है ।
उनका भी परिवार है ।

पर सेवा ही उनके जीवन का सार है ।
देश की हिफाज़त ही इनका त्यौहार है ।

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

मन भर आकाश


स्टीफ़न हॉकिंग ने कैसे 
एक अर्थपूर्ण 
शानदार जीवन जिया ?
काटा नहीं  . . जिया। 

कुछ भी तो नहीं था,
तन के नाम पर। 
पर मन भर 
असीम आकाश था। 
जिसमें जीवट नाम का 
प्रखर सूर्य चमकता था। 
संवेदनशील धैर्य का चंद्रमा 
शिफ्ट ड्यूटी करता था। 
विलक्षण प्रतिभा पंख फैलाये 
निरंतर उड़ान भरती थी। 
और एक बात थी। 

इस वैज्ञानिक ने अपने 
जीवन की रिक्तता का 
कभी अफ़सोस नहीं किया। 
मस्तिष्क की अपार संभावनाएं 
अपनी सोच में समेट कर
जीवन उत्सव की तरह जिया। 


रविवार, 2 सितंबर 2018

संभावना

क्या खूब हो अगर
तुम्हारी कमी को 
मैं पूरा कर दूं !
और मेरे खाली पन्ने को
तुम भर दो !


आओ चलो !
एक तस्वीर बनाते हैं ,
मिल - जुल कर।
अपने - अपने
रंग भर कर। 
शायद इनके मिलने से
इन्द्रधनुष बन जाये !
कितना मज़ा आये !


या तुम अपनी बात कहो।
मैं अपनी व्यथा कहूँ।
हो सकता है ,
बात - बात में
कविता रच जाये
मेहँदी की तरह
भाग्य रेखाओं में !


हो सकता है ना ..
जब - जब हम हाथ मिलाएं
गर्मजोशी से ,
अपनी - अपनी कमियों में
देख पायें,
नयी संभावनाएं !


शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

मनोबल

सब कुछ 
टूट - फूट कर 
बिखर जाये, 
छिन्न - भिन्न हो जाये, 
खो जाये  . .
कुछ भी हो जाये  . . 

आदमी चोट खाता है पर
फिर उठ खड़ा होता है। 
हिम्मत का धनी होता है। 

विसंगतियों से हारता है। 
पर हार नहीं मानता। 

वो अपाहिज हो ही नहीं सकता, 
जिसका मनोबल नहीं टूटा। 



मंगलवार, 28 अगस्त 2018

करमजला बना गोविंदा


एक था गोविंदा ।                                                 
सब कहते थे करमजला ।
माँ - बाप का इकलौता बेटा ।
पर पैरों से लाचार था ।
बैसाखी लेकर चलता था ।
किसी काम का ना था ..
खेत क्या जोतता ?

बच्चे जब खेलते थे ।
दूर बैठा तकता रहता ।
गुपचुप रोता रहता ।

एक दिन माँ ने देखा ।
गोविंदा चुपचाप बैठा
टूटे - फूटे सामान का
कुछ बना रहा था .
माँ ने सोचा ,
रोने से कुछ करना अच्छा ।

फिर एक दिन माँ ने देखा,
बच्चों ने घेर रखा था ।
गोविंदा कुछ दिखा रहा था । 
एक अटपटा खिलौना था । 
पर सबके मन को भा रहा था । 
और गोविंदा मुस्कुरा रहा था । 

बस माँ ने ठान लिया । 
अब यही करेगा मेरा बेटा । 
टूटे - फूटे को जोड़ेगा । 
फूटी किस्मत संवारेगा । 
पैरों पे खड़ा नहीं हो सकता तो क्या ?
हाथ के हुनर से अपना पेट भरेगा । 

फिर क्या था !
माँ - बाप ने बीड़ा उठाया । 
करमजले को खिलौने बनाना 
सबने मिल कर सिखाया । 
सारे गाँव ने करमजले को अपनाया । 
जो काम सहानुभूति से कभी ना होता। 
वही हुनर ने कर दिखाया । 
अब कोई बच्चे के लाचार पैर नहीं देखता । 
अब समाज बन गया है मनसुखा । 
और मनसुखा के कंधे पर बैठा 
करमजला अब गोविंदा हो गया है !



रविवार, 5 अगस्त 2018

एक आला मित्रता के नाम का

कहो मित्र,
कैसे हो ?
एक अरसा हुआ,
न सलाम न दुआ ?
सब कुशल तो है ना ?
शिकायत नहीं करता,
बस दिया उलाहना ।
जिससे तुम जान जाओ,
याद बहुत आते हो ।
मन मसोस कर
कुछ करने पर,
अब भी टोक देते हो ।
परछाईं की तरह,
साथ चलती है तुम्हारी याद ।
पक्की है,
हमारी मित्रता की बुनियाद ।
क्या फ़र्क पड़ता है ?
तुम्हारा पास होना,
ना होना ।
जब तक निरंतर
होता रहे संवाद,
मन से मन का ।
मन का कोई कोना,
हो ना सूना,
इसलिए कहा ।
एक आला
कृष्ण-सुदामा के नाम का,
एक आला
हमारी मित्रता के नाम का,
सदा संजोए रखना ।


शनिवार, 4 अगस्त 2018

माँ कभी छोड़ के जाती है क्या ?

माँ चली गई ।

बिटिया रानी ..
बहुत बदलेगी ज़िन्दगी अभी ।
तुम भी बहुत बदलोगी ।

माँ के लिए,
जो आंसू आंखों में आए,
उन्हें निरर्थक बहने मत देना ।
अपने हृदय में बो देना ।
फिर पूरे अधिकार से
जीवन भर सींचना ।

माँ की स्मृति को
अलमारी में मत सहेजना ।
उनकी एक-एक बात को
अपने आचरण में
जीवित रखना ।
जीवन पर्यंत ..
आराधना करना ।

उनकी व्यथा को
सृजन का रूप देना ।
उनके स्वप्नों को
अपने रंग देना ।

माँ कभी
छोड़ के जाती है क्या ?
जब जी हो ..
मन के दर्पण में
उनको देखना ।

रविवार, 22 जुलाई 2018

कनिष्ठा

हाथ छुड़ा कर, 
कभी भी एकाकी, 
निर्जन जीवन पथ
पार मत करना ।
ठाकुरजी की उंगली
कस के पकड़े रहना ।
ठोकर लगी भी
तो गिरोगे नहीं ।

जो कनिष्ठा पर
गोवर्धन धारण करते हैं,
पर समर्पित भाव
को डूबने नही देते ।
वो तर्जनी पर
सुदर्शन चक्र भी
धारण करते हैं,
सौवीं ग़लती पर
क्षमा नहीं करते ।

इन्हीं उंगलियों पर बाँसुरी
धारण करते हैं,
जपते हैं,
राधा नाम अविराम ।
जितनी मधुर उनकी मुस्कान,
बजाते हैं मुरली
उतनी ही सुरीली,
मिसरी-सी मीठी,
मानो लोरी ।

और प्रसन्न वदन जब
हौले से हँस कर,
नतमस्तक शीश पर
रखते हैं हस्त कमल,
सकल द्वंद, भव फंद,
हो जाते हैं दूर ।

इसलिए वत्स,
कभी मत छोड़ना,
कस कर
उंगली पकड़े रहना ।


शनिवार, 21 जुलाई 2018

मांग लेना मनचाहा

स्नेह के अधिकार से
मांगो तो मनचाहा
मिलता है ।
और क्या है
मन की चाहना,
ये भी मायने रखता है ।
देने वाला
देने से पहले
लेखा-जोखा करता है ।
किसको देना है ?
कितना देना है ?
किन शर्तों पर देना है ?
पर तुम ये सब
मत सोचना ।
मनचाहा मांग लेना ।

नभ से
चाँद-तारे नहीं,
विशाल हृदय और
दिल में सबके लिए
जगह मांगना ।

हरे-भरे पेड़ों से
फल-फूल और
ठंडी छाँव ही नहीं,
उस राह से जो गुज़रे
उदारता के बीज बोते हुए,
उन नेकदिल पथिकों का
पता-ठिकाना मांगना ।

नदी से
गगरी भर जल ही नहीं,
लहरों का
निश्छल भावावेग,
लय में
बहते रहने का मंत्र,
और मन की गहराई मांगना ।

ठोकरों से संभलने का हौसला मांगना ।
चट्टानों से अडिग दृढ़ता मांगना 
कड़वे अनुभवों से संवेदना मांगना ।
फूलों से पराग मांगना ।
जुगनुओं से रोशनी मांगना ।
भवितव्य से चुनौती मांगना ।
भाग्य से कर्मठ जीवन मांगना ।
ठाकुरजी से सद्बुद्धि और भक्ति मांगना ।

कुछ ना रह जाए अनकहा ।
मांग लेना मनचाहा ।