तुम एक शायर हो ।
तुम्हें पता है ?
ना जाने
कितने लोगों का आसरा
तुम्हारा पता है ।
जिस पते पर
मन ही मन में,
इन लोगों ने
अपने दिल का हाल
लिख भेजा है ।
तुम्हारे दिल तक उनका
पैग़ाम पहुंचा है क्या ?
अगर हाँ . .
तो ख़याल रखना इनका ।
हज़ारों की तादाद में,
या अकेले ,
ये तुमसे
आस लगाये,
टकटकी बांधे
बैठे होंगे,
कहीं मंच के सामने ।
तुम हर एक को नहीं पहचानते ।
बेहद मामूली लोग ये . .
ठीक से दाद देना भी
नहीं जानते ।
इनके लिए,
तुम ग़ज़ल कहना ।
इनके लिए,
तुम नज़्म पढ़ना ।
तुम्हारा कहा
शायद इनके किसी काम आए।
ये बावले !
तुम्हारी शायरी की
उंगली थामे,
एक पूरी ज़िंदगी जी लेंगे !
इसलिए,
माइक के सामने
जब तुम बुलाये जाओ,
तुम्हें वास्ता
अपनी कलम का . .
उन तमाम बातों का
जिन्होंने तुम्हें शायर बनाया . .
तुम सिर्फ़
उनसे मुख़ातिब होना,
जो तुम्हारा लिखा
जीते हैं ।
जिन्होंने शायरी से
सच्ची मोहब्बत की है ।
जो अपने दिल की बात
तुमसे सुनने आये हैं ।
तुम अपना कलाम
उनके लिए पढ़ना ।
हमेशा दिल की बात कहना ।







