बुधवार, 8 अप्रैल 2026

अपने कर्म ही


अपने कर्म ही
भाग्य सँवारते हैं ।
अपने कर्म ही
आङे आते हैं ।

अपने कर्म ही
दाँव लगाते हैं ।
अपने कर्म ही
खूब पछाङते हैं ।

अपने कर्म ही
पहचान बनाते हैं ।
अपने कर्म ही
धूल चटाते हैं ।

बाकी सारी बातें
सब बेकार हैं ।
अपने कर्म ही
बनाते-बिगाङते हैं ।

बात-बात पर
भगवान को क्यों कोसें ?
बाधाएँ आने पर
दूजों को क्यों दोष दें ?

आदमी क्यों जीवन भर
जोङ-तोङ बैठाता है ?
जब अपना किया ही
अपने खाते में जाता है ।


6 टिप्‍पणियां:

  1. बात-बात पर भगवान को क्यों कोसें ? बिल्कुल सही।

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  2. सही है, जैसी करनी वैसी भरनी

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  3. हमारे भविष्य और चरित्र का निर्धारण हमारे कर्म के द्वारा होते है।
    सुंदर एवं सटीक अभिव्यक्ति।
    सादर।
    -------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १० अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  4. बात तो सौ आने सही है पर कभी कभी शक भी होने लगता है वैसे तो जब ईरान अमेरिका युद्ध को देखते हैं जैसे :)

    जवाब देंहटाएं

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