बुधवार, 8 अप्रैल 2026

अपने कर्म ही


अपने कर्म ही
भाग्य सँवारते हैं ।
अपने कर्म ही
आङे आते हैं ।

अपने कर्म ही
दाँव लगाते हैं ।
अपने कर्म ही
खूब पछाङते हैं ।

अपने कर्म ही
पहचान बनाते हैं ।
अपने कर्म ही
धूल चटाते हैं ।

बाकी सारी बातें
सब बेकार हैं ।
अपने कर्म ही
बनाते-बिगाङते हैं ।

बात-बात पर
भगवान को क्यों कोसें ?
बाधाएँ आने पर
दूजों को क्यों दोष दें ?

आदमी क्यों जीवन भर
जोङ-तोङ बैठाता है ?
जब अपना किया ही
अपने खाते में जाता है ।


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