माँ जानकी सीता का स्मरण बारंबार
मुझ में बो दे धैर्य और पावन संस्कार
माँ को नित यही प्रार्थना करते देखा
जब बालक ने तो उत्सुकतावश पूछा
बोने की बात करे यह कैसी है वंदना ?
माँ ने हाथ जोङे फिर सोच कर कहा
जानते हो ना धरा से जन्मी हैं माँ सीता
धरती से ही हर बीज प्रस्फुटित होता
जङें हम सबकी धरती के मर्म में हैं ना
सृष्टि का भार समस्त धरती ने समेटा
माटी से उगता है,माटी में मिल जाता
जीवन क्रम सारा साक्षी भाव से देखा
धैर्य न डिगा माँ का जब आई विपदा
सुख-दुख की वृष्टि के जल को सोखा
आर्द्रता से संकट में साहस को सींचा
आत्मबल से सीता जी ने संग्राम जीता
संस्कार के अलंकार धारण करती माँ।
बाल मन के भोलेपन ने क्या समझा ?
माँ के स्वरुप की छवि को कैसे आंका..
भूमिजा सीता का मन उदार धरती जैसा
प्रफुल्ल प्रकृति ने भाव अभिव्यक्त किया
कोमल कुसुम कली श्रृंगार धानी ओढ़ना
पुष्पों की वेणी गूंथ कर की केश सज्जा
नयनों में उमङती सरस्वती और यमुना
वाणी में मधुर कल-कल जल प्रपात बहता
वरद हस्त संकट, विषाद , क्लेश हर लेता
जङमति होवे सुमति, चरणों में शीश नवा
रघुनंदन राम की शक्ति परम पुनीता सिया
राघव की भक्ति में लीन सदा समर्पित सीता
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
माँ जानकी छवि अंतरजाल से आभार सहित
रघुनंदन राम की शक्ति परम पुनीता सिया
जवाब देंहटाएंराघव की भक्ति में लीन सदा समर्पित सीता ।
अहा ! बहुत ही लाजवाब
मुझ में बो दे धैर्य और पावन संस्कार
वाह!!!
सुंदर
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 14 फरवरी, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंमाँ जानकी को समर्पित सुंदर उद्गार
जवाब देंहटाएं