सोमवार, 9 जनवरी 2017

कांच

जब जब मन 
कांच की तरह 
चकनाचूर हुआ  . . 
और कई बार हुआ  . . 
एक एक टुकड़ा 
मैंने सहेजा,
और संभाल कर रखा ।
उनमें बार - बार 
अपना अक्स देखा 
और सोचा  . . 

चलो ये भी कोई 
बुरा सौदा तो नहीं !
टूटी चीज़ों को जोड़ कर 
एक बेजोड़ कलाकृति बनाना,
एक नए अस्तित्व  . . 
एक नए व्यक्तित्व को 
जन्म देता है । 
टूट कर बिखरने को भी 
एक अर्थ देता है ।
सुंदरता देता है ।
टूटी आस्था को 
जोड़ देता है  . . 
नाम के लिए ही सही ।

कुछ देर के लिए ही सही 
हौसला तो देता है ,
बिखरे कांच समेटने का,
जोड़ जोड़ कर 
एक नयी इबारत गढ़ने का ।
फिर नए उत्साह से जीने का ।         

       

रविवार, 1 जनवरी 2017

अभिमन्यु




हारने के डर से 
अभिमन्यु लड़ना नहीं छोड़ता ।

तो क्या हुआ 
कि उसकी विद्या अधूरी है ?
चक्रव्यूह को भेद कर 
बाहर निकलना आना ज़रूरी है ।
अभिमन्यु को पता है,
युद्ध टाला नहीं जा सकता ।
समय पर जो विद्या 
काम ना आए, 
उस विद्या का उपयोग क्या ?
अभिमन्यु पीछे नहीं हट सकता । 

तो क्या हुआ 
कि वो अर्जुन नहीं ?
कृष्ण तो बिल्कुल नहीं ।
पर वो अभिमन्यु तो है ।

अभिमन्यु मृत्यु से नहीं डरता ।
उसे पता है ,
वो चक्रव्यूह 
भेद नहीं पायेगा ।
पर विजय ना सही, 
वीरगति तो पायेगा।
पराक्रम की 
आधारशिला रख जायेगा ।
अभिमन्यु लड़े बिना
कहीं नहीं जायेगा ।
क्रूर शूरवीरों को 
पाठ पढ़ा कर जायेगा ।
अपना कर्तव्य 
पूरा करके जायेगा ।
अंतिम श्वास तक 
लड़ कर जायेगा ।

उसे पता है, 
महायुद्ध का 
यह अंत नहीं ।
युद्ध कोई निष्कर्ष नहीं, 
मतभेद का ।
पर अन्याय सहना भी,
कोई विकल्प नहीं ।

स्वाभिमान की रक्षा, 
हर मनुष्य का 
कर्तव्य है ।
और आत्मबल ही 
सबसे बड़ा बल है ।
फिर भय कैसा ?
भयभीत होना 
अभिमन्यु ने नहीं सीखा । 
उसने बस इतना जाना, 
कर्म ही है गीता ।
फिर संशय कैसा ?

जो अपनी 
सामर्थ्य भर लड़ा है,
वही योद्धा जीता है । 

रविवार, 25 दिसंबर 2016

ज़िद कर !

आज तेरा दिन है । 
बड़ा दिन है । 

जो औरों का 
दुःख-दर्द अपना कर
सूली पर चढ़ गया,
उसने तुझे भेजा है 
आज के दिन।
तू दुनिया को 
बड़े दिन का 
तोहफ़ा है ।
अपनी पीड़ा 
आत्मसात कर 
दुनिया को हँसाना 
तेरी बेबाक़ अदा है ।
लोगों को हँसा, 
अपना ग़म भुला 
और ख़ुशी के अफ़साने लिख  . . 
जिस तरह दुःख को हँसी में उड़ाना 
तेरा अंदाज़े - बयां है ।

लिख । 
रोज़ अपने मन की बात लिख ।  
कागज़ पे और दिल पे  . . 
और अपने - आप से 
ज़िद कर ।      

ज़िद कर 
दुनिया को हँसते - खेलते 
बेहतर बनाने की ।
हर हाल में मुस्कुराने की  
ज़िद कर ।

ज़िद कर अपनों से 
छोटी - छोटी चीज़ों की !
मचल जा !
ज़िद कर और मांग 
बुढ़िया के बाल,
कंचे, लेमन चूस,
सेंट वाला रबर,
अटरम शटरम,
टपरी की चाय,
सींग दाने की पुड़िया,
भाड़ के भुने चने,
बुलाने का कोई 
पाजी सा नाम,
रहीम के दोहे,
मुल्ला नसरुद्दीन के किस्से  . . 
अपनों से मांग । 
बल्कि सपने,
चाँद - सितारे भी माँग  . . 
अपने खुदा से मांग ।              

जब जी चाहे,
अपनों से 
कस के लिपट जा
और पीठ पर 
एक धौल मांग,
कान का उमेंठना मांग,
डाँट - फटकार मांग 
और ज़िद कर !
ज़िद कर 
गाढ़े अपनेपन की 
मिसरी में पगे, 
खरे - खरे 
दो रूखे बोल मांग !
उनके मन के 
अनचीन्हे कोने में 
थोड़ी - सी जगह मांग !
ज़िद कर !
हक़ जता और 
अपनों से 
ज़िद कर !

आज तेरा दिन है ।
बड़ा दिन है ।
बड़े - बड़े काम कर, 
पर छोटा बन कर 
लड़ - झगड़  . . 
कोई मासूम - सी 
ज़िद कर !