रविवार, 26 अक्टूबर 2014
शनिवार, 20 सितंबर 2014
साथ दुआ लेते जाना
अब जा ही रहे हो तो ..
साथ दुआ लेते जाना .
रास्ते आसान होंगे,
ये ज़रूरी तो नहीं .
हालात मेहरबां होंगे,
ये भी ज़रूरी नहीं .
अब चल ही पड़े हो तो ..
हौसला बनाये रखना .
ख़ुशी के मौके होंगे,
पर हरदम तो नहीं .
लोग हमक़दम होंगे,
पर हमेशा तो नहीं .
अब चल ही पड़े हो तो ..
माहौल बनाये रखना .
अब जा ही रहे हो तो ..
उम्मीदों की सौगात लेते जाना .
परिंदों की उड़ान लेते जाना .
ज़िन्दादिली का पैगाम लेते जाना .
यादों का सामान लेते जाना .
अब जा ही रहे हो तो ..
साथ दुआ लेते जाना .
शनिवार, 13 सितंबर 2014
बच्चों का चेहरा
शर्मिष्ठा शर्मा ..
उम्र पैंतीस के लगभग,
बारह वर्ष नौकरी का अनुभव,
कद-काठी सामान्य .
रोज़ सुबह
जैसे ही स्कूल बस जाये,
हैवरसैक सीने से चिपकाये,
धड़धड़ाती हुई रेल की तरह
लोकल ट्रेन पकड़ने
घर से कूच करती है..
जैसे मार्चिंग ऑर्डर्स मिले हों .
एक नदी की तेज़ धार,
भीड़ के अपार समुद्र में
समा जाती है .
हाथ-पाँव मारते हुए,
अपनी जगह बनाते हुए,
ख़ुद को साधना पड़ता है
तीर की तरह तन कर ..
पैना बन कर .
यात्रा का पहला चरण तय कर,
आगे बढती है बस पर चढ़ कर .
जद्दोजहद यहाँ भी नहीं कम पर .
जिन्हें काम की लत लगी,
उन्हें काम की कमी नहीं.
दिन भर हुआ काम,
फिर हो गई शाम .
शाम को भी वही दस्तूर,
आख़िर बस्ती है बहुत दूर .
पैदल परेड करते हुए,
बस में फांस की तरह फंसे हुए,
ट्रेन में मल्लयुद्ध करते हुए .
युद्धस्तर पर जीते हुए,
कैसे हर दिन फिर दोबारा,
तैनात हो जाती है
शर्मिष्ठा शर्मा ?
शाम तक शरीर का
ईंधन चुकते-चुकते,
क्यूँकर इसके
पाँव नहीं थकते ?
घर लौटने तक,
किस खुराक पर
सरपट दौड़ती है
शर्मिष्ठा शर्मा ?
एक दिन उससे पूछा था,
तो उसने जवाब दिया था ..
सुबह मुझे रहती है जल्दी,
आजीविका कमाने की .
घर लौटते हुए,
मन में प्रबल
एकमात्र इच्छा,
जल्दी से जल्दी
देखना होता है
बच्चों का
चेहरा .
सुननी होती हैं
उनकी बातें,
जी चुरा लेती हैं
उनकी
शरारतें .
सारी दुश्वारियों से
भिड़ जाती है
शर्मिष्ठा
शर्मा ,
क्योंकि उसे
देखना होता है
अपने बच्चों का
चेहरा .
शनिवार, 30 अगस्त 2014
गणपति बप्पा मोरया
हर मुम्बईकर के पिता,
गणपति बप्पा मोरया ।
इनका उत्सव आया,
चतुर्दिक हर्ष छाया !
शिल्पकार की मुखर हो उठी कल्पना,
बप्पा को अनेक रूपों में देखा ।
किसी ने उन्हें मुनीमजी बनाया,
किसी ने स्कूल का यूनिफार्म पहनाया ।
किसी ने हाथों में वाद्य थमाया,
किसी ने पग में नूपुर बाँधा ।
कभी हाथ में पुस्तक,
कभी नृत्य को उत्सुक,
बप्पा ने सबका मन बहलाया,
सिर पर रखा हाथ मस्तक सहलाया ।
बप्पा के चरणों पर शीश नवाऊँ,
बप्पा की गोद में सिर रख सो जाऊं ..
तो चैन पाऊं,
बप्पा के गुण गाऊं ।
भाव विभोर हो मन कह उठा,
बप्पा हमको आशीष देना ।
रविवार, 24 अगस्त 2014
अनुभव
आज दफ़्तर को जाते हुए,
एक अजब किस्सा हुआ ।
मोटरों की चिल्ल-पों,
भीड़ भरे रास्तों
के ठीक बीचों-बीच,
बस स्टॉप के रास्ते पर
चलते-चलते अचानक देखा . .
एक गिलहरी,
अनायास ही ,
मेरा रास्ता
पार कर गयी ।
कंक्रीट का जंगल
देखता रह गया ।
कुछ पल के लिए
वहाँ कोई ना था ,
ना रास्ता ,
ना बाकी दुनिया से वास्ता ।
एक कोमल पल ठहर गया ।
एक सुखद अनुभव हुआ ।
और बाँटने का मन हुआ ।
शुक्रवार, 15 अगस्त 2014
स्वतन्त्रता
सच्ची स्वतन्त्रता यही है ।
बच्चों की सेना
जगह - जगह
चौराहों पर,
प्लास्टिक के तिरंगे
बेच रही है ।
इन्ही की
खुरदुरी
हथेलियों पर,
देश की
सम्पन्नता
टिकी है ।
इन्ही के
दुबले
कन्धों पर,
देश की
प्रतिष्ठा
टिकी है ।
इनकी
जिजीविषा
महाबली है ।
सच्ची
स्वतंत्रता
यही है ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

