Sunday, 26 October 2014

दीये की लौ





आले में रखा
दीया,
कब तक
और कितनी दूर तक
दूर करता रहेगा
अँधेरा ?



एक दिन तो
मुझे चल देना होगा,
हथेली पर लेकर दीया ..

लौ का काजल
आँखों में आंज कर,
नज़र चमका कर,                   
चीर कर रख देना होगा
अँधेरा .


एक दिन तो              
मुझे अपना मन
साधना होगा,
मानो
दीये की लौ .   






1 comment:

Shams Noor Farooqi said...

कविता की कला पर नहीं, चलो भावना पर बात करते हैं -

आले में रखा दिया - एक प्रकाश, ठहरा हुआ।

कब तक - प्रकाश, जो ठहर गया, वह प्रकाश रहा ही नहीं। इस अनन्त आकाश में एक क्षण को चमका, और बुझ गया। उसको चलना ही होगा। परन्तु

कितनी दूर तक - उसमें शक्ति ही कितनी है? जीवन ही कितना है? प्रकाश को जीवन से मिलना होगा। उस अनन्त आत्मा से मिलन कैसे हो, जो सदा जीवित है?

वह मैं हूँ। यह आत्म-ज्ञान है। मुझे प्रकाश में निहित होना है। मगर कैसे?

लौ का काजल - लौ अग्नि है। अग्नि पवित्र है। अपनी आहुति दे। अपनी आत्मा को पवित्र कर। जले, तो मिला -

काजल - काजल अंधकार है। सम्पूर्ण अंधकार। अग्नि से निकला, सो पवित्र अंधकार। एक बार मैंने पहले भी किसी कविता पर लिखा था, कि अंधकार में जाओगे तभी तो प्रकाश समझ आयेगा। अब इस अनन्त अंधकार का प्रकाश कहाँ है?

वही तो श्याम है। जीवन का प्रकाश। जिसकी धुन पर सृष्टि चलती है, जीवन की धारा बहती है। रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। (गीता७:८)

आँखों में आंज - आँख से हमारा प्रकाश है। जब उसमें काजल समा लिया, तो हमारा प्रकाश रहा ही नहीं, उसका हो गया। हम अनन्त प्रकाश में समा गये। हम प्रकाश हो गये।

एक दिन तो - जानना ही होगा। अपना मन साधना ही होगा। तुझे प्रकाश में निहित होना ही होगा। श्री कृष्ण ने ज्ञान के लिये अर्जुन को ही क्यों चुना? क्योंकि अर्जुन अग्नि से हैं। तो सुन मेरे प्यारे बच्चे नूपुर। यदि तुझे अनन्त प्रकाश में मिलना है, ख़ुद प्रकाश बनना है, तो पहले तुझे अग्नि को चुनना होगा। अग्नि बनना होगा। यानि
- दीये की लौ॥

ख़ुश रह। बहुत ख़ुश रह। लिखती रह। ऐसे ही लिखती रह। जो पढ़ने वाला है, वह पढ़ रहा है। प्रकाश यह देखने नहीं रुकता कि उसने कितना अंधेरा दूर किया। उसका काम बस बढ़ते जाना है।

नमस्ते

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