Sunday, 24 August 2014

अनुभव



आज दफ़्तर को जाते हुए,
एक अजब किस्सा हुआ ।

मोटरों की चिल्ल-पों, 
भीड़ भरे रास्तों 
के ठीक बीचों-बीच,
बस स्टॉप के रास्ते पर 
चलते-चलते अचानक देखा  . . 
एक गिलहरी, 
अनायास ही ,
मेरा रास्ता 
पार कर गयी ।
  
कंक्रीट का जंगल 
देखता रह गया ।

कुछ पल के लिए 
वहाँ कोई ना था ,
ना रास्ता ,
ना बाकी दुनिया से वास्ता ।

एक कोमल पल ठहर गया ।
एक सुखद अनुभव हुआ ।
और बाँटने का मन हुआ ।      




4 comments:

  1. व्यस्त नगरी के शोर गुल के मध्य गिलहरी का यकायक रास्ता काटना उस भीड़ से अलग नवीन भाव की सृष्टि करता है जिसे अपनों से सांझा करने की उत्सुकता स्वाभाविक है| सुंदर भावपूर्ण रचना|

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  2. पुनः धन्यवाद शर्माजी ।
    आपने खूब समझी कविता !
    और क्या खूब कह दी दोबारा ।

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  3. हाँ, यही तो है। मन की भावना। एक लम्हा जो दिल में ठहर गया वह स्याही बन कर काग़ज़ पर उतर गया। सुखद लगा, सो बाँट दिया।

    गिलहरी ने रास्ता पार किया। कंक्रीट का जंगल... चाहे इसे हम आज की हमारी बाहरी ज़िंदगी के तौर पर ले लें, या हमारे अंदरूनी दिल के जंजाल और दिमाग़ी बद-सुकूनी के तौर पर, गिलहरी ज़िन्दगी है। बचपन में पढ़ा था कि इसकी पीठ पर जो धारियाँ होती हैं वह श्री रामचन्द्र जी की उँगलियों के निशान हैं। पता नहीं सही या ग़लत। मगर उसने गिलहरियों के लिये मेरा नज़रिया हमेशा के लिये बदल दिया।

    गिलहरी ने रास्ता पार किया। वह आई, अपनी छाप छोड़ी, और चली गई। वह रास्ता काट भी सकती है। ज़िन्दगी हमेशा मौत पर हावी है। मौत का मतलब यहाँ जिस्मानी मौत नहीं। कुछ ज़्यादा ही उर्दू हो गई। जड़ और चेतन कर लीजिये। या अंधेरा और रौशनी। गिलहरी या रौशनी न सिर्फ़ अंधेरे को चीर कर गुज़र सकती है, बल्कि ठहर कर अंधेरे को दूर भी कर सकती है।

    या यह सब हम किनारे कर दें। हमारा लकीर पर चलता जीवन, और एक गिलहरी का अल्हड़पन। बहुत अच्छा है। ख़ुश रहिये। लिखती रहिये।

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    1. शम्स साहब आप जब कविता पढ़ कर अपनी बात कहते हैं वह बात पढ़ कर हम कविता फिर से पढ़ते हैं । अंग्रेजी की एक कहावत जो है reading between the lines..उसे आप सार्थक कर देते हैं । कह कर भी जो शब्दों में नहीं कहा गया वह आप पढ़ लेते हैं । इसीलिए आपके आशीर्वचन सदा ही सर-आँखों पर ।
      रामजी की कथा कुछ ऐसी पढ़ी थी की राम सेतु बनाते समय सब ने अपना-अपना योगदान दिया । एक गिलहरी ने यह देखा तो उसने सोचा कि मैं भी कुछ सेवा करूँ । वह रेट में लोटती और सेतु के निकट जाकर रेट को झटक देती । गिलहरी का यह परिश्रम देख कर रामजी का मन द्रवित हो उठा । उन्होंने गिलहरी को उठा कर बड़े प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फेरा । कहते हैं उनकी उँगलियों की छाप ही गिलहरी की पीठ की धारियां हैं ।
      ये प्यारी कथा हमको भी बहुत प्रिय है ।
      हमने जो कहना चाहा, आपने समझा । आभार । प्रणाम ।

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नमस्ते