रविवार, 12 मई 2013

कह डालो




बेबस दिल का गुबार निकालो ,
झट से इक कविता लिख डालो .
और किसी से कहो न कहो ,
कविता में सब कुछ कह डालो .

शब्दों को अपना मित्र बना लो .
भावों को सारथी बना लो .
मन के द्वन्द सकल मथ डालो .
कविता में सब कुछ कह डालो .

बासी बातों को धूप दिखा दो .
आस की चुनरी रंगवा लो .
स्मृतियों की गठरी खोल डालो .
कविता में सब कुछ कह डालो .

झाड - पोंछ कर साफ़ करा लो .
मन में पूजा का दीप जला लो .
जो लिखा वही नैवेद्य चढ़ा दो .
कविता में सब कुछ कह डालो .



रविवार, 28 अप्रैल 2013

इतनी सी बात पर



जिस तरह डाली पर फूल हौले - हौले हिलते हैं .
जिस तरह सूखे पत्ते धीरे - धीरे झरते हैं .
जिस तरह पानी की बूँद पत्ते पर ठहरती है .
बस इतनी - सी बात पर 
शायर नज़्म लिखते हैं .  

जिस तरह बारिश मूसलाधार बरसती है .
जिस तरह पहली बौछार के बाद मिट्टी सौंधी - सौंधी महकती है .
जिस तरह बूंदों की क्यारियाँ - सी धरती पर बनती हैं .
जिस तरह बरखा एक राग धीमे - धीमे गुनगुनाती है .
बस इतनी - सी बात पर 
शायर नज़्म लिखते हैं .

जिस तरह कोई बात चुप रह कर भी बोलती है .
जिस तरह कोई याद मन को निरंतर मथती है .
जिस तरह कोई अहसास ऊनी शॉल - सा लिपट जाता है .
बस इतनी सी बात पर 
शायर नज़्म लिखते हैं .

जिस तरह एक बच्चा मीठा - सा मुस्कुराता है .
अपनी तोतली बोली में दादी की कहानी दोहराता है .
जिस तरह वो एक पल झगड़ता दूसरे पल गले लगाता है .
बस इतनी सी बात पर 
शायर नज़्म लिखते हैं .   







शनिवार, 27 अप्रैल 2013

फूल झरते हैं




मौसम ही है गर्मी का 
आजकल , क्या कहियेगा !
धूप देती है चटका 
तवे जैसा !
गर्म हवा का झोंका 
तबीयत झुलसा गया !
इनसे जूझता - जूझता 
जब सोनमोहर के नीचे से गुज़रा ,
छोटे - छोटे फूल पीले 
पेड़ से झरे , 
मेरे ऊपर गिरे , 
हलके - से छू गए .
कोमल स्पर्श फूलों का 
मानो आश्वस्त कर गया ..
कह गया -
धूप तपाती है ,
गर्म हवा नश्तर चुभाती है ,
पर सुनो , मन छोटा न करो ,
दरख़्त तले दो पल रुक कर देखो ..
इस मौसम में भी 
छाँव का बिछौना 
क्लांत पथिक को बुलाता है .
इस मौसम में ही 
सोनमोहर के फूल झरते हैं . 



शनिवार, 20 अप्रैल 2013

जीवन धुन के स्वर




मैंने देखा ..
चिलचिलाती धूप में 
बांस की बल्लियों पर चढ़ा 
एक मजदूर , 
गा रहा है 
रामचरितमानस की चौपाइयां ,
अपनी धुन में मगन ..
इसी तरह साधता है वो 
अपनी जीवन धुन के स्वर .  



रविवार, 14 अप्रैल 2013

उस लम्हे का सच



आम तौर पर 
जो काम करना 
ग़लत होता है, 
हो सकता है  
किन्ही परिस्थितियों में 
वही काम करना 
सही जान पड़े .
क्योंकि एक सच 
ऐसा भी होता है  
जो सही और ग़लत 
की परिभाषा से 
परे होता है .
ये सच 
सिर्फ अपने 
दम पर 
खड़ा होता है . 
ये सच 
यथार्थ से 
बड़ा होता है . 
ये सच 
उस लम्हे का 
सच होता है .