Saturday, 20 April 2013

जीवन धुन के स्वर




मैंने देखा ..
चिलचिलाती धूप में 
बांस की बल्लियों पर चढ़ा 
एक मजदूर , 
गा रहा है 
रामचरितमानस की चौपाइयां ,
अपनी धुन में मगन ..
इसी तरह साधता है वो 
अपनी जीवन धुन के स्वर .  



7 comments:

  1. कई बार पढ़ा। समझ नहीं सका क्या प्रतिक्रिया दूँ? क्या कहूँ? एक निर्धन, मजबूर मज़दूर की जीवन धुन, उसकी साधना, एक निरर्थक से जीवन में एक सहारा, एक भरोसा; चाहे, या न चाहे, उसी भरोसे में ही जीवन है, उसी में खुश रहना है। उसकी व्यथा पर क्या टिप्पणी की जा सकती है भला? क्या लिखूँ?

    ReplyDelete
  2. shams sahab kyun na ham ek pal ko yun sochen ki wo mazdoor apni zindgi ki sari dushwariyan bhool kar us kshan khush hai aur jaisi bhi hai zindgi,waise hi jeevan ka geet ga raha hai..almast..

    ReplyDelete
  3. हाँ, बिलकुल सोच सकते हैं। एक पल क्या, हर पल सोच सकते हैं।

    कविता का सब से बड़ी ख़ूबी यह है (जो अब मुश्किल से ही कहीं दिखती है) कि वह कवि के नहीं, बल्कि पढ़ने वाले या सुनने वाले के वायक्तित्व का आईना होती है। हर पढ़ने वाले को उसमे अपना ही जीवन दिखता है, और वह उसी हिसाब से उसका अर्थ ढूंढ लेता है। आप की यह कविता यहाँ इस मामले में पूरी तरह कामयाब है। मैंने इसको अपने नज़रिये से देखा है बस। इतनी सी ही बात है।

    ReplyDelete
  4. sach hai shams sahab ! apne bilkul sateek baat kahi. apki baat ki is tarah prateeksha rahti hai jaise bachchon ko teacher ke good..very good ka intezar rahta hai.dhanywad.

    ReplyDelete
  5. तो फिर यह ध्यान रहे कि टीचर की डांट भी सुननी पड़ती है और पिटाई भी हो जाती है कभी कभी.... :)

    ReplyDelete
  6. jee ! beshaq ! bas bhagwan kare aisa kuchh hamse na ho ki pitai ki naubat aaye !! : )

    ReplyDelete

नमस्ते