गुरुवार, 21 मार्च 2019
बुधवार, 20 मार्च 2019
गौरैया खूब चहको तुम
नन्ही गौरैया आओ तुम ।
अपना घर बसाओ तुम ।
अपना घर बसाओ तुम ।
मेरे छोटे-से घर की
छत का कोना, खिड़की,
बालकनी, दुछत्ती, अहाता,
सब बाट जोहते हैं तुम्हारी ।
छत का कोना, खिड़की,
बालकनी, दुछत्ती, अहाता,
सब बाट जोहते हैं तुम्हारी ।
यहाँ घोंसला बनाओ ।
दिन भर दाना चुगो ।
प्यास लगे तो पानी पियो ।
ये सब यहाँ मिलेगा ।
और प्यार मिलेगा ।
दिन भर दाना चुगो ।
प्यास लगे तो पानी पियो ।
ये सब यहाँ मिलेगा ।
और प्यार मिलेगा ।
ज़्यादा कुछ नहीं,
देने को
हमारे पास भी ।
तुम्हें भी तो
चाहिए बस इतना ही ।
देने को
हमारे पास भी ।
तुम्हें भी तो
चाहिए बस इतना ही ।
तुम्हारा रहना आसपास
होता है शुभ ।
तुम चहचहाती हो जब,
चहकने लगता है जीवन ।
होता है शुभ ।
तुम चहचहाती हो जब,
चहकने लगता है जीवन ।
गौरैया के घर की चित्रकारी : श्रीमती रेखा शांडिल्य
रविवार, 17 मार्च 2019
सही की बही
सही में यार !
बहुत मुश्किल है !
सही क्या ?
ग़लत क्या ?
इस सब की विवेचना ।
बहुत मुश्किल है !
सही क्या ?
ग़लत क्या ?
इस सब की विवेचना ।
कोई कितना करे ?
और कब तक करे ?
और कब तक करे ?
किंतु परंतु का कोई
अंतिम छोर है क्या ?
निष्कर्ष कैसे निकलेगा ?
अंतिम छोर है क्या ?
निष्कर्ष कैसे निकलेगा ?
रेगिस्तान में जल दिखना
तो छलना है ।
मृगतृष्णा है ।
क्षितिज जब तक
दूर है,
सबको मंज़ूर है ।
नज़र का नूर है ।
मगर पास गए अगर
तो कुछ भी नहीं है ।
भुलावा है ।
मनमोहक है पर
मात्र दृष्टिकोण है ।
दूर है,
सबको मंज़ूर है ।
नज़र का नूर है ।
मगर पास गए अगर
तो कुछ भी नहीं है ।
भुलावा है ।
मनमोहक है पर
मात्र दृष्टिकोण है ।
अब बताइए ।
क्या किया जाए ?
सही को कहाँ ढूंढा जाए ?
क्या किया जाए ?
सही को कहाँ ढूंढा जाए ?
सही तो भई
परिस्थितियों की बही पर
समय के दस्तख़त हैं ।
समय के साथ
लिखा-पढ़ी करने पर
बदल भी सकते हैं ।
फिर एक दिन ऐसे ही
बैठे-बैठे अनायास ही
सब समझ में आ गया ।
बैठे-बैठे अनायास ही
सब समझ में आ गया ।
असल में काम सही है वही
जिसका मंसूबा नेक हो ।
जिसका मंसूबा नेक हो ।
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