Monday, 11 June 2018

निष्ठा


अंजुरी भर जल में
आकाश की परछाईं है ।
मिट्टी के छोटे से दीपक ने
सूरज से आंख मिलाई है ।
घर के टूटे-पुराने गमले में
हरी-हरी जो कोपल फूटी है ।
उसने अनायास ही मेरे मन में
जीवन के प्रति निष्ठा रोपी है ।
हो सकता है ये बात अटपटी लगे
पर धूप ने भी अपनी मुहर लगाई है ।


10 comments:

  1. WOW.... Ati sunder..Have A BLESSED DAY. ......God Bless You And Lots Of ......

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (12-06-2018) को "मौसम में बदलाव" (चर्चा अंक-2999) (चर्चा अंक-2985) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  3. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 12/06/2018 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

    ReplyDelete
  4. एहसास का यह मधुरिम स्वर .. लाजवाब

    ReplyDelete
  5. Thanks very interesting blog!

    ReplyDelete
  6. बहुत सुंदर ...
    सबके मिलन से आशा का जन्म होता है ... जो जीवन निखारती है ... भावपूर्ण रचना ...

    ReplyDelete
  7. वाह!!बहुत सुंदर ..।

    ReplyDelete
  8. वाह सुंदर निष्ठा

    ReplyDelete
  9. athisundar ! beautiful thoughts . thanks for sharing. - godhakrshnan

    ReplyDelete

नमस्ते