Friday, 15 June 2018

जय हिंद

ये इत्तफ़ाक नहीं है ।

सीमा पर तैनात जवान
रोज़ शहीद हो रहा है ।
तब जाकर इस देश का
हर आदमी
चैन से सो पा रहा है ।
वो अपना फ़र्ज़
निभा रहा है,
बिना सवाल पूछे
उन हमवतनों से,
जो उसकी कुर्बानी पर
सवालिया निशान
बार-बार लगा रहे हैं ।

ये इत्तफ़ाक़ नहीं है ।

चाँद यूं ही
मुबारक़ नहीं होता ।
जब एक जवान
ईद की छुट्टी में
घर जाते हुए,
इस दुनिया से
रवाना हो जाता है,
पर सर नहीं झुकाता है ।
तब जाकर
ईद का चांद नज़र आता है ।

हर उस जवान की बदौलत
जो वतन की ख़ातिर
जान दांव पर लगाता है,
हमारा तिरंगा
फ़ख्र से लहराता है ।

12 comments:

  1. Ekdum sateek. Sharm ke baat ye hai, ki aajkal hum inhi jawanon ko respect karna bhool jaate hain. Pichle gantantr divas pe pata chala, ki parade organise karne wale jawanon ki families ko parade dekhne ke liye koi passes nahi diye jaate aur koi vyavastha nahi ki jaati. Jabki corporate passes to baante jaate hain. Sharamnaak!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-06-2018) को "पितृ दिवस के अवसर पर" (चर्चा अंक-3003) (चर्चा अंक-2997) (चर्चा अंक-2969) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय ।
      विलंब के लिए क्षमा करें ।

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  3. दिन में एक बार भी
    हम याद कर लें
    तो बहुत है ।
    सरहद पर अकेले
    जो पहरा दे रहा है,
    उसे भी हमारी तरह
    भूख-प्यास सताती है ।
    उसे भी औरों की तरह
    घर की याद आती है ।

    वो सिपाही जो अपनी
    जान हथेली पे लिए
    हर रोज़ कूच करता है ।
    उसका हमारी दुआओं पे
    बेशक़ हक़ बनता है ।

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 17 जून 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत आभारी हूँ यशोदा जी ।
      केवल पांच रचनाओं के होने से रचना पढ़ी जाती है और प्रतिक्रिया भी मिलती है । विचारों की कड़ियाँ जुड़ जाती हैं ।

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  5. बहुत सही लिखा है आपने..यह ज़ज़्बा हर हिंदुस्तानी के मन में होनी चाहिए,तभी तो आतंक के सिपहसलारों को सबक हम सिखा पायेंगे न।

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    1. धन्यवाद श्वेताजी । जज़्बा ज़हन में ही दफ़्न ना हो जाए । मुक़म्मल हो । हौसला बुलंद हो !

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  6. इस कविता के लिए आपको हार्दिक बधाई।
    चाँद यूं ही
    मुबारक़ नहीं होता ।
    जब एक जवान
    ईद की छुट्टी में
    घर जाते हुए,
    इस दुनिया से
    रवाना हो जाता है,
    पर सर नहीं झुकाता है ।
    तब जाकर
    ईद का चांद नज़र आता है ।

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    1. मीनाजी हौसला अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया ।
      ज़ाया ना हो वीरों का बलिदान ।

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  7. मुझे इस विषय पर कुछ कहने की अनुमति तो नहीं है, पर बहुत ही ख़ूबसूरती से गढ़ा है आपने इस रचना को। बधाईयाँ...👌👌👌👏👏👏💐💐💐

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    1. रचना की प्रेरणा ही इतनी सुंदर हो
      तो रचना में क्यों ना व्यक्त हो ?

      आपको क्यों अनुमति नहीं है,ये समझ ना आया ।
      सराहना के लिए आभारी हूँ अमित निश्छल जी ।

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