Tuesday, 4 April 2017

जिसे छिन - छिन गढ़ा गया . .


कविता है, 
कर्म की भूमिका ।

पहले कभी थी ,
मन की व्यथा 
अथवा जीवन की कथा ।
कभी - कभी कल्पना ,
अनुभव की विवेचना ।
और हमेशा 
सरलता की आभा  . . 
प्रसन्न निश्छल ह्रदय की 
मयूरपंखी छटा ।

जाने क्या - क्या
अनुभूति की गठरी में 
जाने - अनजाने जुड़ा ,
या घटा  . . 
जाने 
स्वयं ही गया ठगा ।

जो बचा ,
जो सहेजा गया -
छिन - छिन गढ़ा गया  . . 
वही बनी कविता ।
          

6 comments:

  1. सुंदर भावाभिव्यक्ति नूपुरम जी।
    सादर आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों --
    मेरे ब्लॉग का लिंक है : http://rakeshkirachanay.blogspot.in/

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    1. जी अवश्य ।
      धन्यवाद ।

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  2. सुंदर अभिव्यक्ति !

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नमस्ते