Monday, 1 March 2010

संभावना 

मन की मिट्टी को
सूखने मत देना .
बंजर भूमि पर
कुछ नहीं उगता .

सींचते रहना
मन की मिट्टी को
धीरे - धीरे 
आंसुओं से,
ओस की बूँद जैसे
पावन विश्वास से .

आँख जब नम होगी,
किसी के मन की
पीड़ा समझेगी ,
तब ही 
भावुक मन की
उर्वर भूमी से  
फूटेगा अंकुर.

अंततः
फूल 
खिलें ना खिलें,
बड़ा होगा
नन्हा पौधा,
फूल खिलने की
संभावना लिए .









 

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नमस्ते

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