गुरुवार, 26 नवंबर 2009

सच सरीखा

क्या बुरा है  ?
अगर
आज का दिन
इस खुशफ़हमी में कट जाये
कि गिनती के सही
कुछ लोग हैं .. एक आध .. 
जो समझते हैं
दिल की बात ।  
जिनके भरोसे कम से कम
आज ,
सोया जा सकता है
इस तसल्ली के साथ
कि कोई है
जो समझता है सारे हालात 
और दिल की बात .

मान लो ,
कल ही चल बसे तो ?
अंतिम विदा के समय ,
मन में दुःख तो ना होगा
कि किसी ने भी
समझा ही नहीं ..
रुख़सत के वक़्त
इस बात का दिलासा होगा
कि किसी के दिल में तो
याद का दिया टिमटिमायेगा ।  

क्या फ़ायदा ?
इस बहस में उलझने का
कि क्या सचमुच किसी का प्यार
जीवन भर साथ देगा
या
समय बीतने के साथ
छीजने लगेगा । 

क्या फ़ायदा ?
ये सोच कर
कि जो आज बहुत अपने हैं
कल शायद हों न हों ..

बताओ मेरे मन
कल किसने देखा है ?

सुनो मेरे मन
इस पल में समाओ तो ..
भरपूर जी पाओ तो ..
संभव है,
समय भी साथ देगा ।  
साथ न दे सका तो 
निभाने का मनोबल देगा,
और लम्बी यात्रा के लिए
छोटो-छोटी ईमानदार कोशिशों का
चना-चबैना ..
जिसके सहारे
शायद रास्ता कट जाये ।

हो सकता है 
आख़िरी दम तक,
बचा रहे
बटुए में
किसी का प्यार और दुलार ..    
भोली-सी मनुहार ।  

कोई तो समझेगा
मन का हाहाकार । 

कोई तो जानेगा
मनप्रदेश का समाचार ..
जताए बिना,
कहे बिना । 

अगर ये सिर्फ़ 
खुशफ़हमी भी है
तो बुरा क्या है ?

जिसके सहारे
जीवन निभ जाए,
वो मन का माना
सच सरीखा है । 

सोमवार, 23 नवंबर 2009

कील

काश...
कि

जीवन
की विसंगतियां
पेंसिल से लिखी होतीं..
बर्दाश्त
से ज़्यादा
दुखने
पर
रबर
से मिटा दी जातीं

जब
कि ये सारी बातें
मन
की दीवार पर
सौ
फीसदी
कील
की तरह गड़ जातीं
पर
कम से कम
जब
तक
कील
पर टंगी
मनचाही
तस्वीर
हटाई
जाती ,
तब
तक
इतनी
बेढंगी कील
दिन
-रात सामने
नज़र
तो आती

पर
पेंसिल की नोंक
लिखते
-लिखते
बार
बार
टूट
जो जाती है ,
फिर
नए सिरे से
तराशी
जाती है..
रबर
भी अक्सर
गुम
हो जाती है

तो इतनी मगजमारी
कौन
करे ?
बेहतर
है कि
जो

जिसके
लिए
लिखा
गया है ,
उस
पेचीदा दस्तावेज़ को
वो

पूरा
पढ़े ..
और
फिर लड़े
अपने
लिए
अपने
बूते पर

जिस
लिखे को
मिटाया
नहीं जा सकता
सुधारा
नहीं जा सकता
उसे
बस
जिया
जा सकता है,
कील
पर टंगी
मनचाही
तस्वीर के लिए

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

जीवन मुझे जी भर कर जीना है

जीवन का रस चखो

खूब काम करो
काम का मज़ा लो
जितना सीख सको,
जिससे सीख सको... सीखो
जीवन का रस चखो

अभी तो

मन की कई बातें,
कहनी और सुननी हैं
सोची-समझी बातें,
गुननी और करनी हैं

प्यार और मन्दिर का प्रसाद
बांटना है
तुलसी की चौपाइयों को
आत्मसात करना है

भाग्य का लिखा
बांचना है
जो लिखा है उसे
वश में करना है

मन को साधना है
अपने लक्ष्य को पाना है

जी भर कर
गाना-गुनगुनाना है
कलेजे की हूक को
कोयल की कूक
बनाना है

जहाँ हिम्मत टूटे ..
पांव फिसले ..

संभल कर - तुरंत
बिना बात
ढोलक की थाप
पर
झूम कर
ठुमका लगाना है

खुशहाली के बीज
बोना है
उम्मीद की कोपलों को
सींचना - सहलाना है

जीवन के कैनवस में
रंग भरना है
अनुभूति के
हर रंग में
रंगना है

इस क्षण को जीना है
हर क्षण में जीवन पिरोना है

शनिवार, 19 सितंबर 2009

प्रतिबिंब

होगा वही
जो
होना होगा .
अक्सर बुरा होगा .
फिर कुछ अच्छा होगा .

जो भी होगा
ज़रूर उसका
कोई
मतलब होगा .

अंधेरा होगा
तो
उम्मीद का
दीया जलेगा .
मेहनत का
सितारा चमकेगा .

उजाला होगा
तो
जीवन का
कोना - कोना
साफ़-साफ़ दिखेगा .

समय जैसा भी होगा ..
हमारी सोच का प्रतिबिंब होगा .

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

चलो आज


आज चलो इस पेड़ के नीचे
बैठें और चैन की बंसी बजायें .

हरी दूब पर.. गुनगुनी धुप में
दूधिया बादल की छतरी लगाये,
खुली हवा को गले लगायें .

खिलते फूल पंख तितली के
सृष्टि ने कितनी लगन से सजाये .
खिलते - खिलते ... मुरझाने से पहले
रंग - सुगंध के त्यौहार मनाये .

फिर कांटे चुभने के भय से
क्यूँ इस क्षण का आनंद गँवायें ?

हरी घास पर नंगे पाँव
आओ चलो दौड़ लगायें .
बच्चों की टोली के संग - संग
रंग बिरंगी पतंग उड़ायें .

शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

चौराहा


गली-कूचों
के रास्ते,
ख़ुद--ख़ुद
मुड़ते जाते हैं
पर जब
चौराहा आता है ..
सवाल उठाता है

प्रश्नचिन्ह बन कर
खड़ा हो जाता है,
चौराहे का हर एक रास्ता
बाध्य करता है सोचने को,
चुनौती देता है
हमारे दिशा बोध को

पूछता है हमसे
क्या अब तक नहीं समझे ?
कहाँ ले जाते हैं कौन से रस्ते ?

नहीं ? तो
पता करो
रास्ते तो सभी
पहुंचाते हैं कहीं कहीं,
पर बात
घूम-फिर कर
आती है वहीँ -
चौराहे पर

गोल चक्कर के फव्वारे का
रौशनी से नहाना,
सड़क की बत्तियों का
दिन मुंदते जगमगाना,
साइकिल वाले का घंटी बजाना,
ट्रैफिक का शोर मचाना,
सिग्नल का हरा, पीला और लाल होना,
बूढे आदमी का -
बच्चे का हाथ पकड़ना
और सड़क पार करना ..
समर्थन है
जीवन के प्रवाह का

यहाँ से शुरू होता है
सोचना और करना
अपना रास्ता ख़ुद चुनना,
और उस पर चलते रहना
हर कदम पर कुछ सीखना

हमारा चुनाव ही
हमारी जिजीविषा की परिणति,
हमारा संकल्प ही
गढ़ता है हमारी नियति

चौराहे तक पहुंचना,
तो कुछ देर ठहर कर देखना ....

चौराहे की चहल-पहल में
हर संभावना छुपी है,
चौराहे पर ज़िन्दगी मज़े लेती
खोमचे लगा कर खड़ी है