मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

आनंद संवत्


अलविदा २०७७ 
आ ही गया तुम्हारे
अस्त होने का समय ।
बहुत कष्ट पाया तुमने ।
अलग-थलग सबसे विलग
मौन हो गए और हो गए विलय
नवागन्तुक प्रहर की लहर में विलीन ।
अब मिलना होगा नव संवत्सर की चौखट पर ।
सुना है,अब जो आओगे पोटली में होंगे सुदामा के चावल।
मित्रवत स्वागत तुम्हारा हृदय तल से करेंगे सकल जन सहर्ष ।
करतल ध्वनि कर समवेत स्वर में करेंगें शिव तत्व का आह्वान ।
धैर्य और धर्म धारण कर परिवर्तन  लाए नव विकम संवत्सर २०७८ ।
आरोग्य उपहार मिले,उर में आनंद का हो आगमन,नूतन वर्षाभिनंदन ।


रविवार, 11 अप्रैल 2021

किसकी बदौलत है ये सब ?

ये शहरों की रौनक ।
दिन-रात की चहल-पहल ।
ये लहलहाते खेत ।
नदी किनारे मंगल गान ।

मैदानों में दौङ लगाते,
खेलते-कूदते,पढ़ते-लिखते 
अपना मुकद्दर गढते बच्चे ।
हँसती-खिलखिलाती,
सायकिल की घंटी बजाती
स्कूल जाती बच्चियाँ ।

मिट्टीु के कुल्हड़ में धुआँती
चाय की आरामदेह चुस्कियां ।
थाली में परोसी चैन देती
भाप छोङती पेट भर खिचङी ।

चमचमाते बाज़ार की गहमा-गहमी ।
आनन फानन काम पर जाते लोग ।
भावतोल करते दुकानदार, व्यापारी ।
ट्रैफिक की तेज़ बेफ़िक्र रफ़्तार !

आलोचना करने का अधिकार 
अपनी बात कहने का हक़ ..
हद पार करने का भी !

घर लौट कर अपना परिवार 
सकुशल देखने का सुकून,
किसकी बदौलत है ये सब ?

ये सब उन मौन वीरों की बदौलत 
जो चुपचाप हमारी पहरेदारी
करते रहे बिना किसी शिकायत के
ड्यूटी पर तैनात रहे गर्वीले ।
शहीद हो गए ..घर नहीं लौटे ..
ये सारे सुख, निरापद जीवन
उनकी शहादत की बदौलत ।

खबरदार ! भूलना नहीं !
हरगिज़ यह बलिदान !!
सदैव करना शहीदों का सम्मान!
पग-पग पर करना स्मरण
वीरों का वंदनीय बलिदान !
बनी रहे तिरंगे की आन,बान और शान
सोच-समझ कर सदा करना ऐसे काम ।
जतन से संभालना जवानों के 
स्वाभिमानी साहसी परिवारों को जो 
खो बैठे अपने एकमात्र अवलंबन को ।

जिन्होंने प्राण तक कर दिए न्यौछावर
उनके हम जन्म-जन्मान्तर को हुए कृतज्ञ ।
अब ज़िम्मेदारी निभाने को हो जाएं सजग ।

याद रहे हमारे सारे सुख-साधन,जीवन,
स्वतंत्रता इनके बल बूते पर जिन्होंने 
सौंप दिया हमको अपना भारत ।

श्वास-श्वास करती शहीदों का अभिनंदन ।
इनके पराक्रम की बदौलत हमारा जीवन ।




चित्र इंटरनेट समाचार से साभार 

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

वजह जीने की


कभी-कभी 
कोई वजह नहीं होती
पास हमारे, 
आज का पुल 
पार कर के, 
कल का अभिनंदन 
करने की ।
ज़िन्दगी बन जाती
मशक्कत 
बेवजह की ।

ऐन वक्त पर लेकिन 
आपत्ति जता देती,
एक नटखट कली
जो खिलने को थी ।
यह बोली कली
जाने की वेला नहीं,
निविङ निशि ।
टोक लग जाती ।

फूल रही जूही
सुगंध भीनी-भीनी,
बिछी हुई चाँदनी,
धीर समीर बह रही ।
मौन रजनी,
ध्यानावस्थित
सकल धरिणी ।
कोई तो वजह होगी,
सुबह तक रूकने की ।

हाँ, है तो सही
एक इच्छा छोटी सी ..
देखने की कैसे बनी
फूल छोटी सी कली ।

भोर हो गई ।
मंद-मंद पवन चली ।
जाग उठी समस्त सृष्टि 
गली-गली चहक उठी ।
नरम-नरम धूप खिली ।
और खिली कली ।

एक फूल का
खिलना भी,
हो सकती है वजह
जीने की ।