मंगलवार, 24 मार्च 2020

तुम सलामत रहो गौरैया


गौरैया तुम सलामत रहो,
दाना चुगने नित आती रहो, 
बड़े शहरों के छोटे घरों में
फुदकने चहकने के लिए ।
क्योंकि तुम हो शुभ शगुन
जीवन का सहृदय स्पंदन ।

तुम जब-जब घर आती हो,
हर बार दिलासा देती हो,
कि अब भी कहीं बचे हैं
हरे-भरे पेड़, बाग-बगीचे,
जिनमें अब भी खेलते हैं 
बच्चे और बुजुर्ग टहलते ।

तुम्हारी बदौलत जान गए
हम अहमियत खिड़की में
संजोए इकलौते पौधे की
हरेक फूल के खिलने की ।

तुम्हारा आना दाना चुगना,
पानी पीना घोंसला बनाना,
जंगले से ताक-झांक करना,
और फिर फुर्र से उड़ जाना,
जी को है बहुत-बहुत भाता
मानो हरसिंगार का झरना ।

बना रहे तुम्हारा आना-जाना,
देखो शहरों को भूल मत जाना !
घर आंगन की रौनक़ बनी रहना
तुम सदा सलामत रहो गौरैया !

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

दीवार से सटा फूल खिला



दीवार से सट कर 
खिला हुआ एक पौधा
कैमरा फ़्रेम के बीचोंबीच
अचानक आ खड़ा हुआ,
महा-जिज्ञासु बच्चे सा
टुकुर-टुकुर ताकता हुआ ।
तब हमारा भी ध्यान गया ।

क्यों दीवार से सट कर 
खिला हुआ है ये पौधा ?
सामने तो खुला मैदान था ..
क्या अबीर-गुलाल जब उड़ा
हुड़दंग से बचता हुआ
जिसकी मुट्ठी में रंग था
छोटा-सा बच्चा
ईंट की दीवार से लग कर
खड़ा हो गया ? या ..

क्या कोई नन्हा रूठ कर 
मुँह फुला कर
सबसे दूर जा कर
मुँह फेर कर
जा खड़ा हुआ है ?
ताकि गुस्सा भी ज़ाहिर हो..
नज़रों से ओझल भी ना हो..
कोई टॉफी देकर बहला ले !
खुशामद कर के मना ले !

रूठने के मासूम बहानों में 
भोला बचपन छलकता है ।
अनायास ही खिले फूल में
अंतरतम खिल उठता है ।

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

बापू की पेंसिल


मेरे प्यारे बापू
तुम्हें पता तो होगा
दुनिया में कितनी 
अफ़रा-तफ़री
मची हुई है 
इन दिनों ।

जंगलों में
आग लग रही है ।
वृक्ष पशु पक्षी
ख़त्म हो रहे हैं ।
बाढ़ आ रही है कहीं ।
सूखा पड़ रहा है कहीं ।
ग्लेशियर पिघल रहे हैं ।
समंदर गरमा रहे हैं ।
मौसम बेमौसम बदल रहे हैं ।
फसलों पर ओले पड़ रहे हैं ।
प्रकृति डाँवाडोल है ।
मनुष्य अत्यंत भ्रमित है ।

ऐसे में तुम्हारी छोटी-सी
पेंसिल याद आ रही है,
जो मिल नहीं रही थी..
और तुम ढूंढे जा रहे थे ।
सब समझा रहे थे तुम्हें,
बापू आपकी पेंसिल तो 
खत्म होने को ही थी !
दूसरी पेंसिल ले लीजिए !
पर अपना अमूल्य समय
उसे ढूंढने में मत गंवाइए !
और तुम हँस दिए थे ।
कोई भी चीज़ जब तक 
काम आ सके तब तक
इस्तेमाल करनी चाहिए ।
फेंकनी नहीं चाहिए ।

बापू तुम कैसे समझ गए थे ?
एक दिन अपनी फेंकी हुई
बेकार मान ली गई चीजें ही
विकराल रूप धर लेंगी
और हमें निगल जाएंगी !

बापू हम में से बहुत सारे
तब भी नहीं समझे थे,
अब भी समझ नहीं पा रहे,
आधुनिक बहुलता के फेर में थे ।
अब भी सो-सो कर जाग रहे ।

बापू तुम थे दूरदृष्टा ।
तुमने जान लिया था,
महत्व संतुलन का
और इस नियम का ..
प्रकृति से लो जितना
कम से कम दो उतना
या उससे भी ज़्यादा
जिससे मंगल हो सबका ।