एक दिन अकस्मात
झर गए यदि सब पात,
ऐसा आए प्रचंड झंझावात ..
ना जाने क्या होगा तब ?
सोच कर ह्रदय होता कंपित।
सूखी टहनियों पर कौन गाता गीत ?
सुने ठूंठ पर कौन बनता नीड़ ?
रीते वृक्ष का कोई क्यों हो मीत ?
क्या कभी हो पायेगा ऐसा संभव ?
ठूंठ की जड़ में जाग्रत हो चेतना।
प्राण का संचार हो शाखाओं में ऐसा ..
लौट आए बेरंग डालियों में हरीतिमा।
कोई पंछी रुपहला राह भूले पथिक सा,
संध्या समय में आन बैठे विस्मित-सा।
अनायास ही छेड़ दे कोई राग ऐसा,
धूप और वर्षा की बूंदों के शगुन-सा।
साहस के नव पल्लवों की हो ऐसी छटा
पात-पात शोभित हो वंदनवार-सा।

