गुरुवार, 2 जनवरी 2020

वंदनवार



एक दिन अकस्मात 
झर गए यदि सब पात,
ऐसा आए प्रचंड झंझावात  .. 
ना जाने क्या होगा तब ?
सोच कर ह्रदय होता कंपित। 

सूखी टहनियों पर कौन गाता गीत ?
सुने ठूंठ पर कौन बनता नीड़ ?
रीते वृक्ष का कोई क्यों हो मीत ?

क्या कभी हो पायेगा ऐसा संभव ?
ठूंठ की जड़ में जाग्रत हो चेतना। 
प्राण का संचार हो शाखाओं में ऐसा  .. 

लौट आए बेरंग डालियों में हरीतिमा। 
कोई पंछी रुपहला राह भूले पथिक सा, 
संध्या समय में आन बैठे विस्मित-सा। 

अनायास ही छेड़ दे कोई राग ऐसा, 
धूप और वर्षा की बूंदों के शगुन-सा।  
साहस के नव पल्लवों की हो ऐसी छटा 
पात-पात शोभित हो वंदनवार-सा।  



रविवार, 29 दिसंबर 2019

बाप


बड़ी मुद्दत के बाद
समझ में आया,
जो बहुत पहले
समझाया गया था ।
पर समझ ..
आया नहीं था ।

माँ के मन का अवसाद
उफ़नती नदी समान
आंखों से छलक जाता है ।
जी हल्का हो जाता है,
जैसे रुई का फाहा ।
पोंछ देता है
औलाद की आँखों का  
फैला हुआ काजल ।
और हर चोट पर 
लगा देता है मरहम ।

बाप के सीने में
उठते हैं कई तूफ़ान ।
घुमड़ते हैं बादल
गरज कर,
बिना बरसे
हो जाते हैं चट्टान ।
आंसू रिस-रिस कर
भीतर ही भीतर
हिला देते हैं जड़ ।
पर व्यक्त नहीं करता
कभी भी बाप ।

विस्तार कर देता है
अपनी व्यथा का ।
बन जाता है वरद हस्त,
विशाल वट वृक्ष..
और विराट आसमान,
जो दूर से चुपचाप
रखता है सबका ध्यान ।

जब बच्चे बनते हैं माँ-बाप,
और किसी बात पर बाप
बच्चों पर उठाता है हाथ,
याद आ जाती है
एक-एक बात ।

बाप उठाता है हाथ
बच्चे की कमज़ोरियों की
बेतरतीब लकीरें 
संवारने के लिए ।
झटक देता है बच्चे को दूर
उसे अपने पैरों पे
खड़ा करने के लिए ....
अपने सामने ...
ताकि झटका लगे
तो संभाल सके,
वक़्त रहते बच्चा सीख जाए
माँ-बाप के बिना भी
चलना अकेले 
बिना डरे ।

बाप के रूखेपन की तह में
बहती है सरोकार और प्यार की नदी ।
देखना .. शायद कभी दीख जाए
बाप की आंखों में नमी ।

रविवार, 24 नवंबर 2019

अल्पना


भान नहीं कुछ,
ज्ञात नहीं पथ,
मुंह चिढ़ा रहा
दोराहा ।

खेल खेलना
आया ना ।
कोई दांव ना 
आया रास ।
जो भी खेला
पाई मात ।

समझ ना आया
ग़लत हुआ क्या ?
ध्येय समक्ष था
राह क्यों भूला ?

लक्ष्य जो चूका,
भ्रमित मन हुआ ।
धुंध छंटे ना ।
मार्ग सूझे ना ।

इस मोड़ पे ठिठका,
मैं बाट जोहता,
तुमसे विनती करता ..

पार्थसारथी कृष्ण सखा
इस बेर अर्जुन को क्या
ना समझाओगे गीता ?
रथ को ना दोगे दिशा ?

तुम्हारी ही रचना
मैं हूँ ना ?
तो फिर आओ ना
पूरी करो ना,
मेरे जीवन की 
अल्पना ।