बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

अंततः जीतता है सत्य ही


असत्य तो हारता ही है अंततः 
बेशक़ हम समझ ही ना पाएं, 
भेद न कर पाएं हार-जीत में।  

चूक जाए विश्लेषण हमारा। 
भ्रमित कर दे अन्वेषण हमारा।

याद करो जब घटती है दुर्घटना 
अथवा होता है कुछ बहुत बुरा 
आदमी अनभिज्ञ बन कर है पूछता 
मेरे ही साथ आखिर ऐसा क्यों हुआ ?
मैंने क्या किया था जो यह दंड मिला ?

उसे याद नहीं आता अपना किया। 
अपने ही कर्मों का मिलता है सिला। 
सोचो तो अवश्य मिल जाएगा सिरा।

हर दृष्टांत रामलीला जैसा 
स्पष्ट कथानक नहीं होता। 
साफ़-साफ़ दिखाई नहीं देता 
हमेशा न्याय विधाता का 
दो और दो चार के सामान। 
पर कचोटता है अनुचित जो किया। 
आजीवन प्रेत बन करता है पीछा। 

इसलिए विश्वास डिगने मत देना। 
संशय को सेंध मत मारने देना। 
जो करना चाहिए तुम वही करना। 

दूसरों के किये का हिसाब तुम्हें नहीं देना। 
तुमसे पूछा जायेगा कि तुमने क्या किया ? 

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

नट का नाच



हँसी आ गई
देख कर
बिजली के तार पर
नट की तरह
सूरज दादा को
संतुलन बनाते हुए !

इंसान की
क्या बिसात !
बड़े-बड़ों को
झंझटों में फंस कर
झूलते तारों में
उलझ कर
डगमगाते देखा ।

घटनाक्रम और
कालचक्र के पेंच ने
दुर्दांत टेढ़ों को
सीधा कर दिया ।
समय की
डुगडुगी बजा कर
चुटकी बजाते
सिखा दिया
नट का नाच ।

जब विकल्प ना हो
और गिरना ना हो
तो आ ही जाता है
इकहरी रस्सी पर
नट की तरह
दम साध कर
संभल कर चलना ।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

घुलने दो रंग



दिल और दिमाग़ की
खिड़कियां खुली रखना ।
ताज़ा हवा आने देना ।

ज़रूरी नहीं हमेशा
हम जो सोचते हों,
वही सही हो ।

सामने वाले की
नज़र से सोचना भी,
कभी कभी
होता है अच्छा ।

रंग कोई भी
हो जाता है दूना,
जब उसमें घुलने दो
कोई रंग दूसरा ।



चित्र साभार - सुवीर शांडिल्य