असत्य तो हारता ही है अंततः
बेशक़ हम समझ ही ना पाएं,
भेद न कर पाएं हार-जीत में।
चूक जाए विश्लेषण हमारा।
भ्रमित कर दे अन्वेषण हमारा।
याद करो जब घटती है दुर्घटना
अथवा होता है कुछ बहुत बुरा
आदमी अनभिज्ञ बन कर है पूछता
मेरे ही साथ आखिर ऐसा क्यों हुआ ?
मैंने क्या किया था जो यह दंड मिला ?
उसे याद नहीं आता अपना किया।
अपने ही कर्मों का मिलता है सिला।
सोचो तो अवश्य मिल जाएगा सिरा।
हर दृष्टांत रामलीला जैसा
स्पष्ट कथानक नहीं होता।
साफ़-साफ़ दिखाई नहीं देता
हमेशा न्याय विधाता का
दो और दो चार के सामान।
पर कचोटता है अनुचित जो किया।
आजीवन प्रेत बन करता है पीछा।
इसलिए विश्वास डिगने मत देना।
संशय को सेंध मत मारने देना।
जो करना चाहिए तुम वही करना।
दूसरों के किये का हिसाब तुम्हें नहीं देना।
तुमसे पूछा जायेगा कि तुमने क्या किया ?


