गुरुवार, 2 मई 2019

भई ये लोकतंत्र है




भई ये लोकतंत्र है ..
वो भी संसार का सबसे बड़ा !
कोई क्या कह सकता है किसी को !
पर भाइयों और बहनों कभी तो सोचो !
हम इस लोकतंत्र में रहने लायक हैं क्या ?
लोकतंत्र में रहने के कर्तव्य हमें क्या होंगे पता !
संविधान में दिए अधिकार भी मालूम हैं क्या ?
फिर किसको देते हो किसका वास्ता ?
कैसा वास्ता ? मेरे भाई कैसा वास्ता ?
बंद करो ऊँची आवाज़ में चिल्लाना !
कुछ नहीं तो नागरिकता का ही पाठ पढ़ो !
खुद समझो और समझने में मदद करो !
केवल नारों से मत कृतार्थ करो जन मानस को !
अपने सिद्धांतों को खंगाल अब अमल करो !
नीचे उतरो मंच से, आसन छोड़ो और श्रम करो !
नेता को अपशब्द कह छाती मत ठोंको !
नेता हम जैसा है ! हमारे बीच से ही आता है ।
वह देश भक्त ना रहे तो अपदस्थ करो !
पर बाहर तो निकलो बिल से और वोट करो !
अफ़सर और नेता को समझाने से पहले
ख़ुद तो पहले ज़िम्मेदारी अपनी समझो !
जम कर आलोचना करो यदि उचित हो !
पर काम करो खुद भी और सबको करने दो !


शनिवार, 27 अप्रैल 2019

कितना नीला और गहरा



घास पर लेट कर
गुनगुनी धूप में
आकाश को देखना..
टकटकी लगा कर..

और बताना,
कितना नीला
और गहरा
दिखाई देता है..
आसमाँ.

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

किताबें सब जानती हैं

किताबें ..
झकझोरती हैं,
नींद से जगाने के लिए ।
कचोटती हैं,
ग़लतियों के लिए ।
झगड़ती हैं,
हमारे पूर्वाग्रहों से ।
चुनौती देती हैं,
अपना मुस्तकबिल
खुद गढ़ने के लिए ।
कुरेदती हैं,
दिल की दीवारों पर
जमी काई को ।
किताबों से कुछ नहीं छुपा ।
किताबों को ही चलता है पता   
चुपके से टपका आंसू,
धड़कनों की खुराफ़ात,
अनकही बात ..
किताबें सब जानती हैं ।